8th Pay Commission News: OPS, NPS या UPS? पेंशन पर फिर तेज हुई बहस, जानें क्या है मांग
कर्मचारी संगठनों ने पुरानी पेंशन बहाली की मांग उठाई, जानें OPS, NPS और UPS में अंतर
8th Pay Commission News: आठवें केंद्रीय वेतन आयोग (8th Central Pay Commission) की कार्यप्रणाली गति पकड़ने के साथ ही केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के मध्य सेवानिवृत्ति लाभों को लेकर विमर्श तीव्र हो गया है। वेतन वृद्धि, फिटमेंट फैक्टर और विभिन्न भत्तों के पुनरीक्षण के साथ-साथ इस समय सबसे ज्वलंत विषय पेंशन प्रणाली के भविष्य का बना हुआ है। कर्मचारी महासंघों और पेंशनर एसोसिएशनों की ओर से पुरानी पेंशन योजना (Old Pension Scheme – OPS) की पूर्ण बहाली, न्यूनतम सुनिश्चित पेंशन में सम्मानजनक वृद्धि और सेवानिवृत्ति के पश्चात सामाजिक व वित्तीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के प्रस्ताव प्रमुखता से आयोग के सम्मुख रखे जा रहे हैं।
दूसरी ओर केंद्र सरकार की वर्तमान पेंशन नीति मुख्य रूप से राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (National Pension System – NPS) और इसके अंतर्गत हाल ही में प्रभावी की गई एकीकृत पेंशन योजना (Unified Pension Scheme – UPS) के इर्द-गिर्द केंद्रित है। यद्यपि कर्मचारी संगठन अनवरत रूप से ओपीएस की वापसी का दबाव बना रहे हैं, तथापि केंद्र सरकार ने संसद के पटल पर पूर्व में स्पष्ट किया था कि केंद्रीय कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को पुनः लागू करने का कोई आधिकारिक प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। ऐसे में आठवें वेतन आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए जा रहे प्रतिवेदन भविष्य की सामाजिक सुरक्षा रूपरेखा को तय करने में ऐतिहासिक भूमिका निभा सकते हैं।
8th Pay Commission News: आठवें वेतन आयोग के समक्ष पेंशन क्यों बना केंद्रीय मुद्दा?
अक्टूबर 2025 में केंद्र सरकार द्वारा आठवें वेतन आयोग के विचारणीय विषयों (Terms of Reference – ToR) को औपचारिक मंजूरी प्रदान की गई थी। आयोग को अपने गठन की तिथि से 18 माह के भीतर केंद्र सरकार को अपनी विस्तृत सिफारिशें सौंपने का दायित्व दिया गया है। आयोग के अधिदेश में न केवल कार्यरत कर्मचारियों के वेतनमान और भत्तों का अध्ययन शामिल है, बल्कि पेंशनभोगियों के जीवन स्तर, बढ़ती महंगाई के प्रभाव और सेवानिवृत्ति लाभों की व्यापक समीक्षा भी इसका प्रमुख हिस्सा है।
सरकार ने विचारणीय विषयों में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि आयोग को कोई भी वित्तीय संस्तुति करते समय देश की समग्र आर्थिक स्थिति, राजकोषीय विवेक (Fiscal Prudence) और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का सूक्ष्म संतुलन साधना होगा। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि लगभग तीन दशक तक राष्ट्र की सेवा करने वाले कार्मिकों को सेवानिवृत्ति के पश्चात बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर नहीं छोड़ा जा सकता, जिसके कारण वे निश्चित आय वाले मॉडल की पुरजोर वकालत कर रहे हैं।
ओपीएस (OPS) की मूल संरचना और कर्मचारियों का इससे गहरा जुड़ाव
पुरानी पेंशन योजना को अर्थशास्त्र की भाषा में ‘परिभाषित लाभ पेंशन’ (Defined Benefit Pension) प्रणाली कहा जाता है। केंद्र सरकार की सेवाओं में 1 जनवरी 2004 से पूर्व नियुक्त सभी पात्र कार्मिकों के लिए यह व्यवस्था प्रभावी थी। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार यह था कि इसमें कर्मचारी के वेतन से पेंशन मद में कोई मासिक कटौती नहीं होती थी और संपूर्ण वित्तीय भार सरकार के सामान्य राजस्व से वहन किया जाता था।
