Parikshitgarh Fort: महाभारत काल का रहस्यमयी स्थल जहां राजा परीक्षित को मिला तक्षक नाग का श्राप
मेरठ का ऐतिहासिक किला, तक्षक नाग के श्राप और जनमेजय के सर्प यज्ञ से जुड़ी हैं मान्यताएं
Parikshitgarh Fort: उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की परीक्षितगढ़ तहसील में स्थित ऐतिहासिक परीक्षितगढ़ किला भारत की समृद्ध सनातन संस्कृति, महाभारत कालीन किंवदंतियों और धार्मिक आस्था का एक अभूतपूर्व और जीवंत केंद्र माना जाता है। हस्तिनापुर के प्रागैतिहासिक साम्राज्य के बेहद करीब स्थित यह प्राचीन किला पांडव वंश के महान योद्धा अर्जुन के पौत्र और वीर अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित के शासनकाल की कई विस्मयकारी और रहस्यमयी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्ष्य है। पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक विनिर्देशों के अनुसार, राजा परीक्षित के इसी कालखंड से पृथ्वी पर कलियुग के आगमन की शुरुआत मानी जाती है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग इस ऐतिहासिक धरोहर के जीर्णोद्धार और इसे राज्य के प्रमुख ‘महाभारत पर्यटन सर्किट’ (Mahabharata Tourism Circuit) के एक अनिवार्य हिस्से के रूप में विकसित करने की दिशा में अत्यंत सक्रिय प्रयास कर रहा है।
राजा परीक्षित का अपमान, श्रृंगी ऋषि का भयंकर श्राप और तक्षक नाग का विधिक कालचक्र
पौराणिक विनिर्देशों के अनुसार, राजा परीक्षित एक बार शिकार के दौरान गहरे जंगलों में भटक गए थे, जहाँ तीव्र प्यास से व्याकुल होकर वे श्री शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। ऋषि को मौन तपस्या में लीन देखकर राजा ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधवश पास में पड़े एक मृत काले सर्प को उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। ऋषि शमीक के परम प्रतापी पुत्र श्रृंगी ऋषि ने जब अपने पिता का यह घोर अपमान देखा, तो उन्होंने अत्यंत क्रोधित होकर राजा परीक्षित को श्राप दे दिया कि ठीक सातवें दिन नागराज तक्षक के डसने से उनकी अकाल मृत्यु हो जाएगी। राजा परीक्षित ने इस भयानक श्राप से बचने के लिए अपने महल की सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य सैनिक छावनी में बदल दिया था, परंतु कालचक्र की विधिक अनिवार्यता के कारण तक्षक नाग ने एक सूक्ष्म कीड़े का रूप धारण कर फल के माध्यम से महल में प्रवेश किया और राजा को डसकर श्राप पूरा किया।
राजा जनमेजय का महाविनाशकारी सर्प यज्ञ, नाग जाति का संकट और भगवान विष्णु की मध्यस्थता
अपने पिता की इस निर्मम मृत्यु से अत्यंत दुखी और आक्रोशित होकर राजा परीक्षित के प्रतापी पुत्र जनमेजय ने संपूर्ण नाग जाति का समूल नाश करने के उद्देश्य से परीक्षितगढ़ की पावन धरती पर एक अभूतपूर्व और महाविनाशकारी ‘सर्प यज्ञ’ का अनुष्ठान प्रारंभ कर दिया। इस महायज्ञ के मंत्रों की दिव्य शक्ति के प्रभाव से ब्रह्मांड के समस्त नाग और सर्प खिंचे चले आए और यज्ञ की धधकती पवित्र अग्नि में भस्म होने लगे। नागराज वासुकि के करुण कराह और नाग जाति पर मंडराते इस अस्तित्वगत संकट को देखते हुए अंततः भगवान विष्णु और आस्तिक मुनि की मध्यस्थता व दिव्य हस्तक्षेप के बाद राजा जनमेजय को यह महायज्ञ बीच में ही रोकने के लिए विवश होना पड़ा, जिसकी गवाह आज भी यहाँ की पौराणिक मिट्टियाँ देती हैं।
श्री श्रृंगी ऋषि आश्रम की आध्यात्मिक महत्ता, हस्तिनापुर सर्किट और पर्यटन विकास की संभावनाएं
इतिहास और प्राचीन पुरातात्विक वास्तुकला के विशेषज्ञों के अनुसार, परीक्षितगढ़ किले के भग्नावशेषों के समीप स्थित श्री श्रृंगी ऋषि आश्रम और वह प्राचीन यज्ञ कुंड आज भी देश भर के शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं के लिए एक परम पूजनीय स्थल बना हुआ है। हस्तिनापुर का ऐतिहासिक क्षेत्र महाभारत की मुख्य राजधानी होने के कारण वैश्विक मानचित्र पर पहले से ही विख्यात है, इसलिए परीक्षितगढ़ को हस्तिनापुर के साथ भौगोलिक रूप से जोड़कर एक एकीकृत इंटरनेशनल टूरिज्म कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है।
निष्कर्ष: परीक्षितगढ़ किला (Parikshitgarh Fort) भारतीय इतिहास के उस संधिकाल का प्रतीक है जो द्वापर युग के अंत और कलियुग के प्रारंभ को एक सूत्र में पिरोता है। यदि आप भी इस मानसून सीजन में मेरठ के इन प्राचीन किलों के भ्रमण, श्रृंगी ऋषि आश्रम के आरती समय, उत्तर प्रदेश पर्यटन विकास निगम (UPTDC) के अधिकृत टूरिस्ट गाइड्स की सूची और स्थानीय परिवहन रूटों की प्रमाणित डिजिटल जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के आधिकारिक वेब पोर्टल अथवा मेरठ जिला प्रशासन के प्रमाणित डिजिटल सूचना पटल पर जाकर लाइव अपडेट्स अवश्य चेक कर लें।
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