Mylapore Fund Scam: ₹700 करोड़ का संकट, 6 हजार से ज्यादा निवेशक परेशान
चेन्नई में 6 हजार से ज्यादा जमाकर्ताओं का पैसा फंसा, बुजुर्गों ने तेज रिकवरी की मांग की
Mylapore Fund Scam: तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में लगभग डेढ़ सदी पुरानी प्रतिष्ठित वित्तीय संस्था ‘मायलापुर हिंदू परमानेंट फंड निधि’ से जुड़ा कथित वित्तीय संकट और अनियमितताओं का मामला एक बार फिर गरमा गया है। संस्था में अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई, भविष्य निधि और सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी जमा करने वाले हजारों निवेशक अपने मूलधन और ब्याज की वापसी के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं। प्रभावित जमाकर्ताओं का दावा है कि इस बहुचर्चित प्रकरण में लगभग 700 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय विसंगति के कारण छह हजार से अधिक परिवारों की आर्थिक रीढ़ टूट गई है।
पीड़ितों में सबसे बड़ा अनुपात सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिकों और पेंशनभोगियों का है, जिनके दैनिक जीवनयापन, रसोई के खर्च और आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं का एकमात्र सहारा इस संस्था से मिलने वाला मासिक ब्याज ही था। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रभावित निवेशकों ने चेन्नई की सड़कों पर उतरकर व्यापक विरोध प्रदर्शन किया है और राज्य सरकार से तत्काल उच्चस्तरीय हस्तक्षेप की गुहार लगाई है।
Mylapore Fund Scam: 150 वर्ष पुरानी साख और आकर्षक ब्याज का आकर्षण
मायलापुर हिंदू परमानेंट फंड निधि की स्थापना ब्रिटिश काल में वर्ष 1872 के आसपास हुई थी और इसे चेन्नई के सबसे पुराने और विश्वसनीय वित्तीय संस्थानों में गिना जाता था। इसी ऐतिहासिक प्रतिष्ठा, सामाजिक साख और पारंपरिक विश्वास के चलते शहर के मध्यवर्गीय और उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों ने अपनी पीढ़ियों की बचत इस संस्थान के हवाले कर दी थी। न्यायिक दस्तावेजों और जमाकर्ताओं की शिकायतों के अनुसार, संस्था द्वारा संचालित पेंशनर फिक्स्ड डिपॉजिट, क्यूम्युलेटिव डिपॉजिट और रेकरिंग डिपॉजिट जैसी विभिन्न बचत योजनाओं पर 8 से 12 प्रतिशत तक का सुनिश्चित वार्षिक ब्याज देने का वादा किया जाता था।
राष्ट्रीयकृत बैंकों की तुलना में थोड़ा अधिक ब्याज मिलने के आकर्षण में कई परिवारों ने अपने जीवन की अंतिम पूंजी यहां लगा दी। मद्रास उच्च न्यायालय के आधिकारिक रिकॉर्ड्स में दर्ज एक मामले के अनुसार, एक ही परिवार के सदस्यों ने अपनी सामाजिक सुरक्षा के लिए 30 से अधिक अलग-अलग सावधि जमा (FD) योजनाओं में 46 लाख रुपये से अधिक की रकम जमा कर रखी थी। परिपक्वता अवधि (मैच्योरिटी) बीत जाने के बाद भी जब मूलधन और देय ब्याज का भुगतान नहीं हुआ, तब इस विशाल वित्तीय संकट की परतें एक-एक कर उधड़नी शुरू हुईं।
फरवरी 2024 से ठप हुआ भुगतान: चेक बाउंस और पेंशनभोगियों का गहराता संकट
जमाकर्ताओं के अनुसार, संस्थान में तरलता और भुगतान का गंभीर संकट फरवरी 2024 के आसपास खुलकर सामने आया। परिपक्व हो चुकी सावधि जमाओं का नवीनीकरण कराने अथवा उनकी मूल राशि वापस मांगने वाले खाताधारकों को लगातार टालमटोल का सामना करना पड़ा। निवेशकों को दिए गए कई बैंक चेक अपर्याप्त निधि के कारण बाउंस हो गए और खातों में नियमित आने वाला ब्याज भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया गया।
