Bihar Flood Alert: मानसून में सूखे जैसे हालात के बावजूद बिहार में क्यों आई इतनी भीषण बाढ़, जानें पूरी वजह
Bihar Flood Alert: कम बारिश के बावजूद गंगा ने तोड़े जलस्तर के रिकॉर्ड, जानें बिहार में भीषण बाढ़ आने के पीछे की असली वजहें।
Bihar Flood Alert: बिहार में इस साल मानसून के दौरान ज्यादातर समय बारिश की भारी कमी देखी गई, लेकिन इसके बावजूद राज्य को अपने इतिहास की सबसे भीषण बाढ़ जैसे हालात का सामना करना पड़ा। एक जून से आठ सितंबर के बीच राज्य में सामान्य से 27 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी, और एक सितंबर तक तो यह कमी 30 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। ऐसे हालात में अचानक नदियों का उफान पर आना और गंगा का पटना व भागलपुर में जलस्तर के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ देना कई सवाल खड़े करता है। पटना के गांधी घाट पर गंगा 50.58 मीटर तक पहुंच गई, जो 2016 के पुराने रिकॉर्ड से छह सेंटीमीटर ज्यादा था, वहीं भागलपुर के सुल्तानगंज में जलस्तर 36.80 मीटर तक पहुंचकर 2021 के उच्चतम स्तर को भी पार कर गया। नौ सितंबर तक यह बाढ़ राज्य के 14 जिलों के 84 ब्लॉकों, 518 पंचायतों और 2,157 गांवों तक फैल चुकी थी, जिससे करीब 40.51 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए। आगे जानते हैं कि आखिर कम बारिश के बावजूद बिहार में यह भीषण बाढ़ क्यों आई।
Bihar Flood Alert: इस बार बदला रहा बाढ़ का पैटर्न
बिहार के उपमुख्यमंत्री और जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी के अनुसार, इस बार बाढ़ का सामान्य पैटर्न पूरी तरह बदल गया था। आमतौर पर नेपाल से आने वाली कोसी, गंडक, बागमती और कमला जैसी नदियां पहले उफान पर आती हैं और बाद में गंगा चढ़ती है, लेकिन इस बार सबसे पहले गंगा ने ही विकराल रूप ले लिया। चूंकि गंगा उत्तर प्रदेश से होते हुए बिहार में प्रवेश करती है, इसलिए प्रयागराज और वाराणसी जैसे ऊपरी इलाकों में हुई भारी बारिश का पूरा पानी बहकर बिहार तक जा पहुंचा।
सितंबर की शुरुआत में हुई अचानक भारी बारिश
बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव संतोष कुमार मल्ल के मुताबिक, पड़ोसी राज्यों से छोड़ा गया पानी और पूर्वी चंपारण व सीतामढ़ी जैसे इलाकों में हुई अचानक मूसलाधार बारिश ने हालात को बिगाड़ दिया। पूरे मानसून सीजन में भले ही बारिश कम रही हो, लेकिन सितंबर के शुरुआती दिनों में ही सामान्य से 31 प्रतिशत ज्यादा बारिश दर्ज हुई। इस अचानक हुई भारी बारिश ने पहले से कमजोर पड़ी नदी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया।
तिब्बत में ग्लेशियर झील फटने का असर
26 अगस्त को तिब्बत में ग्लेशियर झील फटने की घटना से नेपाल में भारी बाढ़ आ गई थी, जिसके बाद बिहार सरकार ने एहतियात के तौर पर गंडक नदी पर बने वाल्मीकिनगर बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए। हालांकि इस कदम से गंडक का पानी तो निकल गया, लेकिन असली मुसीबत गंगा के लगातार बढ़ते जलस्तर ने खड़ी कर दी। गंगा के अत्यधिक उफान ने गंडक और पुनपुन जैसी सहायक नदियों के लिए बैकवाटर इफेक्ट पैदा कर दिया, यानी मुख्य नदी पहले से लबालब भरी होने के कारण सहायक नदियों का पानी उसमें समा नहीं सका और आसपास के इलाकों में फैलने लगा।
नदियों के जाल ने बढ़ाया बाढ़ का दायरा
गंगा बक्सर के रास्ते बिहार में प्रवेश करती है और पूर्व की ओर बहते हुए पटना, भोजपुर, वैशाली, बेगूसराय और भागलपुर जैसे बड़े इलाकों को प्रभावित करती है। इसके साथ ही नेपाल से उतरने वाली नदियां बिहार के समतल मैदानी इलाकों में आकर गंगा से मिल जाती हैं। इस दौरान कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक और बागमती नदियां भी अलग-अलग स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीं, जिससे बाढ़ का असर सैकड़ों किलोमीटर दूर के इलाकों तक महसूस किया गया।
सुरक्षित तटबंधों के बावजूद क्यों डूबे इलाके
सरकार का कहना है कि बिहार में 3,730 किलोमीटर से ज्यादा लंबे तटबंधों में कोई बड़ी दरार नहीं आई और उन्होंने काफी हद तक सुरक्षा प्रदान की। इसके बावजूद रिसाव, पुरानी संरचनाओं के ऊपर से पानी बहने और जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होने के कारण पानी निचले इलाकों में भरता चला गया। इस वजह से तटबंध सुरक्षित रहने के बावजूद बड़ी आबादी बाढ़ की चपेट में आ गई।
गाद जमाव बना बिहार की स्थायी समस्या
गंगा, कोसी और गंडक जैसी नदियां पहाड़ों से भारी मात्रा में मिट्टी और गाद बहाकर लाती हैं, जो सालों-साल नदी की तली में जमती रहती है। इससे नदी की गहराई लगातार कम होती जाती है, और थोड़ा भी अतिरिक्त पानी आते ही नदी उफनकर किनारों से बाहर बहने लगती है। बिहार के कई राजनेताओं का मानना है कि 1970 के दशक में बने फरक्का बैराज ने गाद के प्राकृतिक बहाव को रोककर इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।
Bihar Flood Alert: फरक्का संधि को लेकर बढ़ती मांग
1996 के भारत-बांग्लादेश फरक्का समझौते की तीस साल की अवधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है, और इसकी समय-सीमा नजदीक आते ही बिहार में इसे रद्द या संशोधित करने की मांग तेज हो गई है। इसके साथ ही बिहार का सपाट भूगोल और घनी आबादी भी बाढ़ की तबाही को बड़ा बना देती है। नदियां अक्सर अपना रास्ता बदलकर दियारा यानी नदी के बीच अस्थायी द्वीप बना देती हैं, जहां हजारों लोग बसे होते हैं, और जलस्तर बढ़ते ही इन्हें सुरक्षित निकालना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
बिहार में इस साल की बाढ़ ने यह साफ कर दिया है कि कम बारिश के बावजूद नदियों का बदलता व्यवहार, गाद जमाव और पड़ोसी क्षेत्रों में हुई अचानक भारी बारिश किस तरह भीषण तबाही का कारण बन सकते हैं। गंगा के रिकॉर्ड जलस्तर से लेकर फरक्का बैराज को लेकर उठ रही मांगों तक, यह घटना बिहार की नदी प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आने वाले समय में फरक्का संधि की समय-सीमा खत्म होने के साथ यह मुद्दा और बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक रंग ले सकता है, जिस पर आने वाले महीनों में बड़े फैसले होने की उम्मीद जताई जा रही है।
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