Balen Shah Resignation: नेपाल में बालेन शाह सरकार पर गहराया संकट, माइतीघर मंडला में Gen Z का प्रदर्शन तेज

Gen Z युवाओं का प्रदर्शन तेज, 26 अगस्त को संसद में बालेन शाह की पेशी तय

0

Balen Shah Resignation:  नेपाल की राजनीति में पारंपरिक राजनीतिक दलों और पुराने संभ्रांत वर्ग को बेदखल कर भारी जनादेश के साथ सत्ता में आई प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) की सरकार अपने कार्यकाल के 150 दिन पूरे होने से पहले ही गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकट के भंवर में घिरती नजर आ रही है। जिन युवाओं और ‘जेन-जेड’ (Gen Z) पीढ़ी के अभूतपूर्व आंदोलनों ने बालेन शाह को ऐतिहासिक जीत दिलाकर देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था, वही युवा वर्ग अब वादे पूरे न होने और प्रशासनिक मनमानेपन का आरोप लगाते हुए काठमांडू की सड़कों पर उतरकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है।

राजधानी काठमांडू के ऐतिहासिक माइतीघर मंडला में एक बार फिर युवा प्रदर्शनकारी तख्तियां और बैनर लेकर जमा होने लगे हैं। केवल सड़कों पर ही नहीं, बल्कि प्रतिनिधि सभा (संसद) के भीतर भी प्रधानमंत्री की कार्यशैली, संसद से निरंतर दूरी और एकतरफा निर्णयों को लेकर विपक्षी दलों के साथ-साथ खुद उनकी अपनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के वरिष्ठ सांसदों ने खुली बगावत के सुर छेड़ दिए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संसद के स्पीकर डोल प्रसाद अर्याल ने प्रधानमंत्री को 26 अगस्त को संसद में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सांसदों के सवालों के जवाब देने का कड़ा निर्देश जारी किया है।

Balen Shah Resignation: मेयर से प्रधानमंत्री तक का सफर और सुशासन के अधूरे 100 सूत्रीय वादों से उपजा आक्रोश

काठमांडू के पूर्व मेयर और पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर व लोकप्रिय रैपर रहे बालेन शाह ने सितंबर 2025 में तत्कालीन केपी शर्मा ओली सरकार के खिलाफ भड़के युवा आक्रोश को अपनी राजनीतिक पूंजी में तब्दील किया था। मार्च 2026 में हुए आम चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को मिले प्रचंड बहुमत के बाद 27 मार्च 2026 को बालेन शाह ने नेपाल के 47वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। शपथ ग्रहण के साथ ही सरकार ने ‘100-सूत्रीय शासन सुधार एजेंडा’ घोषित किया था, जिसमें भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, युवाओं के लिए 12 लाख रोजगार सृजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार जैसे बड़े वादे शामिल थे।

हालांकि सत्ता में आने के कुछ ही महीनों के भीतर जमीनी हकीकत इन चुनावी वादों के बिल्कुल विपरीत साबित होने लगी। देश में बेरोजगारी की समस्या यथावत बनी रही, महंगाई पर नियंत्रण नहीं हो सका और प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता लाने के बजाय सत्ता के केंद्रीकरण की शिकायतें बढ़ने लगीं। जो युवा यह मानते थे कि बालेन शाह के सत्ता में आने से पारंपरिक सिंडिकेट टूटेगा, वे अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और यही हताशा अब राजधानी की सड़कों पर दोबारा विरोध प्रदर्शनों के रूप में फूट रही है।

संसद की 39 बैठकों में से केवल 5 में उपस्थिति: लोकतांत्रिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल

प्रधानमंत्री बालेन शाह के खिलाफ विपक्षी दलों और नागरिक समाज का सबसे बड़ा आरोप संसदीय मर्यादा और विधायी जवाबदेही की अनदेखी का है। सदन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद से अब तक संसद की कुल 39 महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित हो चुकी हैं, जिनमें से बालेन शाह केवल 5 बैठकों में ही उपस्थित रहे हैं।

विपक्षी सांसदों ने संसद के पटल पर आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता द्वारा चुने गए जन-प्रतिनिधियों का तिरस्कार कर रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि सोशल मीडिया और मीडिया से दूरी बनाने की उनकी पुरानी कार्यशैली जब राष्ट्रीय स्तर पर शासन में दोहराई जाती है, तो यह लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करती है। स्पीकर डोल प्रसाद अर्याल द्वारा 26 अगस्त को संसद में उपस्थित होने के अनिवार्य निर्देश को प्रधानमंत्री के लिए एक अग्निपरीक्षा के रूप में देखा जा रहा है, जहां उन्हें सदन के तीखे सवालों का सामना करना होगा।

सीमा पर सख्त कस्टम नियम, तराई में सांप्रदायिक तनाव और भारतीय सेना में गोरखा भर्ती का अनसुलझा मुद्दा

सरकार की नीतियों के कारण दक्षिणी नेपाल और भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्रों में भी भारी जनाक्रोश देखने को मिला है। अप्रैल माह में सरकार ने खुली सीमा से 100 नेपाली रुपये से अधिक के सामान की आवाजाही पर कड़े कस्टम और टैरिफ नियम लागू करने का अचानक निर्णय लिया था। इस फैसले से सीमावर्ती कस्बों में रहने वाले आम नागरिकों की रोजमर्रा की आपूर्ति बुरी तरह बाधित हुई, जिससे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और अंततः भारी जन-दबाव में प्रशासन को नियमों में ढील देने के लिए विवश होना पड़ा।

