NDPS, UAPA और PMLA के मामलों में लंबी देरी पर जमानत का सवाल, बड़ी पीठ करेगी विचार
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार और NDPS, UAPA व PMLA के कठोर जमानत प्रावधानों के बीच कानूनी संबंध पर विचार का मुद्दा बड़ी पीठ को भेजा है।
Supreme Court News: देश की शीर्ष अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में एक दूरगामी और ऐतिहासिक न्यायिक टिप्पणी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया है कि भारत का संविधान देश का सर्वोपरि कानून है और संसद अथवा राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाया गया कोई भी विशेष वैधानिक कानून संविधान के बुनियादी सिद्धांतों से ऊपर नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को त्वरित एवं निष्पक्ष सुनवाई (Speedy Trial) का जो अधिकार प्राप्त है, वह एक मौलिक अधिकार है। स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS), गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) तथा धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) जैसे कड़े और विशेष कानूनों के कठोर प्रावधान भी संवैधानिक स्वतंत्रता के इस मूल अधिकार को निष्प्रभावी नहीं कर सकते। यदि किसी मामले में बिना विचाराधीन कैदी की गलती के मुकदमे की सुनवाई वर्षों तक अटकी रहती है, तो यह अनुचित विलंब स्वतः ही नियमित जमानत देने का एक मजबूत आधार बन जाता है।
शीर्ष अदालत की यह व्याख्या ऐसे समय में आई है जब विशेष कानूनों में जमानत से जुड़ी ‘दोहरी शर्तों’ (Twin Conditions) और जेल में लंबे समय तक बिना दोषसिद्धि के बंद रहने वाले विचाराधीन कैदियों की स्थिति पर कानूनी जगत में व्यापक विमर्श चल रहा है।
Supreme Court News: संविधान सभी कानूनों से ऊपर
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने अपने आदेश में संवैधानिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को पुनः प्रतिष्ठित किया। पीठ ने दोहराया कि जब भी विधायिका द्वारा पारित किसी विशेष अधिनियम के दंडात्मक प्रावधानों और भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के बीच सीधा टकराव या विरोधाभास उत्पन्न होता है, तो ऐसी दशा में संविधान के प्रावधानों को ही पूर्ण अधिमान्यता और वरीयता मिलेगी।
अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मानवीय गरिमा, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार भारतीय न्यायशास्त्र की आधारशिला हैं। किसी भी क़ानून की कठोरता, चाहे वह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हो या मादक पदार्थों की तस्करी से, न्याय के उस आधारभूत सिद्धांत को समाप्त नहीं कर सकती जो बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल के लिए कारागार में रखने का निषेध करता है। क़ानून के सख्त प्रावधानों की आड़ लेकर किसी अभियुक्त को उसके संवैधानिक अधिकारों से अनिश्चित समय तक वंचित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 21 में समाहित है निष्पक्ष एवं त्वरित सुनवाई की गारंटी
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 यह गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। ऐतिहासिक मेनका गांधी मामले से लेकर के.एस. पुट्टास्वामी मामले तक, सुप्रीम कोर्ट ने लगातार स्पष्ट किया है कि ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ का केवल औपचारिक होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका न्यायसंगत, निष्पक्ष और तार्किक (Just, Fair and Reasonable) होना भी अनिवार्य है।
