Sultanganj Sawan: सावन में नहीं सोता शहर, चौबीस घंटे जागती रहती है शिवभक्ति
उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर लाखों कांवरिए बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए करते हैं पदयात्रा
Sultanganj Sawan: श्रावण मास का पावन आगमन होते ही बिहार के भागलपुर जिले में स्थित ऐतिहासिक नगरी सुलतानगंज की पूरी आबो-हवा और सामाजिक परिदृश्य एक अलौकिक आध्यात्मिक रंग में ढल जाता है। उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसा यह शहर सावन के पूरे महीने एक ऐसे जीवंत धार्मिक केंद्र में तब्दील हो जाता है, जहाँ दिन और रात का नैसर्गिक अंतर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। चौबीसों घंटे गंगा घाटों पर उमड़ने वाला कांवरियों का अपार जनसैलाब, पवित्र जल भरकर बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) की ओर प्रस्थान करने वाले श्रद्धालुओं के अनुशासित कदम और ‘बोल बम’, ‘हर-हर महादेव’ के गगनभेदी जयघोष से समूची नगरी गुंजायमान रहती है। आधी रात का पहर हो या तड़के के तीन बजे, यहाँ आस्था का प्रवाह कभी विश्राम नहीं लेता और शहर की हर सड़क, धर्मशाला व सेवा शिविर चौबीसों घंटे क्रियाशील रहते हैं।
केसरिया रंग का आवरण और अठानवे किलोमीटर की कठिन पदयात्रा
सुलतानगंज की भौगोलिक व सांस्कृतिक पहचान सावन के दौरान पूरी तरह से केसरियामय हो जाती है। रेलवे स्टेशन से लेकर अजगैबीनाथ मंदिर, नमामि गंगे घाट, मुख्य बाजार और कतारबद्ध काँवरिया पथ तक हर ओर केवल केसरिया ध्वज, वस्त्र और दिव्य साज-सज्जा ही दृष्टिगोचर होती है। नेपाल, भूटान और भारत के विभिन्न राज्यों से आने वाले विविध भाषाई व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के श्रद्धालु जब यहाँ पहुँचते हैं, तो उनकी क्षेत्रीय पहचान समाप्त होकर केवल ‘बम’ के रूप में एकाकार हो जाती है। उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र जल अर्पित कर अपनी काँवर सजाने के बाद श्रद्धालु देवघर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु 98 किलोमीटर की अत्यंत कठिन और समर्पित पैदल यात्रा आरंभ करते हैं, जो रात-दिन बिना रुके अनवरत जारी रहती है।
Sultanganj Sawan: रात-दिन अखंड सेवा भावना और स्थानीय अर्थव्यवस्था का संबल
सुलतानगंज में श्रावणी मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह जन-सेवा और स्थानीय आजीविका का एक विशाल सामाजिक-आर्थिक मॉडल भी प्रस्तुत करता है। पूरा शहर एक विस्तृत सेवा शिविर में बदल जाता है, जहाँ स्थानीय नागरिक, स्वयंसेवी संस्थाएं और प्रशासन मिलकर चौबीसों घंटे कांवरियों के लिए निःशुल्क गर्म पानी, चाय, भोजन, विश्राम व प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था करते हैं। अजगैबीनाथ मंदिर के स्थानीय पंडा समाज और व्यवसायियों के अनुसार यह एक माह का मेला होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, फल-फूल, पूजा सामग्री और अस्थायी दुकानों से जुड़े हजारों स्थानीय परिवारों की साल भर की आजीविका का मुख्य आधार बनता है, जिससे आस्था और स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक अटूट ताना-बाना निर्मित होता है।
प्रशासनिक सतर्कता और आस्था का वैश्विक संदेश
विशाल जनसमूह के सुचारू प्रबंधन (Sultanganj Sawan) और सुरक्षा हेतु राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन द्वारा अभूतपूर्व व्यवस्थाएं की जाती हैं। नमामि गंगे घाट से लेकर पूरे कांवरिया मार्ग पर त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था, ड्रोन कैमरों से निगरानी, अस्थायी चिकित्सा केंद्र, शुद्ध पेयजल आपूर्ति और सतत स्वच्छता अभियानों के लिए पुलिस व प्रशासनिक कर्मचारी चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं। सुलतानगंज की यह अनूठी परंपरा भारतीय सनातन संस्कृति की उस अडिग श्रद्धा का प्रतीक है जहाँ शारीरिक थकान पर भक्ति भाव विजय प्राप्त कर लेता है। सावन का यह पावन उत्सव यह सिद्ध करता है कि सुलतानगंज में रात कभी ढलती नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण शिवभक्ति की एक नई और ऊर्जावान सुबह का सूत्रपात करता है।
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