Powada Folk Song: लावणी ही नहीं, पोवाडा भी है महाराष्ट्र की शान

शिवाजी महाराज और मराठा वीरों की शौर्यगाथाओं को पीढ़ियों तक जीवित रखती है यह लोककला

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Powada Folk Song: महाराष्ट्र की समृद्ध लोकसंस्कृति की जब भी बात होती है, तो अक्सर लोगों के जेहन में लावणी के आकर्षक घुंघरू और तमाशा का जीवंत मंचन ही उभरता है। लेकिन महाराष्ट्र की मिट्टी का एक और ऐसा गौरवशाली पहलू है जो केवल मनोरंजन तक सीमित न रहकर सीधे स्वाभिमान और रगों में दौड़ते खून को गर्मा देता है, और वह है पोवाडा। पोवाडा पारंपरिक मराठी लोकगायन की वह ओजपूर्ण विधा है, जिसमें शौर्य, अदम्य साहस, ऐतिहासिक संघर्षों और रणभूमि की गर्जना को संगीतबद्ध किया जाता है। विशेष रूप से हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठा साम्राज्य के अमर सेनानियों की वीरगाथाओं को सदियों से जनमानस की स्मृति में जीवित रखने का श्रेय इसी लोक विधा को जाता है।

Powada Folk Song: क्या है पोवाडा और क्यों माना जाता है इसे महाराष्ट्र का शौर्य-गान?

पोवाडा मूलतः वीरगाथा और ऐतिहासिक आख्यानों के गायन की एक अद्वितीय पारंपरिक शैली है। इसमें किसी युद्ध, पराक्रमी योद्धा या ऐतिहासिक घटनाक्रम को छंदबद्ध गीतों और नाटकीय संवादों के ताने-बाने में पिरोकर प्रस्तुत किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल श्रोताओं का मन बहलाना नहीं, बल्कि समाज में मातृभूमि के प्रति निष्ठा, वीरता और सांस्कृतिक स्वाभिमान की लौ जलाए रखना रहा है। महाराष्ट्र पर्यटन और सांस्कृतिक विभाग के अभिलेखों के अनुसार, पोवाडा ने मराठा इतिहास के गौरवशाली पलों को केवल मौखिक परंपरा के रूप में ही सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि जनमानस में इसे अमर सांस्कृतिक धरोहर बना दिया।

छत्रपति शिवाजी महाराज के दौर से जुड़ी है इसकी समृद्ध ऐतिहासिक जड़ें

पोवाडे का स्वर्णकाल मध्यकालीन भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज के उदय के साथ सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। 17वीं सदी में जब मराठा साम्राज्य का विस्तार हो रहा था, तब युद्ध के मैदान में सैनिकों का मनोबल बढ़ाने और नागरिकों को स्वराज्य के उद्देश्य से जोड़ने के लिए इस विधा का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ। अफजल खान के वध की रोमांचक घटना हो या फिर सूबेदार तानाजी मालुसरे द्वारा सिंहगढ़ किले पर किए गए अदम्य पराक्रम का प्रसंग, इन सभी ऐतिहासिक विजयों को तत्कालीन कवियों ने पोवाडों के माध्यम से लिपिबद्ध और सुरबद्ध किया। यही कारण है कि लिखित इतिहास से परे, लोकस्मृति के माध्यम से ये गाथाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनी रहीं।

शाहिर, जिलकरी और पारंपरिक वाद्यों की जुगलबंदी से बंधता है समां

पोवाडा की प्रस्तुति का अपना एक विशिष्ट और रौबदार विधान होता है। इसके मुख्य गायक और सूत्रधार को ‘शाहिर’ कहा जाता है, जो पूरी ऊर्जा और ऊंची आवाज में वीर रस से ओतप्रोत गाथा का नेतृत्व करता है। शाहिर के साथ उसके सहयोगी गायक होते हैं जिन्हें ‘जिलकरी’ कहा जाता है, जो कोरस में मुख्य पंक्तियों को दोहराते हुए वातावरण में ऊर्जा का संचार करते हैं।
इस प्रस्तुति में ‘डफ’ (एक प्रकार का बड़ा खंजरी जैसा वाद्य), एकतारे जैसा ‘तुनतुना’ और ‘मंजीरा’ या ताल का इस्तेमाल किया जाता है। डफ की तीव्र थाप और शाहिर की बुलंद व कड़क आवाज जब एक साथ गूंजती है, तो सामने बैठे श्रोता के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और वह खुद को ऐतिहासिक रणभूमि के बीच खड़ा महसूस करने लगता है।

पेशवा काल में विस्तार और पानीपत के युद्ध की मार्मिक गाथाएं

18वीं शताब्दी के दौरान पेशवा काल में पोवाडा परंपरा को और अधिक व्यापक संरक्षण और विस्तार मिला। इस दौर में मराठा साम्राज्य के उत्तर भारत तक प्रसार और बड़े सैन्य अभियानों ने नए पोवाडों को जन्म दिया। वर्ष 1761 में लड़े गए पानीपत के तीसरे भीषण युद्ध में मराठा रणबांकुरों के बलिदान और शहादत को शाहिरों ने अत्यंत मार्मिक और ओजस्वी शब्दों में ढाला। पेशवा कालीन सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल के दस्तावेज आज भी इन पोवाडों में सुरक्षित मिलते हैं, जो इतिहास को समझने का एक जीवंत माध्यम माने जाते हैं।

श्रृंगार रस से भरी लावणी और वीर रस के पोवाडे में बुनियादी अंतर

यद्यपि लावणी और पोवाडा दोनों ही महाराष्ट्र की लोक परंपरा के अभिन्न अंग हैं, लेकिन दोनों की आत्मा और उद्देश्य एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं। लावणी जहां मुख्य रूप से सौंदर्य, प्रेम, श्रृंगार रस और नृत्यांगना की भाव-भंगिमाओं व पदचाप पर आधारित होती है, वहीं पोवाडे का समूचा अस्तित्व विशुद्ध वीर रस, ऐतिहासिक गंभीरता और कथावाचन पर टिका है। लावणी मन को आनंदित करती है, तो पोवाडा अंतरात्मा में शौर्य और गौरव की भावना भरता है।

Powada Folk Song: आधुनिक दौर में भी प्रासंगिक है पोवाडे की गूंज

बदलते डिजिटल युग में भी पोवाडा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का एक सशक्त स्तंभ बना हुआ है। शिव जयंती, महाराष्ट्र दिवस, किलों के संरक्षण अभियानों और विभिन्न राजकीय व सामाजिक समारोहों में आज भी शाहिरों की मंडलियां मंच पर उतरती हैं। नई पीढ़ी के कलाकार भी इस पारंपरिक कला को आधुनिक वाद्ययंत्रों और नए सामाजिक मुद्दों के साथ जोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं। पोवाडा इतिहास को किताबों की निर्जीव पंक्तियों से निकालकर मंच पर जीवंत कर देता है, और यही कारण है कि जब भी महाराष्ट्र के गौरव का जिक्र आता है, पोवाडे की थाप हर दिल को गर्व से भर देती है।

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