दीपावली से पहले देहरादून की हवा हुई प्रदूषित, लगातार चार दिन से 100 के पार AQI

देहरादून के घंटाघर और ऋषिकेश में वायु गुणवत्ता सूचकांक 100 के पार दर्ज किए जाने का दावा है।

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Dehradun AQI: अपनी प्राकृतिक सुंदरता और स्वच्छ आबोहवा के लिए पहचानी जाने वाली उत्तराखंड की दून घाटी में सर्दियों की दस्तक और त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से पांव पसारने लगा है। प्रकाश पर्व दीपावली से पूर्व ही राजधानी देहरादून की हवा में घुले सूक्ष्म प्रदूषक कणों ने पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आधिकारिक निगरानी आंकड़ों के अनुसार, दून शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) लगातार चौथे दिन 100 के आंकड़े को पार कर ‘मध्यम से अस्वस्थ’ (Moderate to Poor) श्रेणी में बना हुआ है। वाहनों के अनवरत दबाव, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल और गिरते पारे के कारण घाटी में प्रदूषक तत्वों का जमावड़ा शुरू हो गया है।
दीपावली के दौरान होने वाली व्यापक आतिशबाजी, पराली के मौसमी प्रभाव और व्यावसायिक बाजारों की चहल-पहल से आने वाले दिनों में यह स्थिति और अधिक विकट होने की प्रबल आशंका है। विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए यह धुंध भरी हवा स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रही है।

Dehradun AQI: लगातार चार दिनों से 100 के पार एक्यूआई, घाटी में ठहरने लगा धुआं

वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों से प्राप्त दैनिक विश्लेषण के अनुसार, देहरादून का समग्र एक्यूआई पिछले चार दिनों से लगातार 100 से 120 के दायरे में दर्ज किया जा रहा है। पर्यावरण विज्ञान के मानकों के अनुसार 0 से 50 के बीच एक्यूआई को ‘अच्छा’ और 51 से 100 को ‘संतोषजनक’ माना जाता है, किंतु जैसे ही यह सूचकांक 100 के पार जाता है, यह सांस और फेफड़ों के रोगियों के लिए असहज परिस्थितियां उत्पन्न करने लगता है।
दिसंबर और नवंबर के संधिकाल में दून घाटी का विशिष्ट भूगोल भी प्रदूषण बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम करता है। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी घाटी में जब तापमान नीचे गिरता है, तो ‘थर्मल इन्वर्जन’ (Thermal Inversion) की स्थिति पैदा हो जाती है। इसके चलते निचली सतह की ठंडी हवा ऊपर नहीं उठ पाती और वाहनों व धूल-धुएं के बारीक कण वातावरण में ही फंसकर रह जाते हैं।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने शुरू किया 24 घंटे का सघन निगरानी अभियान

दीपावली के पावन पर्व पर आतिशबाजी के प्रभावों का सटीक वैज्ञानिक आकलन करने के लिए उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UEPPCB) ने 1 नवंबर से एक वृहद 24-घंटे निगरानी अभियान प्रारंभ किया है। यह विशेष अभियान त्योहार से पूर्व, मुख्य दीपावली के दिन और पर्व के उपरांत के वायुमंडलीय परिवर्तनों का तुलनात्मक डेटा संकलित करने के उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है।
इस अध्ययन को पूर्णतः पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए बोर्ड द्वारा अधिकृत थर्ड-पार्टी तकनीकी एजेंसियों और वैज्ञानिक अनुसंधान टीमों को तैनात किया गया है। यह टीमें स्वचालित और मैनुअल परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों के जरिए रियल-टाइम आंकड़ों को दर्ज कर रही हैं, ताकि आतिशबाजी और सामान्य व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण के अंतर को स्पष्ट रूप से समझा जा सके।

