Abraham Accord: अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होगा ईरान? डोनाल्ड ट्रंप के नए दावे से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मची खलबली

Abraham Accord: अब्राहम अकॉर्ड में आएगा ईरान!

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Abraham Accord: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) की दशकों पुरानी भू-राजनीति में क्या कोई बहुत बड़ा उलटफेर होने वाला है? क्या कट्टर दुश्मन माने जाने वाले इजरायल और ईरान के बीच कभी दोस्ती संभव है? ये सवाल एक बार फिर वैश्विक मंच पर तैरने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरान जल्द ही ऐतिहासिक ‘अब्राहम अकॉर्ड’ (Abraham Accords) का हिस्सा बन सकता है। सोमवार, 25 मई 2026 को सामने आई इस रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने सोशल मीडिया पर खाड़ी देशों का आभार जताते हुए इशारों-इशारों में यह हिंट दिया है। हालांकि, तेहरान की ओर से इस पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।

Abraham Accord: डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में क्या लिखा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर मिडिल ईस्ट में चल रही कूटनीतिक हलचलों को हवा दे दी है। उन्होंने ईरान के साथ जारी कूटनीतिक बातचीत में सहयोग देने के लिए अरब देशों और खाड़ी देशों की खुलकर तारीफ की है।

ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा, “मैं मिडिल ईस्ट के सभी देशों को उनके समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा। ऐतिहासिक अब्राहम समझौते में शामिल होने से यह वैश्विक सहयोग और भी मजबूत होगा। और कौन जानता है, शायद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान भी बहुत जल्द इसमें जुड़ जाए!” ट्रंप का यह बयान साफ दिखाता है कि परदे के पीछे किसी नई खिचड़ी पकने की संभावनाओं को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

साल 2025 में भी ट्रंप कर चुके हैं ऐसा ही दावा

यह कोई पहली बार नहीं है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान को इजरायल के करीब लाने की बात कही हो। इससे पहले साल 2025 में जब इजरायल और हमास के बीच संघर्ष-विराम (Ceasefire) समझौते की घोषणा की गई थी, तब भी ट्रंप ने पुरजोर तरीके से कहा था कि उन्हें पूरा भरोसा है कि एक दिन ईरान भी इस शांति समझौते का हिस्सा बनेगा।

हालांकि, उस वक्त ईरान ने ट्रंप के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने तब कड़े शब्दों में बयान जारी कर कहा था कि तेहरान कभी भी इजरायल को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता नहीं देगा और न ही फिलिस्तीनी हितों से कोई समझौता करेगा।

क्या है अब्राहम अकॉर्ड और इसका असल मकसद?

अब्राहम अकॉर्ड अमेरिकी मध्यस्थता और कूटनीति के तहत तैयार किया गया एक ऐतिहासिक समझौता है, जिसकी शुरुआत साल 2020 में ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान हुई थी। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य अरब देशों और इजरायल के बीच के दशकों पुराने विवाद और दुश्मनी को खत्म कर उनके व्यापारिक, आर्थिक और राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना है।

इस समझौते के तहत सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने इजरायल के साथ औपचारिक कूटनीतिक रिश्तों की शुरुआत की थी। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस ग्रुप में शामिल हो गए। दिलचस्प बात यह है कि इस समझौते को बनाने के पीछे अमेरिका का एक बड़ा मकसद खाड़ी देशों को एक साथ लाकर मिडिल ईस्ट में ईरान के बढ़ते परमाणु और सैन्य प्रभाव को काउंटर करना था। लेकिन अब ट्रंप खुद ईरान को ही इस समूह में शामिल करने की वकालत कर रहे हैं।

Abraham Accord: 1979 की क्रांति के बाद से कट्टर दुश्मन हैं ईरान और इजरायल

यदि इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1979 में हुई ईरान की इस्लामिक क्रांति से पहले दोनों देशों के बीच काफी सामान्य और अच्छे संबंध थे। लेकिन अयातुल्ला खमेनेई के सत्ता में आने के बाद ईरान की विदेश नीति पूरी तरह बदल गई और ‘इजरायल की तबाही’ उसका मुख्य एजेंडा बन गया।

ईरान ने इजरायल और अमेरिकी प्रभाव से लड़ने के लिए पूरे मिडिल ईस्ट में हमास, हिजबुल्लाह और यमन के हूती विद्रोहियों को मिलाकर एक ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (Axis of Resistance) यानी प्रतिरोध का मोर्चा खड़ा कर दिया। हालिया समय में इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान समर्थित गुटों पर किए गए सैन्य हमलों के बाद दोनों देशों के बीच कड़वाहट और ज्यादा बढ़ गई है।

Abraham Accord: क्या वाकई संभव है ईरान का इस समझौते में आना?

राजनीतिक विश्लेषकों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ईरान का अब्राहम अकॉर्ड से जुड़ना फिलहाल बेहद मुश्किल और काल्पनिक नजर आता है। ईरान की घरेलू राजनीति और धार्मिक नेतृत्व हमेशा से इजरायल विरोधी रुख पर कायम रहा है।

दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति हमेशा से अप्रत्याशित रही है। यदि अमेरिकी प्रतिबंधों से बेहाल हो चुका ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कूटनीतिक बातचीत की मेज पर आता है, तो यह मध्य पूर्व की पूरी व्यवस्था को बदल कर रख देगा। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ट्रंप के इस नए और बड़े दावे पर ईरान का आधिकारिक रुख क्या होता है।

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