त्वरित सुनवाई का सिद्धांत इसी निष्पक्ष प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। यदि किसी आपराधिक प्रकरण में जांच एजेंसियों द्वारा विस्तृत आरोप पत्र दाखिल किए जाने के बावजूद वर्षों तक आरोप तय नहीं होते, सैकड़ों गवाहों की गवाही लंबित रहती है और मुकदमे के निकट भविष्य में समाप्त होने की कोई संभावना नहीं दिखती, तो विचाराधीन बंदी को जेल में रखना वस्तुतः सजा पूर्व कारावास (Pre-trial Incarceration) का रूप ले लेता है। खंडपीठ ने माना कि प्रक्रियागत देरी जब असहनीय सीमा को पार कर जाती है, तो वह अनुच्छेद 21 का गंभीर उल्लंघन बनती है, जिससे विशेष कानून की कठोरता पर संवैधानिक अधिकार प्रभावी हो जाता है।
NDPS एक्ट की धारा 37 के पूर्व न्यायिक दृष्टिकोण पर सवाल
पीठ ने अपने आदेश के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के ही पूर्ववर्ती कुछ आदेशों की न्यायिक व्याख्या पर असहमति व्यक्त की। विशेष रूप से एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के संदर्भ में, जो यह अनिवार्य करती है कि जमानत देने से पूर्व अदालत को यह संतुष्टि दर्ज करनी होगी कि प्रथम दृष्टया अभियुक्त निर्दोष है और वह भविष्य में ऐसा अपराध नहीं करेगा।
अतीत के कुछ फैसलों में यह दृष्टिकोण अपनाया गया था कि आरोपी त्वरित सुनवाई के अधिकार का दावा केवल धारा 37 की सीमा के भीतर रहकर ही कर सकता है और महज मुकदमे में विलंब के आधार पर इन अनिवार्य वैधानिक शर्तों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस संकीर्ण व्याख्या पर गंभीर असहमति जताई। पीठ का मत था कि यदि किसी विशेष कानून की धारा को संविधान के अनुच्छेद 21 पर हावी होने की अनुमति दी जाती है, तो यह संवैधानिक अधिकारों के क्षरण की खतरनाक मिसाल बन जाएगी। संसद का कोई भी विधायी कार्य संविधान की सीमाओं को नहीं लांघ सकता।
PMLA, UAPA और NDPS में जमानत के मानकों पर कानूनी मतभेद
हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न पीठों द्वारा पीएमएलए, यूएपीए और एनडीपीएस जैसे कठोर कानूनों के तहत जमानत याचिकाओं पर परस्पर विरोधी दृष्टिकोण देखने को मिले हैं। एक ओर जहां कुछ पीठों ने ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ के पारंपरिक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि मुकदमे में अनुचित देरी स्वयं में जमानत का वैध आधार है, वहीं कुछ अन्य पीठों ने संसद की मंशा और विशेष अधिनियमों की धारा 37 (NDPS), धारा 45 (PMLA) और धारा 43D(5) (UAPA) के कठोर प्रतिबंधों को सर्वोपरि माना है।
इस स्पष्ट न्यायिक अंतर्विरोध और दो अलग-अलग पीठों के परस्पर विरोधी मतों को संज्ञान में लेते हुए पीठ ने इस पूरे विषय को एक वृहद पीठ (Larger Bench) के समक्ष विचारार्थ संदर्भित कर दिया है। अब भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित की जाने वाली तीन या पांच जजों की बड़ी संविधान पीठ इस मूलभूत प्रश्न का अंतिम निपटारा करेगी कि क्या विशेष कानूनों में वर्णित जमानत की वैधानिक शर्तें अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार को सीमित या बाधित कर सकती हैं।
Supreme Court News: न्याय प्रणाली और विचाराधीन कैदियों के लिए इस निर्णय के मायने
यह न्यायिक संदर्भ देश की आपराधिक न्याय प्रणाली और जेलों में बंद लाखों विचाराधीन कैदियों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। भारत की जेलों में बंद कुल कैदियों में से 75 प्रतिशत से अधिक विचाराधीन कैदी हैं, जिनमें से एक बड़ा वर्ग एनडीपीएस और अन्य विशेष कानूनों के तहत वर्षों से मुकदमों के निस्तारण की प्रतीक्षा कर रहा है।
शीर्ष अदालत द्वारा संवैधानिक सर्वोच्चता पर दिया गया यह स्पष्ट संदेश भविष्य में निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत का काम करेगा। यदि बड़ी पीठ त्वरित सुनवाई के अधिकार को विधायी प्रतिबंधों से ऊपर रखने के सिद्धांत पर अंतिम मुहर लगा देती है, तो जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष पर मुकदमों को तय समयसीमा के भीतर समाप्त करने का विधिक दबाव बढ़ेगा, जिससे न्याय प्रणाली में जवाबदेही और मानवीय दृष्टिकोण को नया संबल मिलेगा।
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