Bharat ABIS Aadhaar: फर्जी पहचान और घिसे फिंगरप्रिंट्स की समस्या होगी खत्म, जानें कैसे काम करता है यह ओपन-सोर्स सिस्टम
Bharat ABIS Aadhaar: फर्जी पहचान और घिसे फिंगरप्रिंट्स की समस्या होगी खत्म, जानें कैसे काम करता है यह ओपन-सोर्स सिस्टम
Bharat ABIS Aadhaar: देश में पहचान वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और सटीक बनाने की दिशा में एक बड़ा तकनीकी कदम उठाया गया है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी यूआईडीएआई से जुड़े शोधकर्ताओं ने भारत ABIS नाम का एक अत्याधुनिक बायोमेट्रिक सिस्टम विकसित किया है, जो डुप्लीकेट पहचान की समस्या को खत्म करने के मकसद से तैयार किया गया है। सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में बायोमेट्रिक डेटाबेस को संभालना अपने आप में एक बड़ी चुनौती रही है, और मौजूदा सिस्टम भी इतने विशाल पैमाने पर काम करते हुए अपनी सीमाओं तक पहुंचने लगते हैं। इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए भारत ABIS को एक ओपन-सोर्स मल्टी-मोडल बायोमेट्रिक सिस्टम के रूप में तैयार किया गया है, जो फिंगरप्रिंट, आईरिस और चेहरे की पहचान को एक साथ जोड़कर काम करता है। इस पूरे शोध कार्य में यूआईडीएआई के छह वैज्ञानिकों के अलावा आईआईआईटी हैदराबाद और मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी अहम योगदान दिया है, जिससे इस सिस्टम की वैज्ञानिक विश्वसनीयता और मजबूत हो जाती है।
Bharat ABIS Aadhaar: क्या है भारत ABIS और इसका उद्देश्य
भारत ABIS का पूरा नाम ऑटोमेटेड बायोमैट्रिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम है। यह एक ओपन-सोर्स मल्टी-मोडल बायोमेट्रिक सिस्टम है, जिसे विशेष रूप से बड़े पैमाने पर पहचान की डुप्लीकेशन जांचने के लिए तैयार किया गया है। यह सिस्टम किसी व्यक्ति के फिंगरप्रिंट, आईरिस और चेहरे से जुड़ी जानकारी को प्रोसेस करके एक संयुक्त बायोमेट्रिक टेम्पलेट तैयार करता है, जिसका आकार प्रति व्यक्ति करीब साढ़े तेरह किलोबाइट है। इसके बाद इस टेम्पलेट का मिलान डेटाबेस में मौजूद अन्य रिकॉर्ड्स से किया जाता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसी व्यक्ति की पहचान पहले से डेटाबेस में मौजूद तो नहीं है।
तीन बायोमेट्रिक को साथ जोड़ने की वजह
भारत ABIS की सबसे खास बात यह है कि यह केवल एक ही प्रकार के बायोमेट्रिक डेटा पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि फिंगरप्रिंट, आईरिस और फेस तीनों को मिलाकर पहचान की प्रक्रिया पूरी करता है। जरूरत पड़ने पर यह सिस्टम किसी एक बायोमेट्रिक का इस्तेमाल भी कर सकता है, लेकिन तीनों को एक साथ जोड़ने से डुप्लीकेट पहचानने की क्षमता कहीं अधिक बेहतर हो जाती है। शोध में यह भी सामने आया कि बड़े डेटाबेस में सभी लोगों के फिंगरप्रिंट हमेशा एक जैसी गुणवत्ता के नहीं होते, खासकर उम्रदराज या मैनुअल श्रम करने वाले लोगों के फिंगरप्रिंट अक्सर घिसे हुए पाए जाते हैं, ऐसे में अन्य बायोमेट्रिक संकेतों का इस्तेमाल पहचान को सटीक बनाने में मदद करता है।
22 करोड़ रिकॉर्ड्स पर की गई व्यापक टेस्टिंग
इस अत्याधुनिक सिस्टम की क्षमता जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने इसका परीक्षण 22 करोड़ पहचान वाले एक विशाल गैलरी डेटासेट पर किया। यह डेटा भारत के करीब 1.55 अरब आधार रिकॉर्ड्स में से रैंडम तरीके से लिया गया था, जिसमें अलग-अलग जनसांख्यिकीय समूहों को भी शामिल किया गया। सिस्टम को प्रशिक्षित करने के लिए इससे काफी छोटे डेटासेट का उपयोग किया गया, जिसमें फिंगरप्रिंट, फेस और आईरिस मॉडल के ट्रेनिंग सेट करीब एक लाख यूनिक पहचान के स्तर के थे। परीक्षण से पहले इस्तेमाल किए गए सभी डेटा को डी-आइडेंटिफाई भी किया गया था, ताकि गोपनीयता बनी रहे।
सटीकता मापने के लिए इस्तेमाल हुए दो अहम मापदंड
किसी भी बायोमेट्रिक सिस्टम की सटीकता को परखने के लिए दो अहम मापदंडों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें एफपीआईआर और एफएनआईआर कहा जाता है। एफपीआईआर यानी फाल्स पॉजिटिव आइडेंटिफिकेशन रेट उस स्थिति को दर्शाता है जब सिस्टम गलती से किसी व्यक्ति को किसी दूसरे रिकॉर्ड के साथ मैच कर देता है या डुप्लीकेट के तौर पर फ्लैग कर देता है। वहीं एफएनआईआर यानी फाल्स नेगेटिव आइडेंटिफिकेशन रेट यह बताता है कि सिस्टम किसी वास्तविक डुप्लीकेट पहचान को पकड़ने में कितनी बार चूक सकता है। इन दोनों मापदंडों के आधार पर भारत ABIS ने उत्साहजनक नतीजे दिखाए हैं।
