पंचकूला स्कूल की घटना ने बढ़ाई चिंता: छोटी उम्र में बच्चों में क्यों बढ़ रही है हिंसक प्रवृत्ति? जानें मनोवैज्ञानिक कारण

पंचकूला स्कूल की घटना के बाद बच्चों के व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठ रहे हैं।

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Aggressive Child: बचपन चंचलता, मासूमियत और सहज जिज्ञासा का पर्याय माना जाता है। हर बच्चा कभी न कभी जिद करता है, खिलौनों के लिए मचलता है या अपनी बात मनवाने के लिए क्षणिक गुस्सा जाहिर करता है। सामान्य परिस्थितियों में इसे बाल-सुलभ आचरण मानकर समझा-बुझा दिया जाता है, लेकिन जब यही गुस्सा बेकाबू आक्रामकता का रूप ले ले और दूसरे मासूम को गंभीर शारीरिक क्षति पहुंचाने लगे, तो यह केवल शरारत नहीं बल्कि गंभीर सामाजिक व मानसिक विकृति का संकेत बन जाता है। हरियाणा के पंचकूला स्थित एक प्रतिष्ठित सरकारी स्कूल में छह साल की एक नन्हीं बच्ची के साथ हुई स्तब्ध कर देने वाली घटना ने अभिभावकों, शिक्षकों और बाल मनोवैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। तीसरी कक्षा के महज आठ वर्षीय बालक द्वारा साथी छात्रा पर किए गए जानलेवा हमले के बाद समाज के सामने यह ज्वलंत प्रश्न खड़ा हो गया है कि इतनी कच्ची उम्र में बच्चों के कोमल मन में हिंसक प्रवृत्ति और बदले की भावना कैसे घर कर रही है।

Aggressive Child: पंचकूला स्कूल की दिल दहला देने वाली घटना और प्रशासनिक कार्रवाई

यह भयावह मामला 28 अक्टूबर 2026 को पंचकूला के सेक्टर-20 स्थित गवर्नमेंट मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सामने आया। किंडरगार्टन (KG) में अध्ययनरत छह वर्षीय मासूम बच्ची छुट्टी के बाद जब अपने सामान्य समय पर घर नहीं पहुंची, तो परिजनों में हड़कंप मच गया। तलाश के दौरान बच्ची स्कूल परिसर के ही एक सुनसान कमरे में लहुलुहान और अचेत अवस्था में पाई गई। उसके चेहरे और सिर पर गंभीर चोटों के निशान थे। उसे तत्काल गंभीर हालत में पीजीआई (PGI) चंडीगढ़ के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर में भर्ती कराया गया, जहां कई दिनों के गहन उपचार और डॉक्टरों की कड़ी मेहनत के बाद उसकी स्थिति में सुधार दर्ज किया गया।

मामले की जांच में सामने आया कि उसी स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले आठ साल के छात्र ने बच्ची पर भारी वस्तु से हमला किया था। सुरक्षा मानकों में घोर लापरवाही और समय पर निगरानी न रखने के आरोप में हरियाणा शिक्षा विभाग ने तत्काल संज्ञान लेते हुए स्कूल की प्राचार्या (प्रिंसिपल) और दो शिक्षकों को निलंबित कर दिया। वहीं, कानून के प्रावधानों के तहत नाबालिग आरोपी छात्र को बाल सुधार बोर्ड के समक्ष पेश कर उसका मनोवैज्ञानिक और न्यूरो-बिहेवियरल परीक्षण कराया गया है, ताकि यह समझा जा सके कि इस नन्हीं सी उम्र में उसके भीतर इस प्रकार के अनियंत्रित हिंसक आवेग के पीछे क्या कारण रहे।

बच्चों में अचानक उग्रता और अनियंत्रित गुस्से के मुख्य मनोवैज्ञानिक कारक

बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में आक्रामकता अचानक एक दिन में पैदा नहीं होती, बल्कि यह आंतरिक भावनात्मक असंतोष और बाहरी परिवेश का संचित परिणाम होती है। प्राथमिक अवस्था में बच्चे अपनी जटिल भावनाओं—जैसे असुरक्षा, भय, ईर्ष्या या अपमान—को शब्दों में ढालने में असमर्थ होते हैं। जब उनकी अनकही भावनाओं को कोई सुनने या समझने वाला नहीं होता, तो वे अपने तनाव को शारीरिक आक्रामकता या तोड़फोड़ के माध्यम से बाहर निकालने लगते हैं।

घर का अशांत माहौल बच्चों के व्यवहार को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। जिन परिवारों में माता-पिता के बीच लगातार तीखे विवाद, गाली-गलौज या घरेलू हिंसा होती है, वहां बच्चे अवचेतन रूप से यह सीख लेते हैं कि शक्ति प्रदर्शन या हिंसा ही विवादों को सुलझाने का एकमात्र तरीका है। इसके अलावा, अत्यधिक सख्त पेरेंटिंग, छोटी-छोटी बातों पर सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, कठोर शारीरिक दंड देना या इसके विपरीत पूरी तरह उपेक्षित छोड़ देना भी बच्चों के मन में गहरे भावनात्मक घाव बना देता है, जो आगे चलकर विद्रोह और हिंसक व्यवहार में बदल जाते हैं।

