Sleep Psychology: कोई अंधेरे में तो कोई लाइट जलाकर क्यों सोता है? जानें वजह

कुछ लोगों को गहरी नींद के लिए अंधेरा पसंद होता है, जबकि कुछ लोग हल्की रोशनी में अधिक सहज महसूस करते हैं।

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Sleep Psychology: इंसानी शरीर और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली जितनी जटिल है, उससे जुड़ी आदतें भी उतनी ही हैरान करने वाली होती हैं। हर रात बिस्तर पर जाते ही हर व्यक्ति का एक अलग स्लीप रूटीन होता है। आपने अपने आसपास या परिवार में गौर किया होगा कि कुछ लोगों को सोने के लिए कमरे में ‘पिन-ड्रॉप साइलेंस’ और बिल्कुल घुप्प अंधेरा चाहिए होता है, यहां तक कि मोबाइल चार्जर की हल्की सी लाल बत्ती भी उनकी नींद में खलल डाल देती है। इसके ठीक उलट, कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो कमरे की लाइट पूरी तरह बंद होते ही बेचैन होने लगते हैं और उन्हें सोने के लिए नाइट लैंप, टीवी की धीमी रोशनी या दरवाजे के बाहर से आ रही हल्की रोशनी का सहारा चाहिए होता है। चिकित्सा विज्ञान, न्यूरोलॉजी और मनोविज्ञान के अनुसार, रोशनी या अंधेरे में सोने की यह पसंद सिर्फ कोई मामूली आदत नहीं है, बल्कि इसके पीछे शरीर की जैविक घड़ी, सुरक्षा की भावना और मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर का गहरा खेल होता है।

अंधेरे में सोने का जैविक विज्ञान: मेलाटोनिन और सर्केडियन रिदम का तालमेल

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, मानव शरीर प्रकृति के 24 घंटे वाले प्रकाश चक्र यानी ‘सर्केडियन रिदम’ (Circadian Rhythm) के आधार पर काम करता है। जब सूरज ढलता है और हमारे आसपास अंधेरा छाने लगता है, तो आंखों की रेटिना मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस हिस्से में स्थित सुप्राकियाजमैटिक न्यूक्लियस (SCN) को संकेत भेजती है। यह संकेत मिलते ही पीनियल ग्रंथि ‘मेलाटोनिन’ (Melatonin) हार्मोन का स्राव तेज कर देती है, जिसे ‘स्लीप हार्मोन’ भी कहा जाता है।

मेलाटोनिन के बढ़ते स्तर से हृदय गति धीमी होती है, मांसपेशियों को आराम मिलता है और शरीर को गहरी, निर्बाध और स्वास्थ्यवर्धक नींद आती है। अंधेरे में सोने वाले लोग अनजाने में इस प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया का पूरा लाभ उठाते हैं। अंधेरा कमरे में बाहरी विकर्षकों को समाप्त कर देता है, जिससे दिमाग दिनभर के तनाव और सूचनाओं के भार से मुक्त होकर तेजी से ‘स्लीप मोड’ में चला जाता है। ऐसे लोगों के लिए कमरे में मौजूद हल्की सी रोशनी भी मेलाटोनिन के उत्पादन को बाधित कर सकती है, जिससे उनकी नींद उचट जाती है।

लाइट जलाकर सोने की मनोवैज्ञानिक वजह: सुरक्षा का अहसास और पुरानी आदतें

दूसरी तरफ, जो लोग हल्की रोशनी में सोना पसंद करते हैं, उनके पीछे मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक और अवचेतन मन की अनुकूलन (कंडीशनिंग) जिम्मेदार होती है। बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बचपन में जब बच्चों को अंधेरे से डर (निक्टोफोबिया) लगता है, तो माता-पिता कमरे में नाइट लैंप या हल्की लाइट जलाकर छोड़ देते हैं। वर्षों तक इस माहौल में सोने से मस्तिष्क इस रोशनी को ‘सुरक्षा, नियंत्रण और सहजता’ से जोड़ लेता है। वयस्क होने के बाद भी यह आदत अवचेतन में बनी रहती है।

पूरी तरह अंधेरा होने पर ऐसे लोगों का एमिग्डाला (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो खतरे और डर को भांपता है) सक्रिय हो जाता है, जिससे उनके शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है और उन्हें अज्ञात बेचैनी महसूस होने लगती है। हल्की रोशनी उन्हें यह तसल्ली देती है कि उनके आसपास का माहौल सुरक्षित और नियंत्रण में है। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि रोशनी में सोने वाला हर वयस्क किसी फोबिया से ग्रस्त है; कई बार यह बस व्यक्तिगत आराम और तनाव को कम करने का एक निजी सुरक्षा कवच होता है।

क्या सोने की इस पसंद से व्यक्ति के स्वभाव का आकलन किया जा सकता है?

