Supreme Court Guidelines: रेप केस में ‘लज्जा भंग’ और ‘बेबस महिला’ जैसे शब्दों पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने फैसलों में रूढ़िवादी शब्दों पर रोक, पीड़ित-केंद्रित भाषा पर दिया जोर
Supreme Court Guidelines: सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई और फैसलों की लेखन शैली में संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में अदालतों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे फैसलों में ‘लज्जा भंग’, ‘बेबस महिला’, ‘पवित्रता खो दी’ और ‘शर्म’ जैसे रूढ़िवादी शब्दों का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। इसके बजाय अदालतों को पीड़ित-केंद्रित, कानूनी रूप से सटीक और तटस्थ भाषा अपनाने की सलाह दी गई है। यह ऐतिहासिक रिपोर्ट ‘जजमेंट्स एंड जेंडर: सेंसिटिविटी एंड कम्पैशन इन राइटिंग जजमेंट्स’ शीर्षक से प्रकाशित की गई है। इसे राज्य न्यायिक अकादमियों के सहयोग से देश भर की निचली अदालतों के 125 फैसलों का गहन विश्लेषण करने के बाद तैयार किया गया है। समिति ने पाया कि कई फैसलों में पितृसत्तात्मक और पीड़ित को ही दोषी ठहराने वाली भाषा का इस्तेमाल हो रहा था, जो सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देती है।
समिति का गठन और पृष्ठभूमि
यह विशेषज्ञ समिति सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2026 के निर्देशों के तहत गठित की गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादास्पद फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन अपराध के मामले में अदालत की भाषा और दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल उठे थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक जस्टिस अनिरुद्ध बोस के नेतृत्व में एक विशेषज्ञ समिति बनाने का आदेश दिया था। इस समिति में कानून विशेषज्ञ, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। समिति का मुख्य उद्देश्य यौन अपराधों और समाज के कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में जजों के भीतर मानवीय संवेदनशीलता और करुणा विकसित करने के लिए एक मानक ढांचा तैयार करना था।
प्रतिबंधित शब्द और वाक्यांश
समिति की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अदालती कार्यवाहियों और फैसलों में ‘प्रोसिक्यूट्रिक्स’, ‘बेबस महिला’, ‘बेचारी बेबस नाबालिग लड़की’, ‘लज्जा भंग’, ‘पवित्रता खो दी’, ‘सम्मान’ और ‘संकोच’ जैसे शब्दों का प्रयोग पूरी तरह से रोका जाना चाहिए। ये शब्द उस पुरानी पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाते हैं जो महिला की गरिमा और कानूनी मूल्य को उसकी यौन पवित्रता या पारिवारिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखती है। इसके अतिरिक्त, ‘हवस से प्रेरित’, ‘नाजायज हवस पूरी करना’, ‘बचपन बर्बाद करना’ और ‘शरीर को खेल का मैदान समझना’ जैसे अति-नाटकीय वाक्यांशों पर भी रोक लगाई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी अनौपचारिक भाषा पीड़ितों को मानसिक रूप से दोबारा सदमा पहुंचाती है और अपराध की कानूनी गंभीरता को कम करती है।
स्वीकृत कानूनी शब्दावली
रिपोर्ट में अदालतों को सुझाव दिया गया है कि वे ‘प्रोसिक्यूट्रिक्स’ या पुरानी शब्दावली के बजाय ‘विक्टिम’, ‘सर्वाइवर’, ‘कंप्लेनेंट’, ‘बॉडीली ऑटोनॉमी’ यानी शरीर पर स्वायत्त अधिकार और ‘सेक्सुअल असॉल्ट’ यानी यौन हमला जैसे कानूनी और आधुनिक शब्दों का उपयोग करें। फैसलों में ‘शरीर की स्वायत्तता का उल्लंघन’ और ‘सर्वाइवर को गंभीर मानसिक ट्रॉमा का अनुभव हुआ’ जैसे वाक्यांश अधिक उपयुक्त और निष्पक्ष माने गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा है कि न्यायिक तर्कों का मुख्य आधार पीड़िता की सहमति, उसकी गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकार होने चाहिए। यौन हमले को महज़ पुरुषों की बेकाबू ‘हवस’ के रूप में पेश करने के बजाय इसे स्पष्ट रूप से यौन हिंसा और गंभीर कानूनी अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण और मिथकों का अंत
समिति ने जजों को ताकीद की है कि वे सुनवाई के दौरान रूढ़िवादी या पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाने वाले प्रश्न न पूछें। पीड़ितों को आरोपी के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत या समझौते के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में जजों को यौन अपराधों से जुड़े पुराने सामाजिक मिथकों से बचने की सख्त हिदायत दी गई है। स्पष्ट किया गया है कि पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान का न होना, घटना की देरी से शिकायत करना या तुरंत विरोध न दर्ज कराना किसी भी तरह से उसकी ‘सहमति’ का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हर पीड़िता किसी भी दर्दनाक घटना या ट्रॉमा पर अलग तरह से प्रतिक्रिया दे सकती है, इसलिए अदालतों को बिना किसी पूर्वाग्रह के केवल साक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
Supreme Court Guidelines: अदालत परिसर में सुरक्षा और व्यवहारिक नीतियां
न्यायिक संवेदनशीलता के अलावा, समिति ने अदालतों में स्पष्ट नीतियां बनाने, सहायता प्रणालियों को मजबूत करने और समाज में कलंक को कम करने के लिए जन-जागरूकता अभियानों की आवश्यकता पर बल दिया है। सुनवाई के दौरान किसी भी प्रकार की लिंग-आधारित या नैतिक टिप्पणियों पर सख्त प्रतिबंध रहेगा। पीठासीन अधिकारियों की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी होगी कि वे पीड़ित और कमजोर गवाहों की सुरक्षा के लिए स्वयं आगे आकर पहल करें। रिपोर्ट के अनुसार, संवेदनशील भाषा ही अदालती निष्पक्षता और संवैधानिक न्याय की पहली शर्त है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Guidelines) का यह नया निर्देश यौन अपराधों की न्यायिक प्रक्रिया को अधिक मानवीय और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। शीर्ष अदालत ने इस रिपोर्ट को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करने के साथ-साथ सभी हाईकोर्ट, ट्रिब्यूनल, विधिक सेवा प्राधिकरणों और संबंधित विभागों को भेजने के निर्देश जारी कर दिए हैं। रिपोर्ट में नौ बुनियादी सिद्धांतों का उल्लेख है जो भविष्य के फैसलों में मार्गदर्शक का काम करेंगे, जिनमें साक्ष्य-आधारित तर्क और रूढ़िवादिता से मुक्ति प्रमुख हैं। भाषा को सरल और भारतीय संदर्भ के अनुकूल बनाने से आम पीड़ितों का न्याय प्रणाली में विश्वास और अधिक मजबूत होगा।
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