आय का नियमित स्रोत अचानक बंद हो जाने से विशेष रूप से ‘सुपर सीनियर सिटीजन’ वर्ग के बुजुर्गों के सामने गंभीर मानवीय और स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो गया है। कई बुजुर्ग निवेशकों ने बताया कि वे हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और डायलिसिस जैसी गंभीर बीमारियों के नियमित उपचार और महंगी दवाओं के लिए इसी ब्याज राशि पर निर्भर थे। परिवार की दस से पंद्रह लाख रुपये की फंसी जमा पूंजी के चलते कई बुजुर्गों को अपने दैनिक भरण-पोषण और घर के बुनियादी खर्चों के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाने की नौबत आ गई है।
तमिलनाडु ईओडब्ल्यू की कार्रवाई: एमडी देवनाथन यादव की गिरफ्तारी और कानूनी शिकंजा
जमाकर्ताओं की लगातार बढ़ती शिकायतों और राज्यव्यापी आक्रोश के उपरांत मामले की औपचारिक जांच तमिलनाडु पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को सौंप दी गई। ईओडब्ल्यू ने प्रारंभिक जांच के आधार पर भारतीय दंड संहिता (और तत्पश्चात भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों), अनियमित जमा योजना प्रतिबंध अधिनियम (BUDS Act, 2019) तथा तमिलनाडु जमाकर्ता हित संरक्षण अधिनियम (TNPID Act) के तहत कठोर कानूनी धाराओं में आपराधिक मामले दर्ज किए।
जांच के क्रम में आर्थिक अपराध शाखा ने संस्था के प्रबंध निदेशक और प्रमुख संचालक टी. देवनाथन यादव को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। आरोपी लंबे समय तक जेल में बंद रहे हैं और उनके द्वारा स्वास्थ्य आधार पर उच्च न्यायालय से अंतरिम राहत प्राप्त करने के प्रयास भी किए जाते रहे हैं। जांच एजेंसी इस बात की गहराई से छानबीन कर रही है कि जनता से जुटाई गई करोड़ों रुपये की सार्वजनिक निधि का उपयोग क्या वास्तविक बैंकिंग नियमों के तहत हुआ या फिर उसे निजी कंपनियों, अचल संपत्तियों और अन्य संदेहास्पद व्यावसायिक उपक्रमों में अवैध रूप से डायवर्ट किया गया।
अदालत में 100 करोड़ रुपये की पूर्व-जमा शर्त और अटकी कानूनी प्रक्रिया
मद्रास उच्च न्यायालय में विचाराधीन जमानत और संपत्ति मुक्ति संबंधी कार्यवाहियों के दौरान अदालत ने जमाकर्ताओं के हितों को आंशिक संरक्षण देने के उद्देश्य से मुख्य आरोपी को अंतरिम राहत हेतु 100 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि अदालत में जमा कराने का निर्देश दिया था। हालांकि, जमाकर्ता संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह अनिवार्य शर्त पूरी नहीं की जा सकी, जिससे निवेशकों को तत्काल कोई आर्थिक राहत नहीं मिल पाई।
आरोपी पक्ष की ओर से अदालती कार्यवाहियों में यह दलील दी जाती रही है कि संस्थान के पास पर्याप्त अचल संपत्तियां और परिसंपत्तियां उपलब्ध हैं, जिन्हें बाजार में बेचकर जमाकर्ताओं के संपूर्ण बकाये का भुगतान किया जा सकता है। इसके विपरीत, जमाकर्ताओं का तर्क है कि संपत्तियों के मूल्यांकन, अदालती कुर्की और नीलामी की कानूनी प्रक्रिया इतनी जटिल और दीर्घकालिक है कि यदि इसमें तेजी नहीं लाई गई, तो बुजुर्ग निवेशकों को अपने जीवनकाल में अपनी ही पूंजी का दर्शन नहीं हो सकेगा।
फास्ट ट्रैक कोर्ट और फोरेंसिक ऑडिट: जमाकर्ताओं की मुख्य मांगें
