NCERT-CBSE Vacancies: NCERT में 1596 और CBSE में 933 पद खाली, संसदीय समिति ने भर्ती में तेजी लाने की सिफारिश की

NCERT में 1596 और CBSE में 933 पद रिक्त, संसदीय समिति ने जताई गंभीर चिंता

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NCERT-CBSE Vacancies: देश की स्कूली शिक्षा प्रणाली की रीढ़ मानी जाने वाली दो शीर्ष संस्थाओं—राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE)—में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी का मामला सामने आया है। संसद की ‘प्राक्कलन समिति’ (Estimates Committee) की वर्ष 2026-27 के लिए पेश की गई 10वीं रिपोर्ट में इन रिक्तियों को लेकर अत्यंत गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। रिपोर्ट के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, एनसीईआरटी में 1,596 पद खाली पड़े हैं, जबकि सीबीएसई में कुल स्वीकृत क्षमता के मुकाबले 933 पद रिक्त हैं।

संसदीय समिति ने शिक्षा मंत्रालय से इन दोनों महत्वपूर्ण निकायों में समयबद्ध तरीके से स्थाई नियुक्तियां करने और भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए ठोस कदम उठाने की जोरदार सिफारिश की है। समिति ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के सफल क्रियान्वयन, शोध, पाठ्यक्रम विकास और देश भर में बोर्ड परीक्षाओं के निष्पक्ष व सुरक्षित संचालन के लिए इन पदों को तुरंत भरा जाना बेहद अनिवार्य है।

NCERT-CBSE Vacancies: एनसीईआरटी में स्वीकृत पदों में से आधे से ज्यादा रिक्त

संसदीय समिति द्वारा समीक्षा किए जाने पर यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि अक्टूबर 2025 तक एनसीईआरटी में कुल 2,844 स्वीकृत पदों के मुकाबले वास्तविक रूप से केवल 1,248 कर्मचारी और संकाय सदस्य ही कार्यरत थे। इस प्रकार परिषद में स्वीकृत क्षमता के 50 प्रतिशत से अधिक यानी 1,596 पद पूरी तरह से खाली पड़े हुए हैं।

खाली पड़े पदों का विवरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें 145 पद विशुद्ध रूप से अकादमिक (Academic) श्रेणी के हैं, 131 पद स्कूली शिक्षण से जुड़े हैं, 916 पद प्रशासनिक (Administrative) विभाग के हैं और 404 सहायक कर्मचारी पद शामिल हैं। शैक्षिक अनुसंधान, मॉडल पाठ्यपुस्तकों के निर्माण और देश भर के शिक्षकों को प्रशिक्षण देने वाली देश की सर्वोच्च संस्था में इतने बड़े पैमाने पर रिक्तियां होना उसकी कार्यकुशलता और गुणवत्ता पर सीधे तौर पर सवाल खड़े करता है।

सीबीएसई में 44 प्रतिशत पद खाली, संविदा कर्मचारियों पर निर्भरता पर सवाल

सीबीएसई के संगठनात्मक ढांचे का विश्लेषण करते हुए समिति ने पाया कि बोर्ड में स्वीकृत 2,117 पदों में से 933 पद (लगभग 44 प्रतिशत) वर्तमान में खाली हैं। इनमें सबसे बड़ी गिरावट ग्रुप-सी (Group-C) के सहायक कर्मचारियों की श्रेणी में देखी गई है, जहां अकेले 595 पद रिक्त पड़े हैं।

संसदीय समिति ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि सीबीएसई अपने दैनिक प्रशासनिक कार्यों और परीक्षा प्रबंधन जैसी बेहद संवेदनशील प्रक्रियाओं के लिए बड़े पैमाने पर अस्थायी व संविदा (Contractual) कर्मचारियों पर निर्भर है। समिति ने चेतावनी दी है कि स्थाई कर्मचारियों की इस भारी कमी से कक्षा 10वीं और 12वीं की राष्ट्रीय बोर्ड परीक्षाओं की गोपनियता, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, निष्पक्ष मूल्यांकन और समय पर परिणाम घोषित करने की पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

स्कूलों और छात्रों की बढ़ती संख्या के मुकाबले घटा स्टाफ

पिछले तीन दशकों में सीबीएसई से संबद्धता (Affiliation) प्राप्त करने वाले स्कूलों और परीक्षाओं में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जहां वर्ष 1992-93 में सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों की संख्या केवल 3,787 थी, वहीं वर्ष 2024-25 तक यह बढ़कर 31,234 से अधिक हो चुकी है। इसके साथ ही दोनों बोर्ड कक्षाओं के परीक्षार्थियों की संख्या भी प्रतिवर्ष लाखों में पहुंच चुकी है।

वर्तमान में बोर्ड के पास देश भर में 25 क्षेत्रीय कार्यालय (Regional Offices) और 5 उप-क्षेत्रीय कार्यालय संचालित हैं। इस भौगोलिक विस्तार और बढ़ते प्रशासनिक बोझ के बीच नियमित स्टाफ की भारी कमी से व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। समिति ने स्पष्ट कहा कि संविदा कर्मचारियों पर अत्यधिक निर्भरता परीक्षाओं की साख और विश्वसनीयता को जोखिम में डालती है, इसलिए संविदा आधारित व्यवस्था को समाप्त कर स्थाई नियुक्तियां की जानी चाहिए।

शिक्षा बजट को जीडीपी का 6 प्रतिशत करने की सिफारिश

संस्थागत रिक्तियों के अलावा, संसदीय समिति ने देश के कुल शिक्षा बजट और सार्वजनिक खर्च के ढांचे पर भी विस्तृत सिफारिशें प्रस्तुत की हैं। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त शिक्षा खर्च देश की जीडीपी का मात्र 4.1 प्रतिशत है, जो कि नई शिक्षा नीति 2020 में निर्धारित किए गए 6 प्रतिशत के राष्ट्रीय लक्ष्य से काफी कम है।

समिति ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि कुल शिक्षा बजट में प्रतिवर्ष कम से कम 10 प्रतिशत की अनिवार्य बढ़ोतरी की जाए। इसके साथ ही, एक समर्पित ‘गैर-व्यपगत शिक्षा कोष’ (Non-Lapsable Education Fund) बनाने का सुझाव दिया गया है ताकि शिक्षा के लिए आवंटित धनराशि का अन्य मदों में इस्तेमाल न हो सके। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग का बजट कुल केंद्रीय बजट का केवल 1.52 प्रतिशत है, जिसे तुरंत बढ़ाए जाने की जरूरत है।

NCERT-CBSE Vacancies: आगे की राह और सरकारी तंत्र की जवाबदेही

एनसीईआरटी और सीबीएसई भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली के दो मुख्य स्तंभ हैं। जहां एनसीईआरटी नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत नई किताबें तैयार करने और शिक्षकों के कौशल विकास में जुटी है, वहीं सीबीएसई देश-विदेश में फैली अपनी शाखाओं के माध्यम से मूल्यांकन प्रणाली को नियंत्रित करती है। इन दोनों निकायों में जनशक्ति की भारी कमी पूरे शैक्षणिक माहौल को प्रभावित कर रही है।

संसदीय प्राक्कलन समिति की यह रिपोर्ट अब संसद पटल पर रखी जा चुकी है और अब इस पर शिक्षा मंत्रालय के अंतिम जवाब और एक्शन टेकन रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था के रूप में खुद को स्थापित करना है, तो उसे अपनी नियामक और शैक्षणिक संस्थाओं को पर्याप्त बजट, आधुनिक संसाधन और पूर्ण स्थाई जनशक्ति प्रदान करनी ही होगी।

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