Allahabad HC: प्रयागराज NLU में जातिगत भेदभाव के आरोप, न्यायिक जांच के आदेश

हाई कोर्ट ने न्यायिक जांच के साथ छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन का आदेश दिया

0

Allahabad HC: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (RPNLUS) में जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न और अकादमिक पूर्वाग्रह के गंभीर आरोपों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने विश्वविद्यालय के विधि विभाग के प्रमुख (HOD) तथा बॉयज हॉस्टल के वार्डन के विरुद्ध लगाए गए अपमानजनक और पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने का आदेश पारित किया है। यह निर्देश विश्वविद्यालय के एक पीएचडी शोधार्थी और बीए एलएलबी (ऑनर्स) के पांचवें सेमेस्टर के एक छात्र द्वारा संयुक्त रूप से दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।

जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि प्रथम दृष्टया लगाए गए आरोप अत्यधिक संवेदनशील और गंभीर प्रकृति के हैं, जिसके कारण किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायिक संस्था से इनकी गहन पड़ताल कराया जाना अनिवार्य है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच का निर्देश देने मात्र से लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं होती है; प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत संबंधित प्राध्यापक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और पक्ष रखने का पूर्ण अवसर प्रदान किया जाएगा। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर 2026 निर्धारित की है।

Allahabad HC: छात्रों की याचिका और आरोप

अदालत में प्रस्तुत याचिका और छात्र द्वारा 20 अगस्त 2026 को विश्वविद्यालय के कुलपति के समक्ष दी गई औपचारिक शिकायत के अनुसार, द्वितीय याचिकाकर्ता छात्र ने विधि विभागाध्यक्ष पर अपने प्रशासनिक व अकादमिक पद के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। छात्र का कहना है कि उसे उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि और जाति के आधार पर जानबूझकर निशाना बनाया गया।

शिकायत में दावा किया गया है कि पूर्व में संवैधानिक विधि (Constitutional Law) के प्रश्नपत्र में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के बाद भी संबंधित प्राध्यापक द्वारा उसके साथ पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार किया गया और उसकी उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में अत्यधिक अनुचित सख्ती बरती गई। इसके अतिरिक्त, याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित शिक्षक ने छात्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति और आरक्षण की आवश्यकता को लेकर अनुचित और आहत करने वाली टिप्पणियां की थीं। अदालत ने इन आरोपों को रिकॉर्ड पर लेते हुए कहा कि वर्तमान चरण में इन पर कोई न्यायिक निष्कर्ष निकालना अपरिपक्व होगा, इसलिए निष्पक्ष जांच ही एकमात्र उचित विधिक मार्ग है।

दो वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को सौंपी गई जांच की कमान

मामले की गंभीरता और विश्वविद्यालय की आंतरिक जांच पर छात्रों के अविश्वास को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जांच की कमान जिला न्यायालय प्रयागराज के दो सेवारत न्यायिक अधिकारियों को सौंपी है। इस जांच दल में लघु वाद न्यायालय (Small Causes Court) की न्यायाधीश अर्चना सिंह-प्रथम तथा प्रयागराज के विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Special CJM) अरुण कुमार यादव को नियुक्त किया गया है।

न्यायिक अधिकारियों की यह संयुक्त पीठ इस बात की विस्तृत जांच करेगी कि क्या विश्वविद्यालय परिसर अथवा छात्रावास में अनुसूचित जाति (SC) अथवा अनुसूचित जनजाति (ST) संवर्ग के विद्यार्थियों के साथ किसी प्रकार का जातिगत भेदभाव, अपमान अथवा दुर्व्यवहार किया गया। साथ ही यह भी परखा जाएगा कि पूर्व में छात्रों द्वारा कुलपति को दी गई शिकायतों पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्थापित विधिक नियमों और यूजीसी विनियमों के तहत क्या कार्रवाई की। जांच दल को गवाहों के बयान दर्ज करने, गोपनीय साक्ष्य जुटाने और विश्वविद्यालय के प्रशासनिक रिकॉर्ड्स को तलब करने का पूर्ण अधिकार दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि यदि किसी भी चरण में किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रतिकूल सामग्री मिलती है, तो उसे अपना विधिक पक्ष रखने का समुचित अवसर अनिवार्य रूप से दिया जाए।

पहचान छिपाकर ‘कोडिंग’ के जरिए होगा उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन

अकादमिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हाई कोर्ट ने छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के स्वतंत्र और गोपनीय पुनर्मूल्यांकन का असाधारण निर्देश जारी किया है। अदालत ने विश्वविद्यालय के कुलपति को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति गठित करने का आदेश दिया है। यह समिति उन सभी विषयों की उत्तर पुस्तिकाओं की पुनः जांच करेगी जिन्हें संबंधित विभागाध्यक्ष द्वारा पढ़ाया और मूल्यांकित किया गया था।