घंटाघर, नेहरू कॉलोनी, ऋषिकेश और टिहरी में स्थापित विशेष जांच केंद्र

प्रदूषण नियंत्रण तंत्र के अंतर्गत देहरादून जनपद के साथ-साथ पड़ोसी मैदानी व पर्वतीय क्षेत्रों के वायु मानकों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है। इसके लिए देहरादून शहर के सबसे व्यस्त व्यावसायिक केंद्र घंटाघर और घनी आवासीय आबादी वाली नेहरू कॉलोनी को मुख्य परीक्षण केंद्र बनाया गया है। इसके समानांतर तीर्थ नगरी ऋषिकेश और उच्च पर्वतीय क्षेत्र नई टिहरी में भी वायु नमूने एकत्र किए जा रहे हैं।
हालिया जारी क्षेत्रीय तुलनात्मक आंकड़ों में घंटाघर क्षेत्र का एक्यूआई 112 दर्ज किया गया, जो वाहनों के अत्यधिक आवागमन के सीधे प्रभाव को दर्शाता है। वहीं, नेहरू कॉलोनी में यह सूचकांक 99 के आसपास रहा। ऋषिकेश के औद्योगिक और शहरी भाग में एक्यूआई 103 के स्तर पर पाया गया, जबकि इसके विपरीत टिहरी गढ़वाल के पर्वतीय अंचल में एक्यूआई मात्र 44 दर्ज किया गया, जो ‘अत्यंत शुद्ध’ श्रेणी में आता है। यह आंकड़े प्रमाणित करते हैं कि शहरीकरण और अनियंत्रित वाहन दबाव ही दून व ऋषिकेश की हवा को जहरीला बना रहे हैं।

सूक्ष्म कणों PM 2.5 और PM 10 की सांद्रता पर टिकी है वैज्ञानिकों की नजर

इस विशेष निगरानी अभियान में वायु में तैरने वाले पर्टिकुलेट मैटर (PM 10 और PM 2.5) की सघनता पर विशेष फोकस रखा जा रहा है। पीएम-10 के अंतर्गत सड़क की धूल, निर्माण सामग्री के कण और सामान्य कालिख आती है, जबकि पीएम-2.5 अति-सूक्ष्म कण होते हैं जो मुख्य रूप से पटाखों, डीजल-पेट्रोल के दहन और कचरा जलाने से उत्पन्न होते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार पीएम-2.5 कण इतने बारीक होते हैं कि वे फेफड़ों की रक्षात्मक नलियों को पार कर सीधे रक्त प्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे हृदय रोग, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त दमकल विभाग और प्रदूषण बोर्ड द्वारा पटाखों से निकलने वाली हानिकारक सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) जैसी जहरीली गैसों के स्तर की भी निरंतर रासायनिक जांच की जा रही है।

पिछले वर्षों में पटाखों से 250 के पार पहुंच गया था प्रदूषण का ग्राफ

देहरादून में दीपावली के दौरान वायु गुणवत्ता का तेजी से गिरना एक गंभीर वार्षिक प्रवृत्ति बन चुका है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पिछले दो वर्षों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस खतरे की गंभीरता को स्पष्ट रेखांकित करते हैं। वर्ष 2025 में दीपावली की रात अत्यधिक आतिशबाजी के चलते घंटाघर का एक्यूआई 254 और नेहरू कॉलोनी का 230 दर्ज किया गया था, जिसे ‘अत्यंत खराब’ श्रेणी में गिना जाता है।
वहीं, वर्ष 2024 में यह स्थिति और भी भयावह थी, जब घंटाघर का एक्यूआई 288 और नेहरू कॉलोनी का स्तर 243 तक जा पहुंचा था। चिंता का मुख्य पहलू यह है कि इस वर्ष त्योहार से कई दिन पूर्व ही हवा 100 के पार पहुंच चुकी है। यदि दीपावली पर पटाखों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रहा, तो यह आंकड़ा आगामी दिनों में 300 के पार जाकर ‘गंभीर’ (Severe) स्तर पर पहुंच सकता है।

Dehradun AQI: सुबह की सैर और खुले में व्यायाम से बचें संवेदनशील लोग

दून अस्पताल और कोरोनेशन अस्पताल के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट (श्वसन रोग विशेषज्ञ) ने मौजूदा वायु गुणवत्ता को देखते हुए नागरिकों को सतर्कता बरतने की सलाह दी है। चिकित्सकों के अनुसार, जिन लोगों को दमा, एलर्जी, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) या हृदय संबंधी शिकायतें हैं, उन्हें सुबह और देर शाम जब वातावरण में धुंध और ठंडक अधिक हो, खुले में भारी व्यायाम या टहलने से बचना चाहिए।
त्योहारी सीजन में बाहर निकलते समय एन-95 मास्क का प्रयोग करने, पर्याप्त मात्रा में गुनगुना पानी पीने और घर के भीतर वायु शुद्धता बनाए रखने के उपाय अपनाने की अपील की गई है। इसके साथ ही प्रशासन ने नगर निगम को प्रमुख सड़कों पर धूल दबाने के लिए नियमित रूप से पानी का छिड़काव करने और खुले में कूड़ा जलाने पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

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