Nirjala Ekadashi 2026: भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं, जानें पौराणिक कथा, महत्व और पूजा विधि
18 जून को मनाई जाएगी भीमसेनी एकादशी, जानें व्रत और पूजा के नियम
Nirjala Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है। हर महीने में दो एकादशी आती हैं, लेकिन ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस बार निर्जला एकादशी 18 जून 2026 को मनाई जाएगी। इसे भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी पर जल के बिना पूरे दिन उपवास रखा जाता है, जो अन्य एकादशियों से कहीं अधिक कठिन माना जाता है।
निर्जला एकादशी को सबसे पवित्र और फलदायी एकादशियों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से समस्त पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन ग्रहों की स्थिति भी विशेष रूप से अनुकूल रहती है, जिससे भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है। लाखों श्रद्धालु इस व्रत को रखकर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करते हैं।
निर्जला एकादशी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि 18 जून 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना और व्रत के लिए निम्नलिखित मुहूर्त निर्धारित किए गए हैं:
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एकादशी तिथि प्रारंभ: 18 जून 2026 को सुबह 3:47 बजे से
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एकादशी तिथि समाप्त: 19 जून 2026 को सुबह 1:12 बजे तक
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ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:05 बजे से 4:45 बजे तक (साधना और अर्घ्य के लिए उत्तम)
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अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:55 बजे से 12:45 बजे तक
सूर्योदय के समय भगवान विष्णु को अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना जाता है। व्रत का पारण अगले दिन यानी 19 जून 2026 को सूर्योदय के बाद विधिपूर्वक जल ग्रहण करके किया जाएगा।
भीमसेनी एकादशी की पौराणिक कथा
निर्जला एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। पांडवों में भीमसेन सबसे अधिक भोजन प्रिय थे और उनके पेट में ‘वृक’ नामक अग्नि होने के कारण वे अपनी भूख सहन नहीं कर पाते थे। यही वजह थी कि वे बाकी भाइयों और माता कुंती की तरह वर्ष की सभी एकादशियों पर उपवास नहीं रख पाते थे। इस बात से दुखी होकर भीम महर्षि वेदव्यास जी के पास गए और अपनी समस्या बताई।
व्यास जी ने भीम को सांत्वना देते हुए एक परम कल्याणकारी उपाय बताया। उन्होंने कहा कि यदि तुम वर्ष की सभी एकादशियों पर व्रत नहीं रख सकते, तो मात्र ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की इस एक एकादशी का व्रत पूर्ण निष्ठा से कर लो। इसमें सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक अन्न और जल का पूरी तरह त्याग करना होता है। व्यास जी के कथनानुसार भीम ने अत्यंत कठिन होते हुए भी इस व्रत को पूर्ण किया और इसके प्रभाव से उन्हें सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त हुआ। तभी से इस पावन तिथि को भीमसेनी एकादशी के नाम से जाना जाने लगा।
पूजा विधि और आवश्यक सामग्री
निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए पूजा विधि सरल लेकिन नियमों में बंधी होती है:
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प्रातः काल की शुरुआत: सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हों और पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
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संकल्प और स्थापना: घर के मंदिर की सफाई करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
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पूजन अनुष्ठान: भगवान को पीले चंदन का तिलक लगाएं। पूजा में तुलसी दल (तुलसी के पत्ते), कमल या पीले पुष्प, धूप, दीप, अक्षत और मौसमी फल अर्पित करें।
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मंत्र और पाठ: पूजा के दौरान निरंतर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” महामंत्र का जाप करें। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम या भागवत कथा का पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
शाम के समय भगवान के समक्ष दीपक जलाकर आरती करें और रात्रि में जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें। इस व्रत में फलाहार की भी मनाही होती है, इसलिए पूर्णतः निराहार और निर्जल रहकर ही साधना की जाती है।
Nirjala Ekadashi 2026: व्रत के नियम, सावधानियां और दान का महत्व
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नियम: व्रत के दौरान मन को शांत रखें। किसी के प्रति क्रोध, झूठ, निंदा या तामसिक विचारों को मन में न आने दें।
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स्वास्थ्य सावधानी: चूंकि यह व्रत भीषण गर्मी के महीने (जून) में आता है, इसलिए अत्यधिक बीमार व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को अपनी शारीरिक क्षमता और डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए।
ज्येष्ठ मास की इस एकादशी पर दान का अनंत गुना फल मिलता है। इस दिन प्यासे लोगों को पानी पिलाना, राहगीरों के लिए शरबत की व्यवस्था करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है। इसके अलावा जरूरतमंदों को जल से भरा तांबे या मिट्टी का कलश, अनाज, कपड़े, छाता, जूता और पंखा दान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
निष्कर्ष
18 जून 2026 को आने वाली निर्जला एकादशी केवल एक धार्मिक उपवास नहीं है, बल्कि यह मानसिक दृढ़ता, इंद्रिय संयम और आत्म-शुद्धि का महापर्व है। भीमसेनी एकादशी के रूप में विख्यात यह व्रत श्रद्धापूर्वक रखने से जीवन के सभी कष्टों और अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की असीम अनुकंपा आप सभी पर बनी रहे, इसी कामना के साथ निर्जला एकादशी की आप सभी को मंगलमय शुभकामनाएं।
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