PISA 2025 Assessment: छात्रों के गणित और रीडिंग स्कोर में बड़ी गिरावट, AI और स्क्रीन टाइम पर भी रिपोर्ट में फोकस
OECD रिपोर्ट में गणित और रीडिंग में गिरावट के साथ डिजिटल उपयोग और AI पर अहम निष्कर्ष
PISA 2025 Assessment: वैश्विक स्तर पर स्कूली शिक्षा, विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास और सीखने के परिणामों (लर्निंग आउटकम्स) का सबसे प्रामाणिक पैमाना मानी जाने वाली ‘पीसा’ (PISA – Programme for International Student Assessment) की 2025 की विस्तृत मूल्यांकन रिपोर्ट ने वैश्विक शैक्षणिक बिरादरी को झकझोर कर रख दिया है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) द्वारा जारी इस ताजा वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 91 देशों और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के 7.60 लाख से अधिक 15 वर्षीय विद्यार्थियों के अध्ययन से यह उजागर हुआ है कि कोविड-19 महामारी के बाद सामान्य स्थिति बहाल होने के बावजूद छात्रों के बुनियादी गणित और पठन (रीडिंग) कौशल में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई है।
यद्यपि विज्ञान को इस बार के चक्र में केंद्रीय विषय के रूप में शामिल किया गया था और इसका औसत स्कोर 2022 से 2025 के मध्य अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा, किंतु गणित और भाषा को समझने तथा उसका तार्किक विश्लेषण करने की मानवीय क्षमता में एक दशक की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि डिजिटल क्रांति और स्मार्ट क्लासरूम्स के दौर में भी विद्यार्थियों की एकाग्रता, वास्तविक समझ और आलोचनात्मक सोच की गहराई तेजी से सिमट रही है।
PISA 2025 Assessment: गणित में 22 और रीडिंग में 28 अंक गिरे
ओईसीडी के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015 से 2025 के बीच ओईसीडी सदस्य देशों के छात्रों के औसत गणित स्कोर में 22 अंकों की भारी कमी आई है, जिसे शैक्षणिक मापदंडों के आधार पर लगभग एक शैक्षणिक वर्ष से अधिक के ज्ञानार्जन के नुकसान के समतुल्य माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, पठन क्षमता यानी रीडिंग स्कोर में 28 अंकों का भारी पतन हुआ है, जो करीब डेढ़ वर्ष (1.5 इयर्स) के औपचारिक स्कूली अध्ययन के नुकसान के बराबर आंका गया है।
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक पहलू यह उभरकर आया है कि ओईसीडी देशों में अब लगभग हर पांच में से एक विद्यार्थी (लगभग 20 प्रतिशत) गणित, पठन और विज्ञान तीनों अनिवार्य अनुभागों में ‘लो-परफॉर्मर’ (न्यूनतम बुनियादी दक्षता से भी नीचे) के दायरे में आ गया है। वर्ष 2022 के मूल्यांकन में यह आंकड़ा 16 प्रतिशत दर्ज किया गया था। रीडिंग में आई यह गिरावट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि आधुनिक डिजिटल परिवेश में छात्र लंबे अनुच्छेदों को धैर्यपूर्वक पढ़कर उनका सारांश निकालने, विभिन्न स्रोतों से मिले तथ्यों की प्रामाणिकता की पड़ताल करने और फर्जी सूचनाओं से सत्य को अलग करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि बिना समझे केवल सतही तौर पर तेजी से गलत पढ़ने की प्रवृत्ति 2018 के 5 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 9 प्रतिशत हो चुकी है।
स्क्रीन टाइम का दोहरा प्रभाव: मनोरंजन के उपयोग से घटा शैक्षणिक स्तर
पीसा 2025 की रिपोर्ट ने डिजिटल उपकरणों के उपयोग और छात्रों की वास्तविक उपलब्धि के अंतर्संबंधों पर विस्तृत रोशनी डाली है। अध्ययन में पाया गया कि ओईसीडी देशों के किशोर स्कूल के दिनों में प्रतिदिन औसतन 6 घंटे और सप्ताहांत (शनिवार-रविवार) को लगभग 5 घंटे डिजिटल स्क्रीन्स (स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप) के सामने बिताते हैं। इसमें से प्रतिदिन औसतन 3.4 घंटे का समय विशुद्ध रूप से सोशल मीडिया रील्स, ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग जैसे मनोरंजक साधनों पर व्यय किया जा रहा है।
रिपोर्ट के तकनीकी निष्कर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि शिक्षा में तकनीक का सीमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग फायदेमंद सिद्ध हुआ है; जो छात्र कक्षाओं में निर्देशित शैक्षणिक कार्यों के लिए मध्यम स्तर पर डिजिटल उपकरणों का उपयोग करते हैं, उनका विज्ञान और गणित स्कोर शून्य उपयोग अथवा अत्यधिक उपयोग करने वालों की तुलना में बेहतर रहा। इसके विपरीत, स्कूल के समय के दौरान रोजाना एक घंटे से अधिक समय तक फोन या कंप्यूटर पर व्यक्तिगत मनोरंजन करने वाले छात्रों का शैक्षणिक प्रदर्शन सबसे निम्न स्तर पर पाया गया।
