पराली जलाने की घटनाओं में बड़ा उछाल, एक दिन में 584 जगह लगी आग; खन्ना का AQI 292
पंजाब में 3 नवंबर को पराली जलाने की 584 घटनाएं दर्ज की गईं। इसके साथ ही इस सीजन में कुल मामले बढ़कर 2,196 हो गए।
Punjab Stubble Burning: पंजाब में धान की मुख्य फसल की कटाई में तेजी आने के साथ ही खेतों में पराली (फसल अवशेष) जलाने की घटनाओं में अप्रत्याशित और तीव्र उछाल दर्ज किया गया है। राज्य में मंगलवार, 3 नवंबर को महज 24 घंटों के भीतर पराली जलाने के 584 सक्रिय मामले उपग्रह निगरानी तंत्र द्वारा दर्ज किए गए। यह चालू रबी-खरीफ संक्रमण सीजन में एक ही दिन के भीतर सामने आई आग की सर्वाधिक संख्या है। खेतों से उठते भारी धुएं और मौसमी बदलाव के चलते राज्य के औद्योगिक नगर खन्ना का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 292 के स्तर तक पहुंच गया, जो पूरे पंजाब में सर्वाधिक प्रदूषित दर्ज किया गया। इसके साथ ही हवाओं के रुख के कारण राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का समग्र AQI भी 350 के गंभीर आंकड़े को छू गया, जिससे समूचे उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में सर्दियों की दस्तक से पूर्व वायु प्रदूषण का संकट गहरा गया है।
Punjab Stubble Burning: एक दिन में 584 सक्रिय घटनाएं, सीजन का कुल आंकड़ा 2,196 पर पहुंचा
पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर और वायु गुणवत्ता निगरानी एजेंसियों द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 3 नवंबर को रिकॉर्ड 584 कृषि आग की घटनाएं दर्ज हुईं। इसके साथ ही 15 सितंबर से लेकर 3 नवंबर तक राज्य भर में पराली जलाने के कुल मामलों की संचयी संख्या 2,196 तक पहुंच गई है। यद्यपि पिछले वर्ष इसी समान अवधि में दर्ज 2,518 मामलों की तुलना में कुल संख्या में आंशिक कमी दिखती है, किंतु अचानक एक ही दिन में आए इस भारी उछाल ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासनिक तंत्र की तैयारियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
गत दिनों के रुझान पर दृष्टि डालें तो 31 अक्टूबर को 292 मामले, 1 नवंबर को 175 मामले और 2 नवंबर को 98 घटनाएं सामने आई थीं। मात्र 24 घंटे के भीतर 98 से बढ़कर 584 तक पहुंचना यह स्पष्ट करता है कि आगामी गेहूं बुवाई के लिए खेत तैयार करने की जल्दी में किसान बड़े पैमाने पर पराली को आग के हवाले कर रहे हैं।
मालवा के फिरोजपुर, बठिंडा और संगरूर बने मुख्य केंद्र
जिलेवार विश्लेषण के अनुसार, पराली जलाने की समस्या मुख्य रूप से पंजाब के दक्षिण-पश्चिमी और मालवा क्षेत्र में अत्यधिक केंद्रित देखी गई। फिरोजपुर जनपद 112 घटनाओं के साथ राज्य में शीर्ष पर रहा। इसके पश्चात बठिंडा में 80 और संगरूर में 78 सक्रिय स्थानों पर आग की पुष्टि हुई। सीमावर्ती जिले तरनतारन में भी 56 मामले प्रकाश में आए।
इन सांख्यिकीय आंकड़ों से प्रमाणित होता है कि पराली प्रबंधन के लिए बांटी गई इन-सीटू और एक्स-सीटू मशीनों की उपलब्धता के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर किसान परंपरागत आग लगाने के विकल्प को ही अपना रहे हैं। मालवा के सघन कृषि वाले जिलों में यह प्रवृत्ति व्यापक वायुमंडलीय धुंध (Smog) का कारण बन रही है।
खन्ना में हवा हुई ‘खराब’, पटियाला और लुधियाना भी प्रभावित
खेतों से उठते धुएं और स्थानीय औद्योगिक उत्सर्जन के संगम से पंजाब के शहरी क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता में भारी गिरावट देखी गई है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) के दैनिक बुलेटिन के अनुसार, खन्ना शहर का AQI 292 रिकॉर्ड हुआ, जो ‘खराब’ (Poor) श्रेणी के उच्चतम स्तर पर है। इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक शहर पटियाला में 210 और औद्योगिक महानगर लुधियाना में 201 का सूचकांक दर्ज किया गया।
