Bihar Bridge Safety: बिहार में पुलों की हालत चिंताजनक, नए ब्रिज भी दरारों की चपेट में, सुरक्षा पर उठे सवाल
Bihar Bridge Safety: रखरखाव की कमी, भारी जाम और ओवरलोडिंग से बेहाल हुए बिहार के पुल; कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा।
Bihar Bridge Safety: बिहार में पुलों की सुरक्षा और उनकी संरचनात्मक स्थिति को लेकर एक बार फिर बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं। राज्य के कई प्रमुख और बड़े पुलों की सेहत इस समय चिंताजनक बनी हुई है। भागलपुर के विक्रमशिला सेतु पर हुई घटना के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा है। लेकिन हकीकत यह है कि राज्य के कई अन्य महत्वपूर्ण पुल भी इस समय घोर लापरवाही, रखरखाव (मेंटेनेंस) की कमी और ओवरलोडेड वाहनों के अत्यधिक दबाव से जूझ रहे हैं।
इंजीनियरों और विशेषज्ञों के मुताबिक, पुलों पर घंटों तक भारी वाहनों के खड़े रहने और समय पर मरम्मत न होने के कारण उनकी काया कमजोर होती जा रही है। यदि समय रहते इन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो राज्य में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। आइए जानते हैं बिहार के उन प्रमुख पुलों का हाल, जिनकी स्थिति इस समय चिंता का विषय बनी हुई है।
Bihar Bridge Safety, बाबा विशु राउत पुल: उद्घाटन के 11 साल बाद भी मेंटेनेंस गायब
कोसी नदी पर बना बाबा विशु राउत पुल (विजय घाट पुल) अंग और मिथिलांचल क्षेत्र को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इस पुल का उद्घाटन 18 मई 2015 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था। उस समय कोसी दियारा के हजारों परिवारों के लिए यह पुल किसी वरदान से कम नहीं था, क्योंकि बारिश के दिनों में जिला मुख्यालय से उनका संपर्क पूरी तरह कट जाता था।
लेकिन उद्घाटन के 11 साल बीत जाने के बाद भी यह पुल आज खुद बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है:
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अंधेरे में डूबा पुल: पुल के निर्माण के समय लाइट लगाने के लिए जगह तो छोड़ी गई थी, लेकिन आज तक एक भी बल्ब नहीं लगाया गया। रात होते ही पूरा पुल पूरी तरह अंधेरे में डूब जाता है, जिससे यह ‘एक्सीडेंट स्पॉट’ बन चुका है।
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सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे: कदवा अप्रोच रोड पर बड़े-बड़े गड्ढे हो गए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इन गड्ढों और अंधेरे के कारण हर महीने यहां करीब आधा दर्जन दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
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अधिकारियों की नींद नहीं खुली: स्थानीय जिला परिषद सदस्य नंदिनी सरकार ने बताया कि उन्होंने पुल की इस बदहाली को लेकर भागलपुर के जिलाधिकारी (DM) और संबंधित विभाग के मंत्रियों को कई बार आवेदन दिया। हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, लेकिन 11 साल में एक बार भी पुल का मेंटेनेंस नहीं कराया गया।
लखीसराय बाईपास रेल ओवरब्रिज: महज 6 साल में सुपर स्ट्रक्चर में आई दरार
पूर्वी बिहार और झारखंड को जोड़ने वाली लाइफलाइन माना जाने वाला लखीसराय बाईपास रेल ओवरब्रिज (ROB) इस समय गंभीर तकनीकी खामियों से जूझ रहा है। लगभग 1200 मीटर लंबे इस पुल का उद्घाटन करीब छह साल पहले हुआ था। लेकिन हाल ही में हुए निरीक्षण के दौरान इसके सुपर स्ट्रक्चर स्पैन में दरारें देखने को मिली हैं।
इतने कम समय में पुल में दरार आने के बाद इसकी निर्माण गुणवत्ता और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पथ निर्माण विभाग ने एहतियातन इस पुल पर भारी वाहनों के आने-जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
श्रीकृष्ण सेतु मुंगेर: विक्रमशिला बंद होने से बढ़ा वाहनों का दबाव
