CJP Protest: CJP प्रोटेस्ट में बिना इंटरनेट कैसे हो रही है बात? जंतर-मंतर पर चर्चा में आई ऑफलाइन मैसेजिंग टेक्नोलॉजी

CJP Protest: जंतर-मंतर पर CJP प्रदर्शन: बिना इंटरनेट कैसे हो रही बात? जानें सच्चाई

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CJP Protest: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर इन दिनों नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर सीजेपी (CJP) का विरोध प्रदर्शन पूरी तेजी के साथ चल रहा है। इस आंदोलन में शामिल संगठन ने अपनी मांगें स्पष्ट करते हुए कह दिया है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, तब तक यह प्रदर्शन थमेगा नहीं।

दूसरी तरफ, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए तमाम प्रदर्शनकारियों से यह पुरजोर अपील की है कि वे अपना आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण बनाए रखें। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के मोर्चे पर दिल्ली पुलिस का कहना है कि स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है और प्रदर्शन स्थल के आसपास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।

लेकिन इन सबके बीच जमीन पर एक ऐसा सवाल तैर रहा है जिसने तकनीकी जानकारों और सुरक्षा एजेंसियों दोनों का ध्यान खींच लिया है। जब भीड़भाड़ वाले ऐसे इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी होती है या नेटवर्क धीमा होता है, तब प्रदर्शनकारी आपस में एक-दूसरे तक संदेश कैसे पहुंचा रहे हैं?

ऑफलाइन मैसेजिंग ऐप्स की चर्चा और पुलिस का रुख

हाल ही में सामने आई कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि इस तरह के हालात से निपटने के लिए युवा वर्ग ‘बाइटचैट’ (Bitchat) जैसे किसी ऑफलाइन मैसेजिंग एप्लिकेशन का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि, दिल्ली पुलिस या किसी अन्य आधिकारिक एजेंसी ने अभी तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है कि जंतर-मंतर पर वास्तव में इसी ऐप का उपयोग हो रहा है या नहीं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, ऐसे तमाम ऐप्स और उनकी कार्यप्रणाली की तकनीकी जांच की जा रही है ताकि यह समझा जा सके कि ये किस हद तक संवाद में मदद कर रहे हैं।

इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी कुछ वीडियो और संदेश तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें छात्रों और प्रदर्शनकारियों से इस तरह के वैकल्पिक साधनों को आजमाने की अपील की जा रही है।

कैसे काम करती है यह खास ऑफलाइन तकनीक?

आम तौर पर हम जिस भी मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल करते हैं, वे सभी चलने के लिए इंटरनेट डेटा या मोबाइल सेलुलर नेटवर्क पर निर्भर होते हैं। इसके विपरीत, बाइटचैट जैसे ऑफलाइन ऐप्स पारंपरिक इंटरनेट व्यवस्था से पूरी तरह अछूते रहकर काम करते हैं।

ये ऐप ब्लूटूथ लो एनर्जी (BLE) तकनीक का सहारा लेते हैं, जिसके जरिए फोन अपने आस-पास मौजूद अन्य मोबाइल उपकरणों से सीधे संपर्क स्थापित कर लेते हैं। जब एक ही इलाके में कई सारे स्मार्टफोन इस तकनीक के जरिए आपस में जुड़ जाते हैं, तो वे तकनीकी रूप से मिलकर एक ‘मेश नेटवर्क’ (Mesh Network) तैयार कर लेते हैं।

इस अनूठे नेटवर्क की सबसे बड़ी खूबी इसका संवाद भेजने का तरीका है। यदि इस दायरे में मौजूद कोई एक यूजर किसी दूसरे यूजर को संदेश भेजता है, तो वह संदेश सीधे इंटरनेट के जरिए नहीं जाता। बल्कि वह बीच में मौजूद अन्य लोगों के फोन्स से होते हुए आगे बढ़ता है और अंत में अपने सही गंतव्य तक पहुंच जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में हर एक स्मार्टफोन एक छोटे रिले टॉवर या सिग्नल पॉइंट की तरह काम करने लगता है।

CJP Protest: जितने ज्यादा लोग, उतनी लंबी होगी संवाद की पहुंच

मेश नेटवर्क की कार्यप्रणाली इस सिद्धांत पर टिकी है कि इसमें जितने अधिक लोग जुड़ेंगे, इस नेटवर्क का दायरा उतना ही बड़ा होता चला जाएगा। यही वजह है कि जब इंटरनेट सेवाएं काम नहीं कर रही होती हैं, तब भी इस तरह के ऐप्स सीमित भौगोलिक दायरे के भीतर सूचनाओं के आदान-प्रदान को मुमकिन बना देते हैं।

केवल एक ही ऐप तक यह तकनीक सीमित नहीं है। जानकारों का कहना है कि एंड्रॉयड और आईओएस (iPhone) दोनों प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे कई अन्य ऑफलाइन संचार साधन भी मौजूद हैं, जो ब्लूटूथ या वाई-फाई डायरेक्ट के माध्यम से बिना किसी इंटरनेट कनेक्शन केस आपस में बातचीत करने की सहूलियत देते हैं। ऐसे टूल्स का उपयोग आमतौर पर आपातकालीन आपदाओं के समय, प्राकृतिक आपदाओं में जब टावर टूट जाते हैं, या फिर बहुत दूर-दराज के इलाकों में किया जाता है जहां मोबाइल नेटवर्क की पहुंच नहीं होती।

CJP Protest: प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर

जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन के दौरान तकनीक के इस नए पहलू के सामने आने के बाद से सुरक्षा महकमे भी सतर्क हो गए हैं। इस बात का आकलन किया जा रहा है कि इस तरह के विकेंद्रीकृत और बिना सर्वर वाले नेटवर्क किस प्रकार कानून व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती बन सकते हैं।

फिलहाल, आधिकारिक रूप से इन दावों की सत्यता की जांच की जा रही है, लेकिन इस पूरी घटना ने यह जरूर साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक हर परिस्थिति में संवाद का कोई न कोई रास्ता तलाश ही लेती है। आंदोलन की दिशा क्या होगी और प्रशासन इस तकनीकी पहलू से कैसे निपटेगा, यह आने वाले दिनों की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

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