Tamil Nadu Politics: थलपति विजय की पीएम उम्मीदवारी पर घमासान, क्या कांग्रेस गिरा सकती है तमिलनाडु सरकार?

Tamil Nadu Politics: थलपति विजय की पीएम उम्मीदवारी पर घमासान, क्या कांग्रेस गिरा सकती है तमिलनाडु सरकार?

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Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु की राजनीति में इस समय भूचाल आया हुआ है, और इसकी मुख्य वजह मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की बढ़ती राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं हैं। राज्य की सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद, थलपति विजय की पार्टी टीवीके और सहयोगी कांग्रेस के बीच प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर भारी तनातनी शुरू हो गई है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कांग्रेस ने साफ चेतावनी दे दी है कि यदि रुख स्पष्ट नहीं हुआ तो उनके कोटे के मंत्री इस्तीफा दे सकते हैं। क्या एक कुर्सी की यह लड़ाई तमिलनाडु में सरकार का खेल बिगाड़ देगी, यह सवाल इस वक्त हर राजनीतिक विश्लेषक की जुबान पर है।

Tamil Nadu Politics: चुनाव परिणाम और सरकार का गठन

मई महीने में जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे, तब हर कोई हैरान रह गया था। सिनेमाई पर्दे के सुपरस्टार सी जोसेफ विजय की नई नवेली पार्टी तमिलागा वेत्री कझगम ने पारंपरिक ताकतों को पछाड़ते हुए शानदार प्रदर्शन किया था। डीएमके को पीछे छोड़कर टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, हालांकि जादुई आंकड़े से वह थोड़ा पीछे रह गई थी। विधानसभा की कुल दो सौ चौतीस सीटों में बहुमत का जादुई आंकड़ा एक सौ अट्ठारह का था, जबकि विजय की पार्टी एक सौ आठ सीटें ही जीत सकी थी। दो सीटों पर खुद विजय की जीत के बाद एक सीट छोड़ने पर यह संख्या और कम होनी तय थी, जिससे सरकार बनाना अपने आप में एक बड़ा इम्तिहान बन गया था।

कांग्रेस और अन्य दलों का मिला साथ

ऐसे नाजुक दौर में कांग्रेस ने आगे बढ़कर विजय का हाथ थामा और पांच विधायकों के समर्थन से सरकार का रास्ता साफ कर दिया। इसके अलावा सीपीआई, सीपीएम, वीसीके और आईयूएमएल जैसे दलों के दो-दो विधायकों ने भी विजय को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। तमाम समीकरणों के बैठने के बाद गठबंधन का कुल आंकड़ा एक सौ बीस तक जा पहुंचा और थलपति विजय राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए। यह अपने आप में एक अनोखा राजनीतिक प्रयोग था, जहां एक अभिनेता ने राजनीति के पन्ने पर बहुत कम समय में एक बड़ी लकीर खींच दी थी। लेकिन, किसी ने नहीं सोचा था कि यह साथ इतनी जल्दी पटरी से उतर जाएगा।

मंत्रियों के बयानों से भड़की चिंगारी

असली घमासान तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु सरकार में शामिल मंत्रियों ने खुलेआम थलपति विजय को देश का अगला प्रधानमंत्री बताना शुरू कर दिया। कैबिनेट मंत्री एम शरतकुमार ने एक सार्वजनिक मंच से यहां तक कह दिया कि उनके नेता दिलों और सेंट जॉर्ज फोर्ट के बाद अब देश के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। इसके तुरंत बाद एक अन्य मंत्री आधव अर्जुन ने भी यह मांग उठा दी कि अगला प्रधानमंत्री दक्षिण भारत से ही होना चाहिए। इन बयानों के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं कि क्या दक्षिण की राजनीति अब राष्ट्रीय फलक पर एक नए विकल्प की तलाश में जुट गई है।

सर्वे रिपोर्ट ने डाली आग में घी

मामला तब और ज्यादा गंभीर हो गया जब राष्ट्रीय स्तर पर आए एक सर्वे ने इस सियासी चिंगारी को और हवा दे दी। इंडिया टुडे के मूड ऑफ द नेशन पोल में प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरों की रेस में थलपति विजय को नौ प्रतिशत समर्थन के साथ सीधे तीसरे स्थान पर दिखाया गया। इस सर्वे के सामने आते ही टीवीके समर्थकों का उत्साह दोगुना हो गया और उत्तर भारत के कई इलाकों में भी उनके समर्थन में पोस्टर और वीडियो चलने लगे। स्थानीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस तरह के सर्वे ने क्षेत्रीय दल के नेता को राष्ट्रीय स्तर पर अचानक लाकर खड़ा कर दिया, जिससे पारंपरिक राष्ट्रीय दलों की नींद उड़नी लाजिमी थी।

कांग्रेस का तीखा हमला और चेतावनी

यह सब देखकर राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का भड़कना स्वाभाविक था क्योंकि वह राहुल गांधी को इस रेस में सबसे आगे देखना चाहती है। कांग्रेस नेताओं ने तंज कसते हुए साफ कह दिया कि टीवीके अभी पूरी तरह फैन मोड में जी रही है और केवल एक सुपरस्टार के इर्द-गिर्द बड़ी पार्टी चलाने से देश का प्रधानमंत्री नहीं बना जा सकता है। इसके लिए दो सौ बहत्तर सांसदों के जादुई आंकड़े की जरूरत होती है, जिसे समझना अभी बाकी है। बात सिर्फ जुबानी जंग तक सीमित नहीं रही, बल्कि कांग्रेस विधायक और पर्यटन मंत्री एस राजेश कुमार ने दो टूक चेतावनी दे डाली कि यदि भविष्य में राहुल गांधी का समर्थन नहीं किया गया, तो वे सरकार से समर्थन खींचते हुए अपने मंत्रियों का इस्तीफा सौंप देंगे।

Tamil Nadu Politics: गठबंधन पर मंडराते काले बादल

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखने पर साफ पता चलता है कि थलपति विजय के सामने इस समय दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ उन्हें अपने राज्य की सरकार को सुचारू रूप से चलाना है, तो दूसरी तरफ अपनी पार्टी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को भी संभालना है। यदि गठबंधन के भीतर यह खींचतान यूं ही जारी रही, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर संकट के बादल मंडराना तय है। डीएमके विरोधी खेमे में बनी इस नई सरकार का भविष्य अब पूरी तरह से इस बात पर टिका है कि दोनों दल आपसी अहंकार को छोड़कर किस तरह का व्यावहारिक रुख अपनाते हैं।
राजनीति की बिसात पर कब कौन सा मोहरा पलट जाए, यह कोई नहीं जानता और तमिलनाडु का यह घटनाक्रम इसका सबसे ताजा उदाहरण है। क्षेत्रीय जनादेश के बल पर सत्ता में आए थलपति विजय के लिए अब यह तय करना बेहद कठिन हो रहा है कि वे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की भावनाओं को तरजीह दें या फिर दिल्ली की राजनीति साधने में जुटे सहयोगियों को मनाएं। एक तरफ जहां कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के नाम पर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं दिखती, वहीं टीवीके के भीतर भी मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय स्तर पर देखने की हसरत परवान चढ़ रही है। आने वाले कुछ दिन राज्य की सियासत के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं क्योंकि कोई भी गलत कदम सीधे तौर पर सरकार के पतन का कारण बन सकता है। फिलहाल सभी राजनीतिक दलों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चेन्नई से लेकर दिल्ली तक इस घमासान पर आगे क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।

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