Bihar Jeevika Didi Library: 118 पुस्तकालयों से जुड़े 1 लाख से अधिक युवा, बेटियों को मिला नया मंच

बिहार के 118 सामुदायिक पुस्तकालयों में 61% बेटियां, शिक्षा और करियर को मिल रहा बढ़ावा

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Bihar Jeevika Didi Library: बिहार के ग्रामीण अंचलों में सामाजिक बदलाव और महिला सशक्तिकरण की एक मूक क्रांति आकार ले रही है। बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (BRLPS) यानी ‘जीविका’ के तत्वावधान में संचालित ‘सामुदायिक पुस्तकालय सह करियर विकास केंद्र’ अब केवल किताबें पढ़ने का साधारण ठिकाना नहीं रहे, बल्कि गांव-देहात के युवाओं के लिए डिजिटल साक्षरता, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और करियर मार्गदर्शन के आधुनिक केंद्र बनकर उभरे हैं। ग्रामीण विकास विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य भर में संकुल स्तरीय संघों (CLF) के माध्यम से वर्तमान में 118 पुस्तकालय सफलतापूर्वक संचालित किए जा रहे हैं, जिनसे अब तक 1 लाख से अधिक युवा, किशोर और महिलाएं सक्रिय रूप से जुड़ चुके हैं।
इस अनूठी पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ग्रामीण बेटियों के सपनों को नए पंख दे रही है। इन केंद्रों पर नियमित अध्ययन के लिए आने वाले कुल शिक्षार्थियों में बेटियों की हिस्सेदारी 61 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है। सुदूर गांवों में अध्ययन के शांत माहौल, डिजिटल संसाधनों और इंटरनेट की अनुपलब्धता से जूझने वाली छात्राओं के लिए ये पुस्तकालय वरदान सिद्ध हो रहे हैं।

Bihar Jeevika Didi Library: 118 केंद्रों में रोज जुटते हैं हजारों विद्यार्थी, 61 फीसदी बेटियां

ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सबसे बड़ी बाधा अध्ययन सामग्री की कमी और अनुकूल माहौल का न होना रहा है। आर्थिक तंगी के कारण निर्धन परिवारों के छात्र महंगे कोचिंग संस्थानों या शहरों का रुख नहीं कर पाते। इस खाई को पाटने के लिए जीविका द्वारा स्थापित ये पुस्तकालय सप्ताह के सातों दिन प्रातः 9:30 बजे से सायं 5:00 बजे तक खुले रहते हैं।
प्रत्येक केंद्र पर प्रतिदिन औसतन 50 से 70 विद्यार्थी अध्ययन के लिए पहुंचते हैं। समूचे राज्य में प्रतिदिन लगभग 5,000 से 7,000 छात्र-छात्राएं इन केंद्रों में बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं, जिनमें जीविका दीदियों के बच्चे भी बड़ी तादाद में शामिल हैं। 61 प्रतिशत छात्राओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि सुरक्षा, निकटता और अनुकूल वातावरण मिलने पर ग्रामीण बेटियां उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं की तैयारी में किसी से पीछे नहीं हैं।

पुस्तकों से आगे: डिजिटल टूल्स और करियर मेंटरिंग का साझा मंच

इन सामुदायिक केंद्रों को पारंपरिक पुस्तकालयों से अलग बनाते हुए आधुनिक तकनीक से सुसज्जित किया गया है। प्रत्येक केंद्र पर कंप्यूटर, टैबलेट, हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अद्यतन पुस्तकें, राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र और मासिक पत्रिकाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
वर्तमान समय में भर्ती परीक्षाओं के फॉर्म भरने से लेकर ऑनलाइन मॉक टेस्ट देने तक की पूरी प्रक्रिया इंटरनेट आधारित हो चुकी है। गांवों में इंटरनेट कैफे के अभाव या महंगे शुल्कों से जूझने वाले विद्यार्थियों को यहां नि:शुल्क या न्यूनतम सदस्यता शुल्क पर सभी डिजिटल सुविधाएं मिलती हैं। इसके अतिरिक्त, समय-समय पर विषय विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से करियर काउंसलिंग सत्र, ऑनलाइन वेबिनार और मेंटरिंग की व्यवस्था की जाती है, जिससे छात्रों को लक्ष्य निर्धारण में सीधी मदद मिलती है।

ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की पहल

आर्थिक मजबूरी, सामाजिक दबाव या पारिवारिक परिस्थितियों के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ देने वाले (ड्रॉपआउट) युवाओं के लिए ये पुस्तकालय पुनर्वास का केंद्र बन रहे हैं। केंद्र संचालक ऐसे छात्र-छात्राओं की पहचान कर उन्हें दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए प्रेरित करते हैं।
इन केंद्रों के माध्यम से राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS), बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन (BBOSE) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) जैसी दूरस्थ शिक्षा प्रणालियों में ड्रॉपआउट विद्यार्थियों का नामांकन कराया जा रहा है। इससे उन किशोरों और युवतियों को मैट्रिक, इंटरमीडिएट और स्नातक की पढ़ाई पूरी करने का अवसर मिल रहा है, जिनकी शिक्षा औपचारिक स्कूलों से छूट चुकी थी।

‘विद्या दीदी’: चूल्हा-चौका छोड़ डिजिटल एडुप्रेन्योर बनीं ग्रामीण महिलाएं

इस पूरी परियोजना का दूसरा सबसे सशक्त पहलू ग्रामीण महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को निखारना है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी शिक्षित और जागरूक महिलाओं को इन पुस्तकालयों के प्रबंधन का दायित्व सौंपा गया है, जिन्हें स्थानीय स्तर पर ‘विद्या दीदी’ के रूप में नई सामाजिक पहचान मिली है।
विद्या दीदियों की भूमिका केवल रजिस्टर मेंटेन करने तक सीमित नहीं है। वे कंप्यूटर संचालन, ऑनलाइन पोर्टल नेविगेशन, विद्यार्थियों को डिजिटल सेवाओं से जोड़ने और अध्ययन सामग्री के उचित रख-रखाव का कार्य स्वयं संभालती हैं। इसके एवज में उन्हें नियमित मासिक मानदेय प्राप्त होता है। आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ-साथ समाज में उनकी प्रतिष्ठा में भारी वृद्धि हुई है और वे गांव के विकास निर्णयों में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और स्थानीय प्रतिभाओं का उभार

बिहार में बीपीएससी, एसएससी, रेलवे, पुलिस, शिक्षक भर्ती और बैंकिंग परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की एक बहुत बड़ी आबादी है। जीविका पुस्तकालयों में एनसीईआरटी की आधारभूत पुस्तकों से लेकर आधुनिक सामान्य ज्ञान और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के सेट उपलब्ध कराए गए हैं।
गांव में ही समूह चर्चा (ग्रुप डिस्कशन) और शांत वातावरण मिलने से छात्रों की तैयारी में निरंतरता बनी रहती है। कई केंद्रों से नियमित अध्ययन करने वाले छात्र प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं में सफलता हासिल कर रहे हैं, जिससे पूरे गांव में शिक्षा के प्रति एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा का वातावरण निर्मित हो रहा है।

Bihar Jeevika Didi Library: निष्कर्ष

बिहार में जीविका दीदी की लाइब्रेरी परियोजना यह प्रमाणित करती है कि जब शिक्षा, तकनीक और महिला नेतृत्व का संगम होता है, तो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुंचाई जा सकती है। 118 केंद्रों से 1 लाख से अधिक युवाओं का जुड़ाव और बेटियों की 61 प्रतिशत सशक्त भागीदारी बिहार के ग्रामीण भविष्य की एक उज्ज्वल तस्वीर पेश करती है। यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी ग्रामीण मानव संसाधन विकास और महिला स्वावलंबन का एक प्रेरक उदाहरण बनकर उभरा है।

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