UK Breakup: क्या टूटने की ओर बढ़ रहा यूनाइटेड किंगडम? 3 क्षेत्रों ने उठाई आजादी की मांग
स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के दलों ने आत्मनिर्णय व जनमत संग्रह की मांग उठाई
UK Breakup: यूनाइटेड किंगडम (UK) के 300 से अधिक वर्षों के एकीकृत संवैधानिक इतिहास में सबसे बड़ा राजनीतिक और संस्थागत संकट गहराता नजर आ रहा है। स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के प्रमुख राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता समर्थक राजनीतिक दलों ने पहली बार एक साझा मंच बनाकर लंदन स्थित वेस्टमिंस्टर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वेल्स की राजधानी कार्डिफ में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक राजनीतिक सम्मेलन के जरिए इन तीनों क्षेत्रों के शीर्ष नेता एक संयुक्त समझौता पत्र जारी करने की तैयारी में हैं, जिसमें ब्रिटिश हुकूमत से यह स्पष्ट मांग की जा रही है कि वह इन क्षेत्रों के नागरिकों के लोकतांत्रिक आत्मनिर्णय (Right to Self-Determination) और जनमत संग्रह के संवैधानिक अधिकार को औपचारिक मान्यता प्रदान करे।
ब्रिटेन के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में यह पहला अवसर है जब स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड तीनों ही स्वायत्त (Devolved) प्रशासनों की कमान स्वतंत्रता अथवा पूर्ण संवैधानिक स्वायत्तता का समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों के हाथों में है। हालांकि, इस संयुक्त राजनीतिक हलचल का अर्थ यह कतई नहीं है कि यूनाइटेड किंगडम रातों-रात चार अलग-अलग टुकड़ों में विभाजित हो जाएगा, क्योंकि ब्रिटेन के अलिखित संविधान और संसदीय संप्रभुता के नियमों के तहत किसी भी क्षेत्र को अलग होने के लिए वेस्टमिंस्टर संसद की विधायी संस्तुति अनिवार्य होती है।
UK Breakup: तीन अलग-अलग राष्ट्रों का एक साझा कूटनीतिक मोर्चा
कार्डिफ में आयोजित होने वाली इस अभूतपूर्व उच्चस्तरीय बैठक में स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर और स्कॉटिश नेशनल पार्टी (SNP) के नेता जॉन स्विनी, वेल्स की राष्ट्रवादी पार्टी प्लेड कम्री (Plaid Cymru) के प्रमुख रून एप इओरवेर्थ, उत्तरी आयरलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर मिशेल ओ’नील और सिन फेन (Sinn Féin) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मैरी लू मैकडॉनल्ड एक साथ मंच साझा करेंगे।
इस साझा मोर्चे की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत यह है कि अब तक लंदन की सरकारें इन तीनों क्षेत्रों से अलग-अलग स्तर पर निपटती रही हैं, जिससे स्वतंत्रता की मांगों को क्षेत्रीय कहकर आसानी से खारिज किया जाता रहा। अब इन तीनों क्षेत्रों के नेताओं द्वारा एक साथ खड़े होकर एक सुर में संवैधानिक स्वायत्तता और जनमत संग्रह की मांग उठाना ब्रिटिश संसद और डाउनिंग स्ट्रीट पर एक असाधारण मनोवैज्ञानिक व राजनीतिक दबाव उत्पन्न कर रहा है।
स्कॉटलैंड में ‘इंडिपेंडेंस रेफरेंडम’ की मांग: कानूनी बाध्यताएं और राजनीतिक गतिरोध
स्कॉटलैंड में ब्रिटेन से अलग होने की मांग सबसे मुखर और व्यवस्थित रही है। यद्यपि वर्ष 2014 के जनमत संग्रह में 55 प्रतिशत मतदाताओं ने यूके के साथ बने रहने के पक्ष में मतदान किया था, किंतु 2016 के ब्रेक्जिट (Brexit) के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। ब्रेक्जिट जनमत संग्रह में जहां स्कॉटलैंड की 62 प्रतिशत जनता ने यूरोपीय संघ (EU) में रहने के लिए वोट दिया था, वहीं पूरे ब्रिटेन के समग्र बहुमत के चलते स्कॉटलैंड को अपनी इच्छा के विरुद्ध ईयू से बाहर होना पड़ा।
इसी आधार पर स्कॉटिश नेशनल पार्टी लगातार दूसरे स्वतंत्रता जनमत संग्रह की मांग कर रही है। स्कॉटिश सरकार ने औपचारिक रूप से ड्राफ्ट इंडिपेंडेंस रेफरेंडम बिल भी तैयार किया है, जिसका सीधा प्रश्न यही है कि क्या स्कॉटलैंड को एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र होना चाहिए। हालांकि, ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत और संवैधानिक स्थिति यह साफ करती है कि स्कॉटलैंड की संसद (होलीरूड) एकतरफा तरीके से कोई कानूनी बाध्यकारी जनमत संग्रह नहीं करा सकती। इसके लिए वेस्टमिंस्टर संसद द्वारा स्कॉटलैंड अधिनियम की धारा 30 के तहत विशेष वैधानिक शक्तियां सौंपा जाना अनिवार्य है, जिसे देने से लंदन की सरकार लगातार इनकार करती रही है।
