RBI की बड़ी चेतावनी: बचत के बजाय कर्ज ले रहे हैं भारतीय, पर्सनल और अनसिक्योर्ड लोन में 17% की भारी वृद्धि, बैंकिंग सिस्टम पर मंडराया संकट।
जमा और कर्ज के बीच बढ़ा फासला; हाई-रिस्क लोन में 17% की बढ़ोतरी से रिजर्व बैंक चिंतित।
RBI Report: देश की वित्तीय आदतें तेजी से बदल रही हैं और यह बदलाव अब चिंता का विषय बनता जा रहा है। जहां कुछ साल पहले तक भारतीय परिवार बचत को अपनी प्राथमिकता मानते थे, वहीं आज ज्यादातर लोग आसान कर्ज लेने की ओर बढ़ रहे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ताजा रिपोर्ट में यह चिंताजनक तस्वीर साफ नजर आ रही है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में बैंक डिपॉजिट की वृद्धि दर महज 9 से 11 प्रतिशत के बीच रही, जबकि कर्ज वृद्धि दर 13.8 प्रतिशत तक पहुंच गई। यानी जमा और कर्ज के बीच 3 से 5 प्रतिशत का बड़ा अंतर बन गया है। खासकर पर्सनल लोन और हाई-रिस्क लोन में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है, जिससे अर्थव्यवस्था पर जोखिम भरे संकेत मिल रहे हैं।
RBI रिपोर्ट में खुलासा: जमा कम, कर्ज की रफ्तार तेज
RBI की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में क्रेडिट वृद्धि दर (13.8%) और डिपॉजिट वृद्धि दर (9-11%) का अंतर पिछले कई वर्षों में सबसे ज्यादा है। इसका सीधा मतलब है कि लोग अब अपनी आय का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में खर्च कर रहे हैं, बजाय इसके कि उसे बैंक में जमा करें।
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पर्सनल लोन: कार लोन, गोल्ड लोन और कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन की मांग में सबसे तेज बढ़ोतरी हुई है।
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हाई-रिस्क लोन: दिसंबर 2025 के बाद से हाई-रिस्क लोन कैटेगरी में सालाना आधार पर 17 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। ये वे कर्ज हैं जो आमतौर पर कम क्रेडिट स्कोर वाले लोगों को दिए जाते हैं, जिनमें डिफॉल्ट का खतरा बहुत अधिक होता है।
RBI Report: पर्सनल लोन का आकर्षण और डिजिटल लेंडिंग का प्रभाव
डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म्स की आसानी और “तुरंत मंजूरी” के आकर्षण ने लोगों को कर्ज लेने के लिए प्रेरित किया है।
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युवा पीढ़ी पर असर: ऑनलाइन शॉपिंग, ट्रैवल, गैजेट्स और लाइफस्टाइल खर्चों के लिए इन लोन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है।
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जोखिम: “अभी खरीदो, बाद में चुकाओ” की संस्कृति युवाओं को उनकी आय से ज्यादा कर्ज लेने पर मजबूर कर रही है, जो भविष्य में उनके व्यक्तिगत वित्तीय स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
RBI Report: बैंकिंग सिस्टम और अर्थव्यवस्था पर दबाव
RBI ने बैंकों को हाई-रिस्क लोन मंजूर करते समय सख्ती बरतने की सलाह दी है।
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NPA का खतरा: अनसिक्योर्ड कर्जों के डूबने (NPA) का खतरा बैंकों के बैलेंस शीट पर बोझ बन सकता है।
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महंगे फंड: बैंक जमा कम होने से बैंकों को कर्ज देने के लिए महंगे फंड जुटाने पड़ते हैं, जिससे अंततः बाजार में ब्याज दरें बढ़ती हैं।
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बचत दर: बचत दर घटने से देश का दीर्घकालिक निवेश प्रभावित होता है, जो आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है।
युवा और मध्यम वर्ग: कर्ज का चक्र
महंगाई, महंगे घर, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च ने मध्यम वर्ग की बचत को कम कर दिया है। कई परिवारों में अब EMI ही मुख्य मासिक खर्च बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आय का स्रोत प्रभावित होता है, तो ये परिवार तुरंत कर्ज के बोझ तले दब सकते हैं। कर्ज की चिंता से तनाव और डिप्रेशन जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखे जा रहे हैं।
बचत vs कर्ज: विशेषज्ञों की सलाह
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोग (Consumption) के लिए कर्ज लेना हमेशा जोखिम भरा होता है। उन्होंने कुछ प्रमुख सुझाव दिए हैं:
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बजट निर्माण: अपनी आय का कम से कम 20-30 प्रतिशत हिस्सा बचत में लगाएं।
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इमरजेंसी फंड: भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए हमेशा एक फंड तैयार रखें।
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वित्तीय साक्षरता: PPF, म्यूचुअल फंड और पोस्ट ऑफिस सेविंग जैसी सरकारी स्कीम्स का उपयोग करें।
निष्कर्ष: समय है सतर्क होने का
RBI की रिपोर्ट साफ संकेत दे रही है कि भारतीयों को अपनी वित्तीय आदतों पर फिर से विचार करना होगा। अब जरूरत है जागरूकता, अनुशासन और सही प्लानिंग की। अगर हम आज बचत को फिर प्राथमिकता दें, तो ही कल का भविष्य सुरक्षित और समृद्ध होगा। RBI और सरकार की चेतावनी को गंभीरता से लेना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
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