अन्य प्रमुख शहरों में मंडी गोबिंदगढ़ 151, जालंधर 150 और अमृतसर 114 के मध्यम AQI पर रहे। वातावरण में पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5 और PM 10) की सघनता बढ़ने से खन्ना, पटियाला और आसपास के ग्रामीण इलाकों में सुबह और शाम के समय आंखों में गंभीर जलन, गले में खराश और सांस फूलने जैसी स्वास्थ्य जटिलताओं में भारी वृद्धि हुई है।
दिल्ली का AQI 350 के पार, लगभग 287 दिनों का सबसे खराब स्तर
पंजाब और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की गतिविधियों में आई अचानक तेजी का सीधा असर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की आबोहवा पर पड़ा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, 3 नवंबर को दिल्ली का औसत 24 घंटे का AQI 350 दर्ज किया गया, जो ‘बेहद खराब’ (Very Poor) श्रेणी में आता है। विश्लेषकों के अनुसार, बीते 287 दिनों की अवधि में यह राजधानी का सर्वाधिक प्रदूषित दिन रहा।
हालांकि, पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि दिल्ली के प्रदूषण में केवल पड़ोसी राज्यों की पराली ही एकमात्र कारक नहीं है। स्थानीय स्तर पर वाहनों से होने वाला धुआं, निर्माण स्थलों की उड़ती धूल और औद्योगिक कचरे का जलना भी आधारभूत प्रदूषण भार को बढ़ाते हैं। सर्दियों के शुरुआती दौर में हवा की मंद गति (Calm Wind) और तापमान के व्युत्क्रमण (Temperature Inversion) के कारण प्रदूषक तत्व सतह के पास ही जम जाते हैं, जिसे पराली का धुआं और अधिक विषाक्त बना देता है।
राजनीतिक घमासान और अंतर-राज्यीय आरोप-प्रत्यारोप
पराली की घटनाओं में आए इस भारी उछाल ने एक बार फिर अंतर-राज्यीय और राजनीतिक बयानबाजी को भड़का दिया है। दिल्ली और पंजाब के राजनीतिक नेतृत्व के बीच प्रदूषण के मुख्य स्रोतों को लेकर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। विपक्षी दलों ने राज्य सरकारों पर किसानों को पर्याप्त वित्तीय प्रोत्साहन और आधुनिक बेलर मशीनें उपलब्ध कराने में विफल रहने का आरोप लगाया है, जबकि सत्तापक्ष का तर्क है कि कुल आंकड़ों में पिछले वर्ष की तुलना में निरंतर सुधार हुआ है और किसानों को दंडित करने के बजाय वैकल्पिक तकनीकों से जोड़ने के दीर्घकालिक प्रयास किए जा रहे हैं।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने संबंधित जिलाधिकारियों और नोडल अधिकारियों को संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त तेज करने और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुल्क लगाने के निर्देश जारी किए हैं।
Punjab Stubble Burning: पराली प्रबंधन के समक्ष मौजूद व्यावहारिक चुनौतियां
वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच उपलब्ध 15 से 20 दिनों का सीमित समय किसानों के लिए सबसे बड़ा अवरोध है। सुपर एसएमएस, हैप्पी सीडर और स्मार्ट सीडर जैसी मशीनों के किराए और डीजल की बढ़ती लागत के चलते छोटे व सीमांत किसान त्वरित निस्तारण के लिए आग का सहारा लेते हैं।
आने वाले दिनों में जैसे-जैसे उत्तर भारत में तापमान में और गिरावट आएगी और हवा की गति धीमी होगी, पराली जलाने की प्रत्येक नई घटना समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और गंगा के मैदानी भूभाग में वायु आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकती है। प्रशासन के लिए आगामी दो सप्ताह इस मौसमी प्रदूषण को नियंत्रित करने की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण सिद्ध होने वाले हैं।
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