कक्षा में डिजिटल डिस्ट्रैक्शन: 28% छात्रों का ध्यान भटका रहे गैजेट्स
कक्षा के भीतर छात्रों के एकाग्रता स्तर पर आधुनिक गैजेट्स के प्रभाव को लेकर भी चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। ओईसीडी देशों में 28 प्रतिशत छात्रों ने स्वीकार किया कि विज्ञान और गणित की कक्षाओं के दौरान उनके सहपाठी मोबाइल फोन या अन्य उपकरणों के कारण पढ़ाई से विचलित रहते हैं। यह डिजिटल विकर्षण शिक्षक और छात्र के मध्य होने वाले बौद्धिक संवाद की प्रभावशीलता को गंभीर रूप से बाधित कर रहा है।
रिपोर्ट में उन विद्यालयों का तुलनात्मक अध्ययन भी शामिल किया गया है जिन्होंने परिसर में स्मार्टफोन के व्यक्तिगत उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है अथवा कड़े दिशा-निर्देश तय किए हैं। ऐसे स्कूलों में छात्रों द्वारा ध्यान भटकने की शिकायतें अपेक्षाकृत काफी कम पाई गईं। हालांकि, ओईसीडी का मानना है कि केवल फोन पर प्रतिबंध लगा देना ही बेहतर परीक्षा परिणाम की पूर्ण गारंटी नहीं है; जब तक शिक्षण पद्धति में संवाद, पुस्तक अध्ययन और व्यावहारिक प्रयोगों को पुनः केंद्र में नहीं लाया जाएगा, तब तक सुधार की गति सीमित ही रहेगी।
शिक्षा में एआई की तीव्र पैठ: 46% छात्र ले रहे चैटबॉट्स का सहारा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का शैक्षणिक जीवन में विस्तार इस रिपोर्ट का एक अन्य प्रमुख मील का पत्थर है। ओईसीडी देशों में 46 प्रतिशत 15 वर्षीय छात्रों ने खुलासा किया कि वे अपने गृहकार्य (होमवर्क), जटिल अवधारणाओं को समझने और प्रश्नों के उत्तर तलाशने के लिए सप्ताह में कम से कम एक बार एआई चैटबॉट्स का नियमित इस्तेमाल करते हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि एआई का विवेकहीन उपयोग छात्रों की मौलिक विचार प्रक्रिया को कुंद कर रहा है। जब छात्र स्वयं उत्तर तैयार करने, गणितीय चरणों की गणना करने अथवा निबंधों की संरचना रचने के बजाय सीधे एआई द्वारा जनरेट किए गए उत्तरों को बिना सत्यापन के कॉपी करने लगते हैं, तो उनकी सीखने की स्वाभाविक संज्ञानात्मक क्षमता (कॉग्निटिव एबिलिटी) अवरुद्ध हो जाती है। यही कारण है कि एआई की सुलभता बढ़ने के बावजूद वैश्विक स्तर पर आलोचनात्मक और तार्किक समझ के स्कोर में निरंतर गिरावट दर्ज हो रही है।
होमवर्क के समय में 11% की कटौती: बदलती जीवनशैली का प्रभाव
रिपोर्ट में छात्रों के अध्ययन और स्वाध्याय (सेल्फ-स्टडी) के घंटों में आई गिरावट को भी दर्ज किया गया है। वर्ष 2025 में ओईसीडी देशों के छात्र प्रतिदिन औसतन केवल 1.4 घंटे गृहकार्य कर रहे थे, जो कि वर्ष 2022 के स्तर से लगभग 11 प्रतिशत कम है। यद्यपि अत्यधिक होमवर्क को शैक्षणिक सफलता का अनिवार्य पैमाना नहीं माना जा सकता, किंतु प्रतिदिन एक से दो घंटे का स्व-अध्ययन विषयों पर दीर्घकालिक पकड़ बनाने के लिए अनिवार्य पाया गया है।
कोविड-19 महामारी के दौरान महीनों तक घरों में कैद रहने, ऑनलाइन कक्षाओं के कारण विकसित हुई एकाकी प्रवृत्ति और खेल के मैदानों से दूरी ने छात्रों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। महामारी के दौरान उपजे ‘लर्निंग लॉस’ की भरपाई अभी तक पूरी तरह नहीं हो सकी है, जिसके ऊपर से अत्यधिक स्क्रीन टाइम ने इस संकट को और अधिक जटिल बना दिया है।
PISA 2025 Assessment: डिजिटल संतुलन और मौलिक पठन संस्कृति की पुनर्बहाली अनिवार्य
पीसा 2025 असेसमेंट के ये नतीजे दुनिया भर की सरकारों, नीति-निर्माताओं, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी हैं। यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक कोई जादुई समाधान नहीं है; यदि इसका समुचित नियमन और संतुलित उपयोग न किया जाए, तो यह सीखने की प्राकृतिक क्षमता के लिए अभिशाप बन सकती है।
भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए विद्यालयों को डिजिटल साक्षरता के साथ-साथ पुस्तकों के गहन पठन, कक्षा संवाद, हस्तलेखन और स्वतंत्र विचार विमर्श को अनिवार्य रूप से प्रोत्साहित करना होगा। तकनीक को शिक्षा का पूरक माध्यम बनाया जाना चाहिए, न कि मानवीय सोच और शिक्षक-छात्र संबंध का विकल्प। जब तक स्क्रीन टाइम पर प्रभावी पारिवारिक व संस्थागत नियंत्रण स्थापित नहीं होगा, तब तक शैक्षणिक गुणवत्ता को पुनः शीर्ष पर ले जाना संभव नहीं होगा।
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