Fasting During Periods: पीरियड्स आ जाएं तो क्या टूट जाता है व्रत? मासिक धर्म में उपवास रखने वाली महिलाएं जरूर जान लें पूजा-पाठ के ये जरूरी नियम
Fasting During Periods: क्या पीरियड्स में टूट जाता है व्रत?
Fasting During Periods: हिंदू धर्म में सावन, नवरात्रि, एकादशी या अन्य त्योहारों पर व्रत रखने की एक लंबी परंपरा रही है, जिसमें महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। लेकिन अक्सर महिलाओं के मन में एक बड़ा सवाल और दुविधा खड़ी हो जाती है कि अगर व्रत के बीच में ही पीरियड्स (मासिक धर्म) आ जाएं, तो क्या उनका व्रत टूट जाता है? सोमवार, 25 मई 2026 को धर्म और ज्योतिष के जानकारों द्वारा साझा की गई रिपोर्ट के अनुसार, मासिक धर्म को महिला के शरीर की एक पूरी तरह से प्राकृतिक और सामान्य प्रक्रिया माना गया है। शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, पीरियड्स आने पर भी महिलाएं अपना व्रत जारी रख सकती हैं, क्योंकि आस्था का सीधा संबंध मन से होता है शरीर की बाहरी स्थिति से नहीं। हालांकि, इस दौरान प्रत्यक्ष पूजा-पाठ, मंदिर जाने और पूजन सामग्री को छूने को लेकर कुछ खास नियम बनाए गए हैं, जिनका पालन करना जरूरी माना जाता है।
Fasting During Periods: क्या कहते हैं धर्मशास्त्र? पीरियड्स में व्रत रखना सही है या गलत?
अक्सर कई घरों में पुरानी मान्यताओं के चलते पीरियड्स के दौरान महिलाओं को व्रत रखने से पूरी तरह मना कर दिया जाता है, जिससे उनके मन में हीन भावना या पाप का डर बैठ जाता है। लेकिन ज्योतिषविदों का कहना है कि शास्त्रों में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि इस अवस्था में उपवास रखना वर्जित है।
प्राचीन समय में इस दौरान महिलाओं को भारी काम से दूर रखने और पूरी तरह शारीरिक आराम देने के लिए नियम बनाए गए थे। अगर आपने पहले से ही कोई बड़ा व्रत (जैसे 9 दिनों के नवरात्रि या सावन के सोमवार) का संकल्प लिया हुआ है और बीच में पीरियड्स आ जाएं, तो आपको व्रत बीच में छोड़ने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। आपका व्रत पूरी तरह से मान्य और पूर्ण माना जाता है।
मानसिक पूजा का है सबसे बड़ा महत्व, ऐसे करें भगवान का स्मरण
सनातन धर्म और हमारे ग्रंथों में मन की भक्ति को सबसे उत्तम और बड़ा माना गया है। पीरियड्स के दौरान भले ही आप भगवान की मूर्ति के सामने न बैठ सकें, लेकिन आप मानसिक रूप से भगवान का ध्यान कर सकती हैं।
इस समय महिलाएं मन ही मन मंत्रों का जाप कर सकती हैं, ईश्वर का नाम ले सकती हैं और व्रत कथा पढ़ या सुन सकती हैं। आज के डिजिटल युग में मोबाइल और इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन आरती सुनना, भजन सुनना या कथा का श्रवण करना बेहद आसान हो गया है। धार्मिक जानकारों का स्पष्ट कहना है कि सच्चे और साफ मन से किया गया ईश्वर का ध्यान भी उतना ही उत्तम फल देता है, जितना कि सामान्य दिनों में की गई प्रत्यक्ष पूजा।
मूर्ति स्पर्श और पूजा सामग्री को लेकर परंपराएं क्या हैं?
पारंपरिक मान्यताओं और शुद्धता के नियमों के अनुसार, मासिक धर्म के समय महिलाओं को मंदिर के भीतर जाने, भगवान की मूर्तियों को स्पर्श करने, पूजा की थाली तैयार करने या धार्मिक ग्रंथों को छूने से बचने की सलाह दी जाती है।
अगर आपके घर में कोई विशेष पूजा, हवन या अनुष्ठान हो रहा है, तो आप खुद उसमें सीधे आहुति देने के बजाय थोड़ी दूरी पर बैठकर उस पवित्र माहौल का हिस्सा बन सकती हैं। आपकी जगह परिवार के अन्य सदस्य (जैसे पति, बच्चे या सास-ससुर) पूजा संपन्न कर सकते हैं। आप दूर से ही हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना कर सकती हैं, आपकी श्रद्धा को ईश्वर अवश्य स्वीकार करते हैं।
उपवास के दौरान सेहत का भी रखें खास ख्याल, न बरतें लापरवाही
धार्मिक नियमों के साथ-साथ पीरियड्स के दौरान महिलाओं को अपनी सेहत को लेकर बिल्कुल भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। इस समय शरीर को ज्यादा ऊर्जा और आराम की जरूरत होती है। लगातार भूखे रहने से शरीर में कमजोरी, थकान, पेट में ऐंठन या चक्कर आने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
इसलिए, यदि आप व्रत रख रही हैं, तो समय-समय पर पर्याप्त मात्रा में पानी, जूस, नारियल पानी और फलाहार (फल, मखाने या दूध) जरूर लेती रहें। शास्त्रों के अनुसार, व्रत का मतलब सिर्फ खुद को भूखा रखकर प्रताड़ित करना नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा और विचारों को शुद्ध रखना है।
Fasting During Periods: सिर्फ भूखे रहना ही नहीं, व्यवहार में संयम रखना भी है जरूरी
धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि एक सच्चे व्रत की पूर्णता तभी होती है जब व्यक्ति अपने विचारों, वाणी और व्यवहार पर पूरा नियंत्रण और संयम रखे। पीरियड्स के दौरान शारीरिक कष्ट की वजह से चिड़चिड़ापन होना स्वाभाविक है, लेकिन व्रत के दौरान किसी की बुराई करना, घर में कलह या झगड़ा करना, अपशब्द बोलना या किसी का दिल दुखाना व्रत के मूल नियमों के बिल्कुल खिलाफ माना जाता है। इस समय शांत चित्त रहकर, दूसरों की मदद करना और सकारात्मक ऊर्जा के साथ दिन बिताना ही वास्तविक उपवास है।
Fasting During Periods: बदल रहा है समाज का नजरिया, परंपरा और विज्ञान में संतुलन
आज के समय में पुरानी रूढ़िवादी सोच में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। नई पीढ़ी की महिलाएं और जागरूक परिवार अब मासिक धर्म को किसी अपवित्रता या अभिशाप के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे विज्ञान और मातृत्व से जुड़ी एक बेहद सामान्य और आवश्यक जैविक प्रक्रिया मानते हैं। यही वजह है कि अब समाज में अंधविश्वास के बजाय व्यावहारिक नजरिए को तरजीह दी जा रही है। आस्था और स्वास्थ्य दोनों के बीच एक सही संतुलन बनाकर ही महिलाएं अपने धर्म और अपनी सेहत दोनों का बखूबी ध्यान रख पा रही हैं।
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