पुनर्मूल्यांकन की शुचिता बनाए रखने के लिए अदालत ने अत्यंत कड़े दिशानिर्देश तय किए हैं। मूल्यांकन के समय छात्र का नाम, अनुक्रमांक, मूल परीक्षक के हस्ताक्षर और पूर्व में दिए गए अंकों को पूरी तरह छिपाया (मास्क) जाएगा, ताकि नई समिति किसी भी पूर्वग्रह से प्रभावित हुए बिना उत्तरों का निष्पक्ष परीक्षण कर सके। इस समिति के गठन और कार्यप्रणाली में आरोपित प्राध्यापक का प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। विशेषज्ञ समिति को अपनी पुनर्मूल्यांकन रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर सीलबंद लिफाफे में कुलपति को सौंपनी होगी, जिसे कुलपति द्वारा सीधे हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

विभागाध्यक्ष को प्रशासनिक दायित्वों से हटाया गया, छात्रों की सुरक्षा पर जोर

जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता और परिसर में तनावमुक्त वातावरण बनाए रखने के लिए हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत के रूप में संबंधित विधि विभागाध्यक्ष को उनके सभी प्रशासनिक पदों और वार्डन के दायित्वों से तत्काल प्रभाव से अलग रखने का निर्देश दिया है। इसके अतिरिक्त, उन्हें दोनों याचिकाकर्ता छात्रों से जुड़े किसी भी अकादमिक मूल्यांकन, अनुशासनात्मक कार्यवाही अथवा छात्रावास प्रबंधन संबंधी प्रक्रिया में भाग लेने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है।

अदालत ने विश्वविद्यालय प्रशासन को कड़े निर्देश दिए हैं कि याचिका दायर करने अथवा न्यायिक जांच में साक्ष्य व बयान दर्ज कराने के कारण याचिकाकर्ता छात्रों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की प्रतिशोधात्मक, प्रशासनिक अथवा अकादमिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। छात्रों के शैक्षणिक भविष्य, परीक्षा परिणामों और व्यक्तिगत सुरक्षा की संपूर्ण विधिक जवाबदेही विश्वविद्यालय के शीर्ष प्रबंधन पर निर्धारित की गई है।

समान अवसर प्रकोष्ठ और संस्थागत शिकायत तंत्र पर जवाब तलब

अदालत ने केवल व्यक्तिगत आरोपों तक सीमित न रहकर उच्च शिक्षण संस्थानों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने वाले संस्थागत तंत्र की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाए हैं। हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन से हलफनामे के माध्यम से स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के अनुरूप ‘समान अवसर प्रकोष्ठ’ (Equal Opportunity Cell) और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के छात्रों की शिकायतों के निवारण के लिए स्थायी वैधानिक समिति कार्यरत है या नहीं।

कुलपति से यह भी विवरण प्रस्तुत करने को कहा गया है कि छात्र द्वारा 20 अगस्त 2026 को दी गई मूल शिकायत और उसके पश्चात प्रेषित किए गए स्मरण पत्रों पर आंतरिक स्तर पर क्या प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई गई थी। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि भविष्य में किसी भी छात्र को अपनी संस्थागत शिकायतों के लिए सीधे अदालतों का दरवाजा न खटखटाना पड़े।

Allahabad HC: निष्कर्ष

डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का यह प्रकरण देश के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के आंतरिक अकादमिक परिवेश और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा विमर्श खड़ा करता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा न्यायिक अधिकारियों को जांच सौंपना और कड़े कोडिंग प्रोटोकॉल के तहत उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन कराने का आदेश यह प्रमाणित करता है कि न्यायपालिका अकादमिक स्वायत्तता की आड़ में छात्रों के संवैधानिक अधिकारों के हनन को कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। अब समस्त विधिक और प्रशासनिक नजरें 24 सितंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां न्यायिक जांच की प्रारंभिक प्रगति और पुनर्मूल्यांकन के तथ्य अदालत के पटल पर रखे जाएंगे।

Read more here

Parivartini Ekadashi 2026: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, वामन अवतार की कथा और पारण का सटीक समय

Tuesday Hanuman Puja: मंगलवार को हनुमान जी की उपासना में सिंदूर-तेल अर्पण की परंपरा, जानें शास्त्रीय पूजा विधि और दान की मान्यताएं

Petrol Diesel Price 22 September 2026: पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर, जानें दिल्ली से लेकर मुंबई तक अपने शहर के ताजा रेट

Ladakh Travel: लद्दाख यात्रा में ये 7 गलतियां अस्पताल पहुंचा सकती हैं, समय रहते जान लें

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.