गंगा नदी पर बना 3.75 किलोमीटर लंबा श्रीकृष्ण सेतु उत्तर बिहार, कोसी और सीमांचल के जिलों को मुंगेर, लखीसराय और जमुई से जोड़ता है। इस पुल का उद्घाटन 16 जनवरी 2022 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया था।
इस पुल को 70 टन भार क्षमता वाले वाहनों के लिए डिजाइन किया गया है और वर्तमान में इस पर 20 टन से अधिक के वाहनों के परिचालन की अनुमति नहीं है। हालांकि, विक्रमशिला सेतु के बंद होने के बाद से इस पुल पर वाहनों का दबाव अचानक दोगुना से भी ज्यादा बढ़ गया है। पहले जहां इस पुल से रोजाना 2500 वाहन गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 5500 के पार पहुंच गई है।
एनएचएआई (NHAI) के परियोजना निदेशक मनीष कुमार के अनुसार, चेन्नई की एक विशेषज्ञ टीम हर दो साल पर इस पुल की विस्तृत तकनीकी जांच (पिलर, गार्डर, कंपन क्षमता की टेस्टिंग) करती है। वर्तमान में पुल पूरी तरह सुरक्षित है, लेकिन जाम के कारण भारी वाहनों का लंबे समय तक पुल पर खड़ा रहना इसके सस्पेंशन और बीम पर अतिरिक्त दबाव बना रहा है।
राजेंद्र पुल: सड़क मार्ग की मरम्मत का काम अंतिम चरण में
बिहार के सबसे पुराने पुलों में से एक राजेंद्र पुल के सड़क मार्ग की मरम्मत का काम इस समय तेजी से चल रहा है। इस पुल का निर्माण 1952 में शुरू हुआ था और 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया था।
वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने एसपी सिंगला कंपनी को इस पुल के सड़क मार्ग के कायाकल्प के लिए 60 करोड़ रुपये का बजट दिया था। अधिकारियों के मुताबिक, पुल की ढलाई का काम लगभग पूरा हो चुका है और इस साल जुलाई तक राजेंद्र पुल पर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह शुरू होने की उम्मीद है। वर्तमान में यहां वन-वे ट्रैफिक व्यवस्था के तहत केवल हल्के और चार पहिया वाहनों को ही गुजरने की अनुमति दी जा रही है।
अखाड़ाघाट पुल मुजफ्फरपुर: 70 साल पुराना पुल और ओवरलोडिंग का खतरा
मुजफ्फरपुर में बूढ़ी गंडक नदी पर बना अखाड़ाघाट पुल उत्तर बिहार के आधा दर्जन जिलों (सीतामढ़ी, शिवहर, दरभंगा, मधुबनी, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण) को शहर से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है। इस पुल का निर्माण साल 1954 में महज 15 लाख रुपये की लागत से हुआ था।
सात दशक पुराने इस पुल की स्थिति यह है कि इसके दोनों सिरों पर भार क्षमता या ओवरलोडेड वाहनों को रोकने के लिए कोई चेतावनी बोर्ड या जांच की व्यवस्था नहीं है। प्रतिदिन हजारों वाहनों के दबाव के कारण इस पुल पर भयंकर जाम लगा रहता है, जिससे इसके पिलर और बीम लगातार कमजोर हो रहे हैं।
Bihar Bridge Safety: पुलों की कमजोरी के मुख्य कारण और प्रशासनिक विफलता
बिहार में पुलों की इस दयनीय स्थिति के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण सामने आ रहे हैं:
- जाम की समस्या और ढांचागत दबाव: स्थानीय प्रशासन की सक्रियता न होने के कारण पुलों पर अक्सर लंबा जाम लगता है। भारी वाहनों के घंटों एक ही जगह खड़े रहने से पुल की कंपन क्षमता प्रभावित होती है।
- ओवरलोडिंग और भ्रष्टाचार: पुलों की तय क्षमता से अधिक वजनी वाहनों का धड़ल्ले से गुजरना इन्हें समय से पहले बूढ़ा बना रहा है। स्थानीय स्तर पर ओवरलोडिंग पर लगाम न लग पाना सीधे तौर पर प्रशासनिक शिथिलता को दर्शाता है।
- रखरखाव में देरी: बाबा विशु राउत पुल जैसे उदाहरण बताते हैं कि पुल बनने के बाद विभाग मेंटेनेंस के नाम पर सो जाता है। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक मरम्मत की फाइलें आगे नहीं बढ़तीं।
बिहार सरकार ने साल 2025 में नई पुल अनुरक्षण नीति लागू की है, जिसके तहत बड़े पुलों की निगरानी की जिम्मेदारी विशेषज्ञ एजेंसियों को दी जा रही है। लेकिन धरातल पर जब तक समयबद्ध मरम्मत और ओवरलोडिंग पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक बिहार के इन लाइफलाइनों पर हादसों का खतरा मंडराता रहेगा।
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