चेन्नई में आयोजित विरोध प्रदर्शनों में एकत्रित जमाकर्ताओं ने राज्य सरकार और न्यायपालिका के समक्ष चार प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली और सबसे प्रमुख मांग इस बहु-करोड़ीय वित्तीय घोटाले की दैनिक सुनवाई के लिए एक विशेष त्वरित अदालत (Fast Track Court) की स्थापना करना है, ताकि वर्षों तक चलने वाली सामान्य मुकदमों की देरी से बचा जा सके।
इसके अतिरिक्त, जमाकर्ता संघ ने मांग की है कि किसी स्वतंत्र और प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय एजेंसी से मायलापुर हिंदू परमानेंट फंड निधि के पिछले दस वर्षों के खातों का गहन ‘फोरेंसिक ऑडिट’ कराया जाए, जिससे फंड की हेराफेरी का सटीक मार्ग उजागर हो सके। तीसरी मांग के अंतर्गत टीएनपीआईडी अधिनियम के तहत आरोपी प्रबंधन की सभी निजी और व्यावसायिक चल-अचल संपत्तियों को तत्काल राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहीत (अटैच) कर पारदर्शी सार्वजनिक नीलामी के जरिए प्राप्त धनराशि को जमाकर्ताओं में आनुपातिक रूप से वितरित करने की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया गया है।
40 से अधिक जमाकर्ताओं की असमय मृत्यु का दावा: आर्थिक अपराध का मानवीय पहलू
जमाकर्ता कल्याण संघ के पदाधिकारियों ने एक अत्यंत चिंताजनक और हृदयविदारक दावा करते हुए कहा है कि भुगतान संकट शुरू होने के बाद से अब तक लगभग 40 से अधिक बुजुर्ग जमाकर्ता मानसिक तनाव, उचित इलाज के अभाव और आर्थिक तंगी के चलते इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। यद्यपि इन मौतों का वित्तीय घोटाले से सीधा चिकित्सीय संबंध किसी सरकारी जांच में औपचारिक रूप से प्रमाणित नहीं है, किंतु यह आंकड़ा उस गहरे अवसाद, अनिश्चितता और असहायता की स्थिति को स्पष्ट रूप से उजागर करता है जिससे यह बुजुर्ग पीढ़ी वर्तमान में जूझ रही है।
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि ‘निधि कंपनियों’ के नियमन और निगरानी में केंद्रीय कंपनी मामलों के मंत्रालय (MCA) तथा राज्य स्तरीय प्राधिकरणों के बीच समन्वय की कमी भी ऐसे संकटों को जन्म देती है। गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की वित्तीय तरलता और ऋण वितरण की नियमित जांच न होना अंततः निर्दोष आम नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा को लील जाता है।
Mylapore Fund Scam: निष्कर्ष
मायलापुर हिंदू परमानेंट फंड निधि का कथित 700 करोड़ रुपये का संकट केवल एक वित्तीय धोखाधड़ी का आंकड़ा नहीं, बल्कि जीवनभर ईमानदारी से काम करके बुढ़ापे की लाठी तैयार करने वाले छह हजार से अधिक नागरिकों के विश्वास का हनन है। जब तक राज्य की आर्थिक अपराध शाखा अपनी अंतिम चार्जशीट दाखिल कर संपत्तियों की नीलामी की समयबद्ध प्रक्रिया पूरी नहीं करती और विशेष त्वरित अदालत का गठन नहीं होता, तब तक इन बुजुर्गों की आर्थिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होना कठिन है। सरकार और न्यायपालिका को इस मामले को एक साधारण दीवानी या फौजदारी विवाद के बजाय एक गंभीर मानवीय संकट के रूप में देखते हुए त्वरित समाधान सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि अपनी ही जमा पूंजी के लिए तरस रहे इन वरिष्ठ नागरिकों को समय रहते वास्तविक न्याय मिल सके।
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