अक्सर पॉप-साइकोलॉजी में यह दावा किया जाता है कि अंधेरे में सोने वाले लोग अंतर्मुखी या शांत स्वभाव के होते हैं, जबकि रोशनी पसंद करने वाले असुरक्षा की भावना से घिरे होते हैं। हालांकि, आधुनिक वैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल रिसर्च ऐसे दावों की पुष्टि नहीं करते। किसी व्यक्ति का अंधेरा या रोशनी चुनना उसके व्यक्तित्व या चरित्र का पैमाना नहीं हो सकता।

यह पसंद मुख्य रूप से व्यक्ति की सेंसरी सेंसिटिविटी (संवेदी संवेदनशीलता), उसके आवासीय माहौल और कमरे की बनावट पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, जो लोग अक्सर रात में पानी पीने या वॉशरूम जाने के लिए उठते हैं, वे ठोकर लगने या गिरने के डर से भी नाइट लाइट जलाना पसंद करते हैं। वहीं, स्क्रीन पर अत्यधिक काम करने वाले संवेदनशील लोग आंखों को पूरा विश्राम देने के लिए गहरा अंधेरा तलाशते हैं। इसे किसी कमजोरी या मानसिक विकार के रूप में देखना पूरी तरह गलत है।

Sleep Psychology: अच्छी नींद के लिए कैसा होना चाहिए कमरे का माहौल?

नींद विशेषज्ञों (स्लीप थेरेपिस्ट्स) के अनुसार, यदि आपको कमरे में रोशनी रखकर ही नींद आती है, तो भी इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि वह रोशनी सेहत को नुकसान न पहुंचाए। रात में कभी भी नीली या सफेद रोशनी (ब्लू लाइट) जलाकर नहीं सोना चाहिए, क्योंकि यह तरंगदैर्ध्य मस्तिष्क को दिन होने का भ्रम देती है और मेलाटोनिन को पूरी तरह ब्लॉक कर देती है।

यदि रोशनी जरूरी ही है, तो मंद लाल, पीली या नारंगी रंग की गर्म रोशनी (वार्म लाइट) वाला नाइट लैंप चुनना चाहिए, जिसका प्रभाव आंखों पर न्यूनतम पड़ता है। इसके अलावा, नाइट लैंप को हमेशा फर्श के नजदीक या बिस्तर से दूर किसी कोने में लगाना चाहिए ताकि सीधी रोशनी चेहरे पर न पड़े। सोने से कम से कम 45 मिनट पहले स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी स्क्रीन को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए ताकि मस्तिष्क प्राकृतिक रूप से शांत हो सके।

Sleep Psychology: कब बन जाती है यह आदत गंभीर समस्या और कब लें डॉक्टर की सलाह?

हल्की रोशनी या अंधेरे में सोना तब तक पूरी तरह सामान्य है जब तक कि यह आपकी नींद की गुणवत्ता को खराब न करे। लेकिन यदि रात भर जलने वाली तेज रोशनी के कारण आपकी नींद बार-बार टूटती है, सुबह जागने पर आंखों में जलन, सिरदर्द या दिनभर थकान व चिड़चिड़ापन बना रहता है, तो यह संकेत है कि आपके शरीर को ‘डीप स्लीप’ नहीं मिल पा रही है। लंबे समय तक नींद में व्यवधान रहने से मेटाबॉलिज्म, हृदय स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। यदि अंधेरे कमरे की कल्पना मात्र से ही दिल की धड़कन बढ़ जाती है या पैनिक अटैक जैसी स्थिति बनती है, तो किसी पेशेवर काउंसलर या मनोचिकित्सक से कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) की मदद लेना बेहतर कदम साबित होता है।

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