इसके अतिरिक्त सीमा विवादों और अतिक्रमण पर प्रधानमंत्री के अपरिपक्व बयानों के चलते तराई क्षेत्र में हिंसक सांप्रदायिक झड़पें भड़क उठीं, जिस पर सरकार की देरी से आई प्रतिक्रिया ने उनकी प्रशासनिक दक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। वहीं दूसरी ओर, पोखरा और पश्चिमी नेपाल में पूर्व गोरखा सैनिक और युवा भारतीय सेना में ‘अग्निपथ योजना’ के तहत पिछले कई वर्षों से रुकी हुई नेपाली युवाओं की भर्ती प्रक्रिया को फिर से शुरू कराने के लिए ठोस कूटनीतिक समाधान की मांग को लेकर लगातार धरने पर बैठे हैं।

गणेश नेपाली का आत्मदाह और अनधिकृत बस्तियों के ध्वस्तीकरण ने भड़काई बगावत की चिंगारी

काठमांडू के युवाओं के बीच हालिया आक्रोश की सबसे बड़ी वजह जुलाई माह में घटी एक हृदयविदारक घटना बनी। काठमांडू स्थित पासपोर्ट कार्यालय के बाहर एक युवा राइड-शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली ने नगर पुलिस की कथित प्रताड़ना और वाहन जब्ती से तंग आकर आत्मदाह कर लिया था। इस घटना ने राजधानी के युवाओं को झकझोर कर रख दिया और इसे नगर प्रशासन व सरकार की जनविरोधी नीतियों का परिणाम बताया गया।

इसके साथ ही बागमती नदी के किनारे बसी अनधिकृत और गरीब बस्तियों को बिना किसी पूर्व पुनर्वास या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था किए बुलडोजर चलाकर हटाए जाने के अभियान ने मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय नागरिकों में भारी रोष पैदा कर दिया है। युवाओं का कहना है कि सरकार बुनियादी ढांचे के नाम पर गरीब और हाशिए पर मौजूद तबके को बेघर कर रही है, जबकि चुनावी घोषणापत्र में गरीबों के उत्थान का वादा किया गया था।

आरएसपी के भीतर आंतरिक बगावत: ‘सिर्फ पीएम की गरिमा से सरकार नहीं चलेगी’

बालेन शाह के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा खुद उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के आंतरिक असंतोष से पैदा हो रहा है। पार्टी के सांसदों और वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि प्रधानमंत्री पार्टी संगठन, संसदीय दल और कैबिनेट मंत्रियों को विश्वास में लिए बिना कुछ गिने-चुने गैर-निर्वाचित सलाहकारों के दम पर मनमाने फैसले ले रहे हैं।

संसद के भीतर आरएसपी के वरिष्ठ सांसद जगदीश खरेल ने खुलकर नाराजगी जताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि केवल प्रधानमंत्री का निजी दबदबा और गरिमा बचेगी तथा पार्टी और सांसदों के सम्मान को कुचला जाएगा, तो ऐसी सरकार लंबे समय तक नहीं टिक सकती। पार्टी के आंतरिक ढांचे में गहराते इस मतभेद ने यह साफ कर दिया है कि संसद में बहुमत होने के बावजूद बालेन शाह की राजनीतिक जमीन तेजी से खिसक रही है और यदि उन्होंने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया, तो पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठ सकती है।

Balen Shah Resignation: नेपाल के राजनीतिक भविष्य के लिए आगे की राह और 26 अगस्त का निर्णायक दिन

नेपाल का राजनीतिक इतिहास हमेशा से भारी उथल-पुथल, गठबंधन की राजनीति और सरकारों के अल्पकालिक कार्यकाल से भरा रहा है। बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने को देश में स्थिरता और युवा क्रांति के एक नए युग के रूप में देखा गया था, किंतु महज 150 दिनों के भीतर सड़क से लेकर संसद तक चौतरफा घेराबंदी यह दर्शाती है कि लोकतांत्रिक राजनीति में जनता का भरोसा कायम रखना केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता से संभव नहीं है।

26 अगस्त को संसद में होने वाली उनकी पेशी और उनका आधिकारिक वक्तव्य नेपाल की सरकार का भविष्य तय करने में मील का पत्थर साबित होगा। यदि प्रधानमंत्री युवाओं के रोजगार, प्रशासनिक पारदर्शिता, तराई के मुद्दों और संसदीय जवाबदेही पर ठोस और भरोसेमंद समाधान पेश करने में विफल रहते हैं, तो माइतीघर मंडला से शुरू हुआ यह ‘जेन-जेड’ असंतोष एक बार फिर पूरे देश में एक बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है।

Read More Here

Motorola Edge 70 Fusion और Edge 60 Fusion हुए महंगे, कीमतों में ₹3,000 तक बढ़ोतरी; 25 अगस्त से लागू होंगी नई दरें

One Nation One Election: JPC बैठक में पी. चिदंबरम ने उठाए संवैधानिक सवाल, 2029 से लागू करने के रोडमैप पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने

Goa E-20 Fuel Controversy: अरविंद केजरीवाल का दूसरा टाउनहॉल, वाहन मालिकों की समस्याओं और चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र पर निशाना

Anupamaa 25 August 2026: ग्रैंड फिनाले से पहले अनुपमा का टूटा हौसला, हसमुक ने बढ़ाया आत्मविश्वास

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.