BRICS Summit 2026: चीन के AI प्लान पर भारत सतर्क, शी जिनपिंग की पहल से बढ़ी चिंता

शी जिनपिंग ने साझा AI इकोसिस्टम का प्रस्ताव रखा, भारत ने डेटा और तकनीकी सुरक्षा पर जोर दिया

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BRICS Summit 2026: देश की राजधानी में संपन्न हुए 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल अर्थव्यवस्था को लेकर एक नया भू-रणनीतिक विमर्श खुलकर सामने आया है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सम्मेलन के उच्चस्तरीय सत्रों में ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच ओपन-सोर्स एआई आर्किटेक्चर, साझा एल्गोरिदम और एकीकृत डिजिटल बाजार विकसित करने का महत्वाकांक्षी प्रस्ताव प्रस्तुत किया। बीजिंग का यह प्रयास ब्रिक्स के माध्यम से पश्चिमी तकनीकी कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती देने और ग्लोबल साउथ में अपनी तकनीकी विशेषज्ञता का विस्तार करने के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, भारत ने इस प्रस्ताव पर अत्यधिक उत्साह दिखाने के बजाय सधी हुई कूटनीतिक सतर्कता का परिचय दिया है। भारतीय विदेश नीति और सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि तकनीकी साझेदारी के आवरण में चीनी तकनीकी दिग्गजों को बिना किसी नियामक प्रतिबंध के भारतीय और सहयोगी बाजारों तक निर्बाध पहुंच देना घरेलू विनिर्माण, डेटा संप्रभुता और स्वदेशी एआई स्टार्टअप्स के लिए गंभीर असंतुलन पैदा कर सकता है। सीमा पर तनाव, द्विपक्षीय व्यापार घाटा और रणनीतिक सुरक्षा चिंताओं के आलोक में भारत इस संपूर्ण ढांचे की सूक्ष्म समीक्षा कर रहा है।

BRICS Summit 2026: शी जिनपिंग का ब्रिक्स एआई मॉडल

चीनी राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव में मुख्य रूप से ब्रिक्स देशों के लिए एक साझा ओपन-सोर्स एआई इकोसिस्टम, उच्च-क्षमता कंप्यूटिंग नेटवर्क का आदान-प्रदान और डिजिटल विनिर्माण के मानकीकरण की वकालत की गई है। चीन का आधिकारिक तर्क है कि आधुनिक एआई क्रांति का लाभ केवल पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि विकासशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को भी उन्नत तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

किंतु इस प्रस्ताव का दूसरा और अधिक रणनीतिक पहलू ब्रिक्स देशों के भीतर एक बड़े एकीकृत बाजार (Unified Market) का निर्माण करना है। चीनी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कंपनियों का विनिर्माण आधार ब्रिक्स के अन्य सभी सदस्य देशों की तुलना में काफी विशाल है। यदि ब्रिक्स सहयोग के नाम पर तकनीकी व्यापार और निवेश नियमों को ढीला किया जाता है, तो चीनी कंपनियों को घरेलू बाजारों में ऐसा एकाधिकार मिल सकता है जो स्थानीय तकनीकी नवाचार को पीछे धकेल देगा। यही कारण है कि नई दिल्ली इसे केवल एक तकनीकी साझेदारी के रूप में नहीं, बल्कि अपने आर्थिक व तकनीकी प्रभाव को संस्थागत स्वरूप देने की बीजिंग की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देख रही है।

डेटा सुरक्षा, साइबर संप्रभुता और भारत की घरेलू प्राथमिकताएं

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में चीनी तकनीकी अनुप्रयोगों, मोबाइल ऐप्स और संवेदनशील दूरसंचार उपकरणों को लेकर एक अत्यंत सख्त और नियम-आधारित रुख अपनाया है। राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा संप्रभुता के आधार पर उठाए गए इन कदमों का उद्देश्य भारतीय नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और महत्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढांचे को साइबर हमलों से सुरक्षित रखना रहा है।

वर्तमान समय में भारत अपने स्वयं के स्वदेशी एआई इकोसिस्टम, ‘इंडिया एआई मिशन’ (IndiaAI Mission) और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) को तीव्र गति से आगे बढ़ा रहा है। ऐसे में किसी भी ऐसे साझा प्लेटफॉर्म से जुड़ना, जिसमें डेटा प्रवाह और एल्गोरिदम पर चीनी नियंत्रण हो, भारत की डेटा सुरक्षा प्राथमिकताओं के विपरीत हो सकता है। भारत की स्पष्ट मान्यता है कि एआई के क्षेत्र में कोई भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग पारदर्शी, विकेंद्रीकृत, नियम-सम्मत और सदस्य देशों की राष्ट्रीय डेटा संप्रभुता का पूर्ण सम्मान करने वाला होना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी की दो टूक चेतावनी: तकनीक और खनिजों का न हो ‘हथियारकरण’

शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना किसी देश का नाम लिए वैश्विक तकनीकी और ऊर्जा परिदृश्य पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण नीतिगत संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) और आधुनिक तकनीकों का राजनीतिक अथवा भू-रणनीतिक उद्देश्यों के लिए ‘हथियारकरण’ (Weaponization) कभी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे साझा वैश्विक विकास की नींव ही हिल जाती है।

यह टिप्पणी इस संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि चीन के पास दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Elements), सोलर पैनल्स और लिथियम-आयन बैटरी निर्माण से जुड़े प्रसंस्करण पर वैश्विक एकाधिकार है। प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट था कि किसी भी नई तकनीकी व्यवस्था में आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा और विविधता सुनिश्चित होनी चाहिए, ताकि कोई भी देश अपनी एकाधिकारवादी स्थिति का उपयोग अन्य संप्रभु राष्ट्रों पर दबाव बनाने के लिए न कर सके।

नई दिल्ली घोषणापत्र में संतुलन: सुरक्षित, भरोसेमंद और समावेशी एआई पर सहमति

भारत की सधी हुई कूटनीति का प्रमाण सम्मेलन के अंत में सर्वसम्मति से पारित ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ में स्पष्ट दिखाई दिया। भारतीय वार्ताकारों ने सुनिश्चित किया कि घोषणापत्र में एआई पर कोई भी ऐसा एकतरफा चीनी प्रारूप न जुड़े जो सदस्य देशों की संप्रभुता को सीमित करता हो। दस्तावेज में एआई को आर्थिक प्रगति के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में स्वीकार तो किया गया, किंतु इसके साथ ही इसके उपयोग को ‘सुरक्षित, भरोसेमंद, नैतिक और समावेशी’ (Safe, Trustworthy, and Inclusive) बनाए जाने पर विशेष बल दिया गया।

घोषणापत्र में भारत में आयोजित ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ के निष्कर्षों को प्रमुखता दी गई, जिसमें स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा जैसे जन-कल्याणकारी क्षेत्रों में एआई के लोकतंत्रीकरण की रूपरेखा तैयार की गई थी। इसके अतिरिक्त, एआई के उपयोग से जुड़े जोखिमों, जैसे कि डीपफेक, दुष्प्रचार, बौद्धिक संपदा अधिकारों के उल्लंघन और वित्तीय प्रणालियों में साइबर हस्तक्षेप को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियामक ढांचे की आवश्यकता पर सभी देशों ने सहमति व्यक्त की।

घरेलू स्टार्टअप्स का संरक्षण बनाम अंतरराष्ट्रीय सहयोग का संतुलन

भारत के लिए यह समय अपने घरेलू स्टार्टअप्स, सेमीकंडक्टर मिशन और एआई रिसर्च लैब्स को फलने-फूलने का अनुकूल वातावरण देने का है। देश में दो लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप्स और दर्जनों एआई-केंद्रित यूनिकॉर्न्स कार्य कर रहे हैं। यदि भारतीय बाजार में किसी विदेशी शक्ति-समर्थित प्लेटफॉर्म को अनियंत्रित पहुंच दी जाती है, तो इससे घरेलू नवाचार की गति बाधित होने की आशंका बढ़ जाती है।

भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण यह है कि वह ब्रिक्स के अन्य साझेदारों—जैसे ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और नव-प्रवेशी सदस्य देशों—के साथ मिलकर एआई के अनुप्रयोगों पर द्विपक्षीय व बहुपक्षीय संवाद जारी रखेगा, किंतु किसी भी ऐसे तंत्र पर हस्ताक्षर करने से बचेगा जो भारत के अपने नियामक अधिकारों और सुरक्षा मानकों को कमजोर करता हो। यह संतुलन भारत को अपनी तकनीकी स्वतंत्रता बनाए रखने में सक्षम बनाएगा।

BRICS Summit 2026: निष्कर्ष

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति की एआई पहल पर भारत का सतर्क और परिपक्व दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि आधुनिक कूटनीति केवल सीमाओं और व्यापार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका केंद्र अब एल्गोरिदम, चिप्स और डेटा आर्किटेक्चर बन चुका है। भारत बहुपक्षीय सहयोग और ग्लोबल साउथ के तकनीकी सशक्तिकरण का प्रबल समर्थक है, किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा संप्रभुता और घरेलू तकनीकी उद्योग की सुरक्षा की कीमत पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। वर्ष 2027 में जब चीन ब्रिक्स की अगली अध्यक्षता संभालेगा, तब भारत का यह सतर्क रुख समूह के भीतर तकनीकी संतुलन बनाए रखने में सबसे निर्णायक शक्ति सिद्ध होगा।

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