वेल्स में प्लेड कम्री का उभार और अधिक स्वायत्तता का संघर्ष
वेल्स का इतिहास पारंपरिक रूप से लेबर पार्टी का गढ़ रहा है और वहां स्वतंत्रता आंदोलन स्कॉटलैंड की तुलना में धीमा रहा है। किंतु हालिया वर्षों में लंदन सरकार द्वारा शक्तियों के केंद्रीकरण, बुनियादी ढांचे में कम निवेश और वेल्श भाषा व संस्कृति की अनदेखी के चलते वहां अलगाववादी भावनाएं तेजी से मजबूत हुई हैं।
प्लेड कम्री के नेतृत्व में वेल्स की स्वायत्त सरकार अब यह तर्क दे रही है कि वेल्स के प्राकृतिक जल संसाधनों, हरित ऊर्जा परियोजनाओं और आर्थिक नीतियों पर पहला अधिकार कार्डिफ की संसद का होना चाहिए। वेल्स का इस साझा मोर्चे में शामिल होना लंदन के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि इसने ब्रिटेन के विखंडन की बहस को केवल ‘स्कॉटिश समस्या’ से आगे ले जाकर पूरे द्वीप के असंतोष में बदल दिया है।
उत्तरी आयरलैंड और गुड फ्राइडे समझौता: स्वतंत्रता नहीं, एकीकरण का लक्ष्य
उत्तरी आयरलैंड का संवैधानिक समीकरण स्कॉटलैंड और वेल्स से पूरी तरह भिन्न और अधिक संवेदनशील है। सिन फेन का अंतिम लक्ष्य ब्रिटेन से केवल अलग होना नहीं, बल्कि आयरलैंड गणराज्य (Republic of Ireland) के साथ मिलकर एक ‘अखंड आयरलैंड’ (United Ireland) का निर्माण करना है।
उत्तरी आयरलैंड में भविष्य के जनमत संग्रह का वैधानिक आधार 1998 का ऐतिहासिक ‘गुड फ्राइडे समझौता’ (Belfast Agreement) है। इस अंतरराष्ट्रीय शांति समझौते में यह स्पष्ट रूप से निहित है कि यदि कभी ब्रिटिश सरकार को यह प्रतीत होता है कि उत्तरी आयरलैंड के अधिकांश नागरिक आयरलैंड के साथ एकीकरण के पक्ष में हैं, तो उत्तरी आयरलैंड के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के लिए सीमा जनमत संग्रह (Border Poll) आयोजित कराना अनिवार्य होगा। जनसांख्यिकीय बदलावों और आयरिश कैथोलिक आबादी की बढ़ती हिस्सेदारी ने इस मुद्दे को ब्रिटेन के लिए सबसे जटिल भू-राजनीतिक पहेली बना दिया है।
ब्रिटिश सरकार का रुख: आर्थिक प्राथमिकताओं का हवाला और स्पष्ट इनकार
लंदन स्थित ब्रिटिश सरकार ने तीनों स्वायत्त क्षेत्रों की इस संयुक्त पहल को खारिज करते हुए दोहराया है कि किसी भी नए जनमत संग्रह के लिए कोई संवैधानिक या राजनीतिक जनादेश मौजूद नहीं है। ब्रिटेन के स्कॉटलैंड कार्यालय का स्पष्ट मानना है कि इस समय देश का संपूर्ण ध्यान उच्च मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने, आर्थिक विकास को गति देने, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) को सुधारने और वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों से निपटने पर केंद्रित होना चाहिए।
ब्रिटिश हुकूमत का रुख यह भी है कि 2014 का स्कॉटिश जनमत संग्रह ‘एक पीढ़ी में एक बार’ होने वाला फैसला था, जिसे बार-बार दोहराया नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त, वेस्टमिंस्टर का तर्क है कि यदि यूनाइटेड किंगडम का विखंडन होता है, तो इससे मुद्रा संकट, व्यापारिक सीमाएं, पेंशन व रक्षा तंत्र का विभाजन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन के स्थायी वैश्विक प्रभाव (UNSC वीटो शक्ति और नाटो नेतृत्व) को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।
UK Breakup: निष्कर्ष
कार्डिफ में आयोजित होने वाला यह साझा सम्मेलन यूनाइटेड किंगडम के भविष्य को लेकर एक नए और अधिक आक्रामक संवैधानिक संघर्ष की शुरुआत का संकेत है। हालांकि, कानूनी और संसदीय नियंत्रण लंदन के पास होने के कारण ब्रिटेन का तत्काल बिखरना संभव नहीं दिखता, किंतु स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता की ललक, वेल्स की बढ़ती स्वायत्तता की मांग और उत्तरी आयरलैंड के ऐतिहासिक एकीकरण का सपना मिलकर ब्रिटिश संघ की नींव को भीतर से हिला रहे हैं। आने वाले वर्षों में जनमत के बदलते रुझान और आम चुनावों के नतीजे ही यह तय करेंगे कि सदियों पुराना यह संघ अपनी मौजूदा सीमाओं के साथ अक्षुण्ण रह पाता है अथवा वैश्विक मानचित्र पर नए स्वतंत्र राष्ट्रों के उदय की पटकथा लिखी जाती है।
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