अनियंत्रित स्क्रीन टाइम और हिंसक गेमिंग का दुष्प्रभाव

वर्तमान डिजिटल दौर में बच्चों की दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा स्मार्टफोन, टैबलेट और ऑनलाइन गेमिंग की आभासी दुनिया में बीत रहा है। बच्चे जिस कच्ची उम्र में सही और गलत के बीच का नैतिक अंतर नहीं समझ पाते, उस उम्र में वे बिना किसी निगरानी के हिंसक वीडियो गेम्स, फाइटिंग क्लिप्स और आक्रामक ओटीटी सामग्री देख रहे हैं। अधिकांश सर्वाइवल और शूटिंग गेम्स में अंक हासिल करने या जीतने का जरिया केवल ‘मारना’ या ‘नष्ट करना’ होता है।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लंबे समय तक ऐसा हिंसक कंटेंट देखने से बच्चों का मस्तिष्क ‘डिसेंसिटाइज’ (संवेदना शून्य) हो जाता है। उन्हें दूसरों को दर्द या चोट पहुंचाना सामान्य और रोमांचक लगने लगता है। जब वास्तविक जीवन में किसी साथी के साथ छोटा सा मतभेद भी होता है, तो उनका मस्तिष्क तुरंत उसी हिंसक प्रतिक्रिया को दोहराने का प्रयास करता है जो उन्होंने स्क्रीन पर देखी थी। यद्यपि किसी अपराध के लिए केवल स्क्रीन टाइम को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, किंतु यह आक्रामक प्रवृत्तियों को भड़काने में एक बड़े उत्प्रेरक का कार्य अवश्य करता है।

व्यवहार संबंधी विकार: एडीएचडी (ADHD) और ओडीडी (ODD) की भूमिका

कुछ मामलों में बच्चों का उग्र व्यवहार केवल पारिवारिक या सामाजिक कारणों से ही नहीं, बल्कि जन्मजात न्यूरोलॉजिकल और बिहेवियरल विकारों से भी जुड़ा होता है। इनमें अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) और ऑपोजिशनल डेफिएंट डिसऑर्डर (ODD) प्रमुख हैं। एडीएचडी से पीड़ित बच्चों में आवेग नियंत्रण (इंपल्स कंट्रोल) की क्षमता बहुत कमजोर होती है; वे किसी भी कार्रवाई का परिणाम सोचे बिना क्षणिक उत्तेजना में कोई भी कदम उठा लेते हैं।

वहीं, ओडीडी (ODD) से ग्रसित बच्चे नियमों, शिक्षकों और माता-पिता के दिशा-निर्देशों के प्रति लगातार शत्रुतापूर्ण और विद्रोही रवैया अपनाते हैं। वे बहुत जल्दी आपा खो देते हैं और जानबूझकर दूसरों को परेशान या नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति दिखाते हैं। हालांकि, हर जिद्दी या गुस्सैल बच्चे को मानसिक विकार से ग्रस्त नहीं माना जा सकता। इसके लिए किसी प्रमाणित क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट द्वारा विधिवत बिहेवियरल असेसमेंट कराया जाना अनिवार्य होता है।

असामान्य व्यवहार दिखने पर अभिभावकों के लिए जरूरी कदम

यदि माता-पिता को अपने बच्चे के व्यवहार में लगातार चिड़चिड़ापन, साथियों के साथ मारपीट, पशुओं को सताने की आदत, अत्यधिक आक्रोश या एकांतवास जैसे लक्षण दिखाई दें, तो उसे सामान्य जिद मानकर अनदेखा करने की भूल कदापि न करें। माता-पिता को चाहिए कि वे प्रतिदिन बच्चे के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताएं, उसकी दिनभर की बातें बिना किसी पूर्वग्रह के सुनें और उसे यह विश्वास दिलाएं कि अपनी गलतियों या परेशानियों को साझा करने पर उसे प्रताड़ित नहीं किया जाएगा।

डिजिटल उपकरणों के उपयोग पर सख्त और स्वस्थ नियम लागू किए जाने चाहिए। बच्चे के स्मार्टफोन में पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स सक्रिय करें और सुनिश्चित करें कि वह अपनी उम्र के अनुकूल सामग्री ही देख रहा हो। इसके साथ ही, बच्चों को स्क्रीन से दूर मैदानी खेलों, चित्रकला, संगीत या तैराकी जैसी सकारात्मक शारीरिक गतिविधियों से जोड़ना चाहिए, जिससे उनकी अतिरिक्त ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो सके।

Aggressive Child: दंड के स्थान पर सहानुभूतिपूर्ण मार्गदर्शन और स्कूल की भूमिका

पंचकूला की इस अप्रिय घटना ने शैक्षणिक संस्थानों के ढांचे पर भी बड़े सवाल उठाए हैं। स्कूलों की जिम्मेदारी केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भावनात्मक विकास और आपसी संवाद की निगरानी करना भी है। प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को ‘सोशल-इमोशनल लर्निंग’ के तहत अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने, दूसरों के प्रति सहानुभूति (एम्पेथी) महसूस करने और मतभेदों को संवाद के जरिए सुलझाने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

हिंसक व्यवहार प्रदर्शित करने वाले बच्चे को केवल अपराधी मानकर अलग-थलग कर देने या कठोर दंड देने से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि इससे उसके भीतर प्रतिशोध की भावना और अधिक भड़क सकती है। ऐसे बच्चों को उचित मानसिक परामर्श, सुधारात्मक थेरेपी और परिवार के अटूट भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है। समय रहते बच्चों के बदलते मिजाज को पहचानना और उन्हें सही दिशा देना ही समाज को ऐसी दुखद घटनाओं से सुरक्षित रख सकता है।

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