ओपीएस के तहत सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी को उसके अंतिम आहरित मूल वेतन का 50 प्रतिशत सीधे पेंशन के रूप में प्रदान किया जाता है, बशर्ते उसने अनिवार्य न्यूनतम सेवा अवधि पूर्ण कर ली हो। इसके अतिरिक्त सेवानिवृत्त कर्मचारियों को साल में दो बार मिलने वाले महंगाई भत्ते (DA/DR) का लाभ भी स्वतः प्राप्त होता है, जिससे मुद्रास्फीति का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह व्यवस्था एक सेवानिवृत्त व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने की पूर्ण गारंटी देती है, जिसके चलते वे इसे पुनः लागू करने की मांग पर अडिग हैं।
2004 के बाद एनपीएस (NPS) का आगमन और अंशदायी प्रणाली
राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने और दीर्घकालिक पेंशन देनदारियों को सीमित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 1 जनवरी 2004 से सशस्त्र बलों को छोड़कर सभी नवीन केंद्रीय कर्मचारियों के लिए राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) को अनिवार्य रूप से लागू किया था। एनपीएस एक ‘अंशदायी’ (Defined Contribution) बाजार-आधारित पेंशन प्रणाली है, जिसमें कर्मचारी अपने मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 10 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि सरकार 14 प्रतिशत का अंशदान जमा करती है।
इस संयुक्त निधि को पेंशन फंड विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) द्वारा विनियमित फंड मैनेजरों के माध्यम से इक्विटी और सरकारी बॉन्ड्स में निवेश किया जाता है। सेवानिवृत्ति के समय संचित कोष का 60 प्रतिशत हिस्सा कर-मुक्त एकमुश्त निकाला जा सकता है, जबकि न्यूनतम 40 प्रतिशत राशि से एन्युइटी (वार्षिकी) खरीदना अनिवार्य होता है। कर्मचारी संगठनों का सबसे बड़ा विरोध इसी बिंदु पर रहा है कि एन्युइटी से मिलने वाली मासिक पेंशन बाजार के रिटर्न पर निर्भर करती है और इसमें मुद्रास्फीति के अनुरूप महंगाई राहत का कोई सुनिश्चित प्रावधान नहीं रहता।
यूपीएस (UPS): एनपीएस के भीतर सरकार का सुनिश्चित विकल्प
कर्मचारियों के निरंतर विरोध और विभिन्न राज्यों द्वारा पुरानी पेंशन प्रणाली की ओर लौटने के घटनाक्रम के पश्चात केंद्र सरकार ने अगस्त 2024 में ‘एकीकृत पेंशन योजना’ (Unified Pension Scheme – UPS) को स्वीकृति दी, जिसे 1 अप्रैल 2025 से राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के दायरे में एक वैकल्पिक मॉडल के रूप में लागू किया गया है।
यूपीएस के तहत उन कर्मचारियों को सुनिश्चित पेंशन का लाभ दिया गया है जिन्होंने कम से कम 25 वर्ष की निर्बाध सेवा पूर्ण की है। इस योजना के प्रावधानों के अनुसार पात्र कर्मचारी को सेवानिवृत्ति से पूर्व के अंतिम 12 महीनों के औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत सुनिश्चित पेंशन के रूप में देय होता है। इसके साथ ही 10 वर्ष की न्यूनतम सेवा पूरी करने पर न्यूनतम 10,000 रुपये मासिक पेंशन और सेवाकाल के दौरान मृत्यु होने की दशा में 60 प्रतिशत पारिवारिक पेंशन का प्रावधान किया गया है। यद्यपि यूपीएस में औद्योगिक श्रमिकों के अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI-IW) के आधार पर महंगाई राहत का भी प्रावधान है, किंतु इसमें कर्मचारी का 10 प्रतिशत अंशदान निरंतर जारी रहता है, जिसे लेकर संगठनों के एक वर्ग में असंतोष बना हुआ है।
कर्मचारी महासंघों द्वारा आयोग को सौंपे गए मांग पत्र
आठवें वेतन आयोग के समक्ष विभिन्न राष्ट्रीय कर्मचारी संगठनों ने अपने विस्तृत ज्ञापन सौंपे हैं। मिनिस्टीरियल स्टाफ एसोसिएशन (सर्वे ऑफ इंडिया) ने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार को बिना किसी अंशदान कटौती के अंतिम मूल वेतन के 50 प्रतिशत पर आधारित पुरानी परिभाषित पेंशन प्रणाली को अक्षरशः बहाल करना चाहिए।
