Maa Behan Movie Review: माधुरी दीक्षित की फिल्म ने किया दर्शकों का दिमाग का दही, ओवरएक्टिंग की दुकान- रेटिंग 1 स्टार
माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी की फिल्म कहानी व निर्देशन में पिछड़ी
Maa Behan Movie Review: वैश्विक ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स (Netflix) पर रिलीज हुई माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी और रवि किशन जैसे दिग्गज व लोकप्रिय सितारों की अभिनय से सजी फिल्म ‘मां बहन’ ने देश भर के सिनेमा प्रेमियों और समीक्षकों को बेहद निराश किया है। भारी-भरकम विज्ञापनों और सोशल मीडिया प्रमोशन के जरिए पिछले कई हफ्तों से इस फिल्म को लेकर एक जबरदस्त हाइप और उत्सुकता का माहौल तैयार किया गया था। लेकिन जब दर्शकों ने वास्तविक फिल्म देखी, तो उनके हाथ केवल और केवल मायूसी लगी।
ज्यादातर समीक्षकों और दर्शकों ने एक सुर में इस फिल्म को ‘ओवरएक्टिंग की दुकान’ और ‘दिमाग का दही’ कर देने वाला एक दिशाहीन प्रोजेक्ट करार दिया है। कमाल की बात यह है कि इस फिल्म का निर्देशन सुरेश त्रिवेणी ने किया है, जिन्होंने पूर्व में ‘तुम्हारी सुलू’, ‘जलसा’ और ‘सूबेदार’ जैसी समीक्षकों द्वारा सराही गई और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित फिल्मों का निर्देशन किया था। लेकिन इस बार वे अपने ही बुने हुए भ्रामक ताने-बाने में पूरी तरह से फेल नजर आए। फिल्म की बेहद लचर पटकथा और लाउड अभिनय को देखते हुए इसे 1 स्टार रेटिंग दी गई है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस बहुप्रतीक्षित फिल्म के फ्लॉप होने की असली कड़ियां क्या हैं, इसकी कहानी में कहां चूक हुई और कलाकारों का प्रदर्शन कैसा रहा।
फिल्म की कहानी का ताना-बाना: सस्पेंस के नाम पर बुनी गई एक भटकी हुई पटकथा
कहानी के मोर्चे पर ‘मां बहन’ मुख्य रूप से एक उम्रदराज, बिगड़ैल और लगातार विवादों में घिरी रहने वाली महिला (माधुरी दीक्षित) और उनकी दो बेटियों (जिनमें से एक की भूमिका तृप्ति डिमरी ने निभाई है) के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म की शुरुआत में ही दर्शकों को चौंकाने के लिए एक बेहद सनसनीखेज और मेलोड्रामैटिक ट्विस्ट दिया जाता है। मुख्य किरदार अपनी बेटियों को अचानक फोन करके रोते-बिलखते हुए बताती हैं कि उनके साथ कुछ बेहद अनहोनी और खौफनाक घटना घट गई है, जिसके कारण उन्हें अपना सब काम छोड़कर तुरंत वापस आना पड़ेगा।
जब बेटियां भागती हुई घर पहुंचती हैं, तो उन्हें पता चलता है कि इलाके के एक रसूखदार व्यक्ति (रवि किशन) की रहस्यमयी परिस्थितियों में हत्या (कत्ल) हो चुकी है। इसके बाद फिल्म में एक के बाद एक कई सस्पेंस कड़ियां और ट्विस्ट्स डालने की कोशिश की जाती है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले के कारण ये तमाम ट्विस्ट्स कहानी को संभालने के बजाय उसे और ज्यादा उबाऊ और उलझा हुआ बना देते हैं। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी कहानी को आधुनिक और थ्रिलर बनाने के चक्कर में इसके मूल मानवीय भाव और लॉजिक को पूरी तरह से खो बैठे हैं। फिल्म के शुरुआती 20 से 25 मिनट में जो हल्की सी दिलचस्पी और रहस्य जगता है, वह इंटरवल तक आते-आते पूरी तरह से गायब हो जाता है, जिससे दर्शक खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं कि कहानी आखिर किस दिशा में जा रही है।
अभिनय का स्तर: लाउड परफॉर्मेंस और ओवरएक्टिंग का बाजार
इस फिल्म (Maa Behan Movie Review) की सबसे बड़ी और आत्मघाती कमजोरी इसका अभिनय विभाग साबित हुआ है। ‘धक-धक गर्ल’ और भारतीय सिनेमा की सबसे शालीन व दिग्गज अभिनेत्रियों में शुमार माधुरी दीक्षित से इस स्तर के लाउड और ओवर-द-टॉप अभिनय की उम्मीद किसी भी दर्शक या समीक्षक को दूर-दूर तक नहीं थी। फिल्म के कई महत्वपूर्ण और संजीदा दृश्यों में उनका रोना, चिल्लाना और संवाद अदायगी (डायलोग डिलीवरी) इतनी ज्यादा लाउड और बनावटी लगती है कि स्क्रीन पर उन्हें देखकर दर्शक असहज हो जाते हैं।
