बलिया में 17 नवंबर को होगा ददरी मेले का भूमि पूजन, कार्तिक पूर्णिमा स्नान की तैयारियां तेज
बलिया के ऐतिहासिक ददरी मेले की तैयारियां शुरू हो गई हैं। 17 नवंबर को भूमि पूजन और ध्वजारोहण प्रस्तावित है।
Dadri Mela 2026: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में स्थित महर्षि भृगु की तपोभूमि बलिया में लगने वाले ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक ‘ददरी मेला 2026’ को लेकर प्रशासनिक और नागरिक स्तर पर तैयारियां युद्धस्तर पर शुरू हो गई हैं। नगर पालिका परिषद बलिया और जिला प्रशासन द्वारा तय रूपरेखा के अनुसार, आगामी 17 नवंबर को मेला परिसर में परंपरागत वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भूमि पूजन संपन्न कराया जाएगा। भूमि पूजन के साथ ही मेला क्षेत्र में दुकानों के आवंटन, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा बैरिकेडिंग और रास्तों के समतलीकरण का कार्य तीव्र गति पकड़ लेगा। इसके अतिरिक्त, कार्तिक पूर्णिमा के पावन पर्व पर गंगा नदी में स्नान करने के लिए उमड़ने वाली लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को सुगम एवं सुरक्षित सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु विभिन्न गंगा घाटों पर व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
Dadri Mela 2026: 17 नवंबर को विधि-विधान से होगा भूमि पूजन, सजेगा ऐतिहासिक मेला
ददरी मेले की औपचारिक शुरुआत की दिशा में 17 नवंबर की तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। तय कार्यक्रम के अनुसार, इसी दिन मेला क्षेत्र में विधिवत भूमि पूजन और ध्वजारोहण किया जाएगा। इसके उपरांत नगर पालिका प्रशासन द्वारा दुकानदारों, झूला संचालकों और सर्कस जैसी मनोरंजन इकाइयों के लिए भूखंडों के सीमांकन और आवंटन का काम औपचारिक रूप से शुरू होगा।
ददरी मेला केवल एक स्थानीय बाजार भर नहीं है, बल्कि यह समूचे बलिया जनपद की सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक गौरव का जीवंत प्रतीक है। मेले की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां उत्तर प्रदेश के अलावा पड़ोसी राज्य बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश तक से व्यापारी, शिल्पकार और आम नागरिक अपनी जरूरतों की खरीदारी व मनोरंजन के लिए महीनों पहले से योजना बनाते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा पर पवित्र गंगा स्नान और घाटों पर सुरक्षा के व्यापक प्रबंध
ददरी मेले का मुख्य धार्मिक आधार कार्तिक पूर्णिमा का पावन गंगा स्नान है। सनातन धर्म में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा, सरयू अथवा पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य का असाधारण आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस पावन अवसर पर बलिया नगर से सटे शिवरामपुर घाट, सती घाट, कदम चौराहा घाट और आसपास के अन्य प्रमुख गंगा तटों पर भोर से ही लाखों की संख्या में श्रद्धालु डुबकी लगाने पहुंचते हैं।
श्रद्धालुओं की विशाल भीड़ के आवागमन को नियंत्रित करने, गहरे पानी में जाने से रोकने और दुर्घटनाओं से बचाव के लिए घाटों पर विशेष बैरिकेडिंग, गोताखोरों की तैनाती, मोटर बोट और जल पुलिस की निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम, मोबाइल बायो-टॉयलेट, पेयजल टैंकर और पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था का खाका तैयार किया जा चुका है ताकि दूर-दराज से आने वाले ग्रामीण श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
दो चरणों में आयोजित होता है मेला: पशु मेला और मीना बाजार का अनूठा संगम
ददरी मेले का आयोजन परंपरागत रूप से दो बड़े चरणों में विभाजित रहता है। मेले का पहला चरण भारत के दूसरे सबसे बड़े पशु मेले के रूप में विख्यात रहा है। इस पशु मेले में विभिन्न नस्लों की गायें, भैंसें, घोड़े, बैल और ऊंटों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होती है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और बिहार के दूरदराज के इलाकों से पशुपालक और व्यापारी अपने चुनिंदा पशुओं को लेकर यहां डेरा डालते हैं।
दूसरे चरण में कार्तिक पूर्णिमा के मुख्य गंगा स्नान के साथ ही मीना बाजार का भव्य शुभारंभ होता है। लगभग एक महीने तक चलने वाले इस मीना बाजार में काष्ठ कला, हथकरघा वस्त्र, पत्थर की चक्की व सिलबट्टे, पीतल-तांबे के पारंपरिक बर्तन, घरेलू हस्तशिल्प, बच्चों के खिलौने और मशहूर जलेबी-चना-कचौड़ी के खानपान स्टॉल सजते हैं। थिएटर, सर्कस, मौत का कुआं और विशालकाय झूले ग्रामीण व शहरी जनता के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं।
Dadri Mela 2026: भारतेंदु हरिश्चंद्र के ऐतिहासिक भाषण और महर्षि दर्दर से जुड़ी है मेले की विरासत
ददरी मेले का इतिहास हजारों वर्ष प्राचीन पौराणिक आख्यानों और आधुनिक भारत के साहित्यिक पुनर्जागरण दोनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि भृगु के शिष्य दर्दर मुनि द्वारा यहां एक विशाल यज्ञ का संपादन किया गया था, जिसके उपरांत इस स्थान का नाम ‘ददरी’ पड़ा और इस मेले की परंपरा की नींव पड़ी।
आधुनिक इतिहास के पन्नों में यह मेला आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के अमर उद्बोधन के लिए भी स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। वर्ष 1884 में इसी ददरी मेले के मंच से भारतेंदु जी ने अपना बहुचर्चित और कालजयी व्याख्यान दिया था, जिसका शीर्षक था—’भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?‘। इस भाषण में उन्होंने भारतीयों को कुरीतियों और आलस्य का त्याग कर स्वदेशी उद्योग, शिक्षा और स्वावलंबन को अपनाने का ऐतिहासिक संदेश दिया था।
यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज भी ददरी मेले को केवल वाणिज्यिक हाट न रखकर एक अनूठा सांस्कृतिक और वैचारिक समागम बनाती है। 17 नवंबर को होने वाले भूमि पूजन के बाद अब पूरे जनपद में मेले की चहल-पहल और उत्साह का माहौल तेजी से परवान चढ़ने लगा है।
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