Banka Teacher Khushboo Kumari: बांका की टीचर खुशबू कुमारी को मिलेगा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार, नाच-गाकर बदल दी सरकारी स्कूल की तस्वीर
Banka Teacher Khushboo Kumari: बांका की टीचर खुशबू कुमारी को मिलेगा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार, नाच-गाकर बदल दी सरकारी स्कूल की तस्वीर
Banka Teacher Khushboo Kumari: बिहार के बांका जिले के एक सरकारी स्कूल की कहानी अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई है। यहां की शिक्षिका खुशबू कुमारी बच्चों को किताबी और बोरिंग अंदाज में नहीं, बल्कि नाच-गाकर और खेल-खेल में पढ़ाती हैं। उनका यही अनोखा तरीका अब उन्हें देश के सबसे बड़े शिक्षक सम्मान तक ले गया है। 5 सितंबर को नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित करेंगी।
सोचने वाली बात यह है कि सरकारी स्कूल, जहां अक्सर संसाधनों की कमी और बच्चों की अनुपस्थिति की शिकायत रहती है, वहां आखिर ऐसा क्या बदला कि हालात पूरी तरह पलट गए। खुशबू की यह कहानी बताती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े बजट की जरूरत नहीं होती, कई बार सिर्फ पढ़ाने के तरीके में बदलाव ही कमाल कर देता है।
Banka Teacher Khushboo Kumari: 13 साल की मेहनत से बदली सरकारी स्कूल की सूरत
खुशबू कुमारी पिछले 13 वर्षों से अधिक समय से सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ा रही हैं। इस लंबी यात्रा में उन्होंने कभी भी सिर्फ सिलेबस पूरा करने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि बच्चों के समग्र विकास को अपने काम का केंद्र बनाया। जिन-जिन कक्षाओं में उन्होंने पढ़ाया, वहां परफॉरमेंस और उपस्थिति दोनों में लगातार सुधार देखा गया।
नए जमाने के हिसाब से पढ़ाई का तरीका भी बदलना चाहिए, यह बात खुशबू ने बरसों पहले ही समझ ली थी। पुराने और उबाऊ स्टाइल की जगह उन्होंने एक्टिविटी बेस्ड लर्निंग को अपनाया और खुद अपने हाथों से टीचिंग लर्निंग मटेरियल यानी चार्ट, फ्लैशकार्ड और मॉडल तैयार किए। इसी के साथ उन्होंने डिजिटल तकनीक यानी ICT को भी क्लासरूम का हिस्सा बना दिया, ताकि बच्चे आज के दौर के हिसाब से भी तैयार हो सकें।
सोशल मीडिया पर रील बनी पहचान की वजह
जब खुशबू के क्लासरूम में किए गए इन प्रयोगों की रील सोशल मीडिया पर पहुंची, तो लोगों ने उनकी खूब सराहना की। बच्चों को गुड टच और बैड टच जैसे संवेदनशील विषय समझाने से लेकर पहाड़े याद कराने के आसान तरीके तक, उनका हर वीडियो लोगों को पसंद आया। मामला कुछ इस तरह से बढ़ा कि एक सरकारी स्कूल की टीचर की मेहनत धीरे-धीरे पूरे देश की नजरों में आ गई।
50% से 90% तक कैसे पहुंची स्कूल की उपस्थिति
खुशबू कुमारी के लगातार प्रयासों का सबसे बड़ा असर स्कूल की उपस्थिति पर दिखा। विद्यार्थियों की उपस्थिति करीब 50 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई। यह आंकड़ा किसी भी सरकारी स्कूल के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है, क्योंकि अक्सर सरकारी स्कूलों में बच्चों की अनियमित उपस्थिति एक बड़ी चुनौती रहती है।
इसके साथ ही स्कूल यूनिफॉर्म की उपलब्धता भी लगभग 30 से 40 प्रतिशत से बढ़कर पूरे 100 प्रतिशत तक पहुंच गई। जूते, टाई और बेल्ट जैसी जरूरी स्कूली सामग्री के इस्तेमाल में भी उल्लेखनीय सुधार देखा गया। जानकार बताते हैं कि यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे लंबी और सोची-समझी मेहनत थी।
इस बदलाव की शुरुआत खुशबू ने अभिभावकों का भरोसा जीतने से की। उन्होंने घर-घर जाकर माता-पिता से बात की और उन्हें समझाया कि बच्चों को स्कूल भेजना कितना जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने शिक्षक-अभिभावक संगोष्ठी और विद्यालय शिक्षा समिति जैसे मंचों का भी नियमित आयोजन कराया, ताकि परिवार और स्कूल के बीच सीधा जुड़ाव बना रहे।
पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को सुरक्षा की भी सीख
खुशबू का काम सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने क्लासरूम में ही बच्चों को गुड टच और बैड टच जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक्टिविटी के जरिए समझाया। इसके पीछे मकसद सिर्फ जागरूकता फैलाना नहीं था, बल्कि बच्चों में अपने अधिकारों को पहचानने और गलत बात के खिलाफ आवाज उठाने की आदत डालना भी था। यह पहल खासतौर पर छोटे बच्चों के लिए काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि इस उम्र में सही जानकारी मिलना बेहद जरूरी होता है।
इसके अलावा खुशबू ने बाल संसद और इको क्लब जैसी गतिविधियों के जरिए बच्चों में नेतृत्व की भावना भी विकसित की। बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जिम्मेदारी लेना और फैसले लेना भी सिखाया गया। अपने अनुभव को उन्होंने अकेले तक सीमित नहीं रखा, बल्कि ICT और डिजिटल माध्यमों के जरिए इसे दूसरे शिक्षकों तक भी पहुंचाया।
Banka Teacher Khushboo Kumari: हर बच्चे को मिले आगे बढ़ने का मौका, यही रहा मकसद
खुशबू कुमारी का मानना है कि हर बच्चा महत्वपूर्ण है, हर बच्चा सीख सकता है और हर बच्चे को आगे बढ़ने का बराबर मौका मिलना चाहिए। उनका यह नजरिया बताता है कि उन्होंने अपने काम को महज एक नौकरी या ड्यूटी की तरह नहीं लिया, बल्कि पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाया। यही वजह है कि उनकी यह उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि देशभर के सरकारी स्कूल शिक्षकों के समर्पण और मेहनत की मिसाल भी बन गई है।
आम लोगों के लिए खुशबू की यह कहानी एक उम्मीद जगाने वाली मिसाल है। अक्सर सरकारी स्कूलों को लेकर संसाधनों की कमी और पढ़ाई के स्तर पर सवाल उठते रहते हैं, लेकिन खुशबू के प्रयास दिखाते हैं कि सही सोच और मेहनत से यह तस्वीर बदली जा सकती है। बांका जैसे जिले से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक पहुंचना, यह साबित करता है कि गांव-कस्बों के सरकारी स्कूलों में भी बड़े बदलाव की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।
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