इसी प्रकार फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन्स (FNPO) ने मांग रखी है कि एनपीएस और यूपीएस के तहत आच्छादित सभी कर्मचारियों को उनकी इच्छा के अनुरूप पुरानी पेंशन योजना का चयन करने का विधिक विकल्प प्रदान किया जाना चाहिए। रेलवे सीनियर सिटीजन्स वेलफेयर सोसाइटी (RSCWS) ने आयोग से आग्रह किया है कि न्यूनतम गारंटीकृत पेंशन की सीमा को वर्तमान जीवन-यापन लागत के अनुरूप बढ़ाया जाए और चिकित्सा भत्ते को भी संशोधित किया जाए। कर्मचारी नेताओं का तर्क है कि जब सांसदों और विधायकों को बिना किसी अंशदान के पेंशन की पात्रता है, तो जीवन भर सेवाएं देने वाले लोक सेवकों के साथ अंशदायी विभेद नहीं होना चाहिए।
मौजूदा पेंशनभोगियों और पारिवारिक पेंशनरों की चिंताएं
पेंशन का विमर्श केवल वर्तमान में कार्यरत कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के लगभग 68 लाख मौजूदा केंद्रीय पेंशनभोगियों और पारिवारिक पेंशनरों के अधिकार भी इस प्रक्रिया से सीधे जुड़े हैं। ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉईज फेडरेशन (AIDEF) ने सरकार और वेतन आयोग को पत्र लिखकर ध्यानाकर्षण कराया है कि पूर्व के वेतन आयोगों के पेंशनर्स और नए पेंशनर्स के मध्य वेतन समानता (Parity) स्थापित की जानी चाहिए।
महासंघ ने यह भी मांग उठाई है कि 65, 70 और 75 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर पेंशन में अतिरिक्त आनुपातिक वृद्धि (Additional Pension) का लाभ दिया जाए, जो वर्तमान में केवल 80 वर्ष की आयु के बाद ही उपलब्ध होता है। इसके साथ ही पारिवारिक पेंशनरों के लिए न्यूनतम पेंशन की समीक्षा और सीजीएचएस (CGHS) स्वास्थ्य सुविधाओं के डिजिटलीकरण व आउटडोर चिकित्सा व्यय प्रतिपूर्ति की सीमाओं को बढ़ाने की मांग भी आयोग के समक्ष विचाराधीन है।
क्या आठवें वेतन आयोग के जरिए ओपीएस की वापसी संभव है?
सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर पुरानी पेंशन योजना की तत्काल वापसी को लेकर चलने वाले दावों के विपरीत वस्तुस्थिति अत्यधिक जटिल और नीतिगत है। जुलाई 2026 में संसद के मानसून सत्र के दौरान वित्त मंत्रालय ने लिखित उत्तर में स्पष्ट रूप से कहा था कि केंद्रीय कर्मचारियों के लिए ओपीएस को पुनः लागू करने का कोई प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है।
प्रशासनिक और वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि आठवां वेतन आयोग कर्मचारियों की आपत्तियों और यूपीएस के व्यावहारिक क्रियान्वयन का अध्ययन करने के पश्चात एक मध्यमार्गी समाधान प्रस्तुत कर सकता है। आयोग अंशदान की दरों में संशोधन, न्यूनतम सुनिश्चित पेंशन की सीमा में वृद्धि अथवा एनपीएस के तहत गारंटीकृत रिटर्न के नए उत्पादों की सिफारिश कर सकता है। आयोग केवल एक अनुशंसात्मक संस्था है; उसकी सिफारिशों को स्वीकार करना, संशोधित करना अथवा अस्वीकार करना पूर्णतः केंद्रीय मंत्रिमंडल के नीतिगत अधिकार क्षेत्र में आता है।
8th Pay Commission News: निष्कर्ष
आठवें वेतन आयोग के समक्ष पेंशन व्यवस्था को लेकर चल रहा वर्तमान मंथन केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती है। जहां एक ओर कर्मचारी अपने सेवानिवृत्त जीवन के लिए सौ प्रतिशत निश्चितता और आर्थिक संबल चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर नीति निर्माताओं के समक्ष आने वाली पीढ़ियों पर असहनीय राजकोषीय बोझ न डालने की विवशता है। आगामी महीनों में वेतन आयोग द्वारा विभिन्न हितधारकों की सुनवाई पूरी होने के बाद जब अंतरिम या अंतिम मसौदा सामने आएगा, तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि भारतीय लोक सेवा की पेंशन प्रणाली अपने पारंपरिक ढांचे की ओर लौटेगी या फिर एकीकृत और अंशदायी मॉडल ही भविष्य का स्थायी विकल्प बनेगा।
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