सर्च स्पीड में भी दिखा दमखम
भारत ABIS की खासियत केवल सटीकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी सर्च स्पीड भी काफी प्रभावशाली पाई गई है। अध्ययन के अनुसार आठ एनवीडिया एच100 जीपीयू और दो टेराबाइट रैम वाले एक सर्वर पर यह सिस्टम चार करोड़ रिकॉर्ड की गैलरी में प्रति सेकंड 100 सर्च करने में सक्षम है। शोध के मुताबिक चालीस मिलियन रिकॉर्ड वाली गैलरी में एक हजार प्रोब्स को सर्च करने में करीब दस सेकंड का समय लगता है। इतने बड़े डेटाबेस को संभालने के लिए सिस्टम में एक विशेष शेड्यूलर भी जोड़ा गया है, जो अलग-अलग सर्वर्स के बीच सर्च वर्क को व्यवस्थित रूप से बांटने का काम करता है।
बुजुर्गों और श्रमिकों के लिए साबित होगा फायदेमंद
भारत ABIS के साथ इस्तेमाल किए गए डीपप्रिंट फिंगरप्रिंट मॉडल को भी इस शोध का अहम हिस्सा माना जा रहा है। अध्ययन के अनुसार इसे मौजूदा वेंडर टूल्स के साथ मिलाने पर फिंगरप्रिंट ऑथेंटिकेशन फेल्योर की संख्या लगभग आधी हो सकती है। इसका सबसे ज्यादा फायदा उन लोगों को मिलेगा, जिनके फिंगरप्रिंट की गुणवत्ता समय के साथ कम हो चुकी है, खासकर बुजुर्ग और मैनुअल श्रम करने वाले लोग इसके प्रमुख लाभार्थी माने जा रहे हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार इससे रोजाना होने वाले लाखों ऑथेंटिकेशन ट्रांजैक्शन में अतिरिक्त सफल मैच हासिल करने में मदद मिल सकती है।
दुनिया के अन्य देशों के लिए भी हो सकता है उपयोगी
ओपन-सोर्स होने की वजह से भारत ABIS केवल भारत तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि यह उन देशों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है जो महंगे कमर्शियल ABIS सिस्टम खरीदने में सक्षम नहीं हैं। अध्ययन में बीस मिलियन से कम आबादी वाले 160 से अधिक देशों और स्वतंत्र क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है, जहां यह तकनीक कारगर साबित हो सकती है। हालांकि यह केवल शोधकर्ताओं का आकलन है, न कि इन देशों में सिस्टम के वास्तविक इस्तेमाल का कोई दावा।
अभी पूरे डेटाबेस पर नहीं हुआ पूर्ण परीक्षण
भारत ABIS के नतीजे बड़े पैमाने पर किए गए परीक्षणों में भले ही उत्साहजनक रहे हों, लेकिन इसे अभी सीधे तौर पर पूरे आधार डेटाबेस पर लागू करने के लिए तैयार सिस्टम मान लेना जल्दबाजी होगी। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि 1.55 अरब के पूरे डेटाबेस तक इस सिस्टम को स्केल करने का कार्य अभी जारी है, और इसके लिए मॉडल डिजाइन, ट्रेनिंग तथा इंजीनियरिंग के स्तर पर आगे भी सुधार की जरूरत होगी।
भविष्य की दिशा और संभावनाएं
भारत ABIS ने अरबों रिकॉर्ड वाले बायोमेट्रिक सिस्टम के क्षेत्र में ओपन-सोर्स तकनीक की क्षमता को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है। आने वाले समय में इसे और अधिक परिष्कृत करने के बाद यह न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पहचान वेरिफिकेशन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तकनीकी समाधान साबित हो सकता है। शोध टीम की आगे की योजना इसे पूरी तरह आधार जैसे विशाल डेटाबेस पर लागू करने की दिशा में काम करने की है।
कुल मिलाकर भारत ABIS भारतीय शोधकर्ताओं की एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि के रूप में सामने आया है, जो डुप्लीकेट पहचान की समस्या को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है। फिंगरप्रिंट, आईरिस और फेस तीनों बायोमेट्रिक को जोड़कर काम करने वाला यह ओपन-सोर्स सिस्टम सटीकता और स्पीड दोनों मामलों में उत्साहजनक नतीजे दिखा चुका है। हालांकि इसे पूरी तरह आधार जैसे विशाल डेटाबेस पर लागू करने से पहले अभी और परीक्षण की जरूरत है। आने वाले समय में यह तकनीक न केवल भारत बल्कि अन्य विकासशील देशों के लिए भी पहचान प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
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