बॉलीवुड की नई सेंसेशन और प्रतिभावान अभिनेत्री तृप्ति डिमरी ने कुछ गिने-चुने दृश्यों में अपनी स्वाभाविक अभिनय क्षमता दिखाने का प्रयास जरूर किया है, लेकिन ऐसा लगता है कि खराब निर्देशन के दबाव में आकर वे भी कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा चीखती-चिल्लाती और ओवरएक्टिंग करती हुई नजर आईं, जो उनके अब तक के करियर ग्राफ के बिल्कुल विपरीत है। भोजपुरी और हिंदी सिनेमा के मंझे हुए कलाकार रवि किशन का रोल इस फिल्म में काफी छोटा और सीमित रखा गया है, लेकिन उन्होंने अपने हिस्से के दृश्यों में अपनी चिरपरिचित और कड़क स्टाइल में ठीक-ठाक काम किया है। कुल मिलाकर, पूरी स्टारकास्ट को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे निर्देशक ने सेट पर सभी कलाकारों को खुली छूट दे दी हो कि जो जितना ज्यादा जोर से चिल्लाकर अभिनय करेगा, दृश्य उतना ही बेहतर बनेगा; और इसी का नतीजा यह हुआ कि पूरी फिल्म देखते समय दर्शक बार-बार अपना सिर पीटने पर मजबूर हो जाते हैं।
सुरेश त्रिवेणी का कमजोर निर्देशन और लचर तकनीकी पक्ष
निर्देशक सुरेश त्रिवेणी, जिनकी पिछली फिल्मों में एक गजब की संवेदनशीलता, ठहराव, कसी हुई एडिटिंग और किरदारों के बीच एक बेहतरीन संतुलन साफ दिखाई देता था, वे इस फिल्म में पूरी तरह से दिशाहीन और रीढ़विहीन नजर आए। ऐसा लगता है कि ओटीटी के बदलते स्वरूप और कमर्शियल हाइप के चक्कर में उन्होंने अपनी मूल निर्देशकीय शैली के साथ एक बहुत बड़ा और गलत समझौता कर लिया। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी पूरी तरह से औसत दर्जे की है, जिसमें किसी भी प्रकार का नयापन या रचनात्मक कैमरा एंगल्स देखने को नहीं मिलते।
फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक (BGM) भी इसकी एक बहुत बड़ी कमजोरी बनकर सामने आया है। कई साधारण और शांत दृश्यों के पीछे भी जरूरत से ज्यादा जोरदार, हैवी और डरावना म्यूजिक बजाया गया है, जो स्क्रीन पर चल रही कहानी के साथ रत्ती भर भी मेल नहीं खाता और दर्शकों के सिर में दर्द करने का काम करता है। फिल्म की एडिटिंग इतनी ज्यादा लचर और बिखरी हुई है कि सीन्स के बीच का प्राकृतिक फ्लो (लय) बार-बार टूट जाता है, जिससे पूरी फिल्म टुकड़ों में बंटी हुई प्रतीत होती है। नेटफ्लिक्स जैसे वैश्विक मंच पर जहां आज का वैश्विक और भारतीय दर्शक बेहद उच्च गुणवत्ता वाले, तार्किक और रियलिस्टिक कंटेंट की उम्मीद करता है, वहां ‘मां बहन’ का यह स्तर औसत से भी काफी नीचे और निराशाजनक साबित हुआ है।
Maa Behan Movie Review ओटीटी पर बदलता कंटेंट का रुख और बड़े स्टार्स के गिरते साम्राज्य का सबक
फिल्म के रिलीज होते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर इसके खिलाफ मीम्स और नकारात्मक रिव्यूज की एक बाढ़ सी आ गई है। कई इंटरनेट यूजर्स ने कमेंट सेक्शन में इस फिल्म को “समय की बर्बादी” और “माधुरी दीक्षित के करियर का सबसे कमजोर फैसला” बताया है, हालांकि कुछ गिने-चुने फैंस तृप्ति डिमरी के लुक्स की तारीफ जरूर कर रहे हैं।
‘मां बहन’ की यह करारी असफलता भारतीय फिल्म उद्योग और ओटीटी की दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा और कड़ा सबक है। यह घटना एक बार फिर चीख-चीख कर यह साबित करती है कि आज के आधुनिक डिजिटल दौर में केवल बड़े कलाकारों के नाम, भारी-भरकम पीआर (PR) स्टंट्स और आकर्षक ट्रेलर्स के दम पर किसी भी कचरा कंटेंट को दर्शकों के गले नहीं उतारा जा सकता। आज का दर्शक वर्ग हॉलीवुड और वैश्विक सिनेमा को देख रहा है, इसलिए उसकी समझ और कंटेंट को परखने की क्षमता पहले से कई गुना अधिक मैच्योर हो चुकी है। अब दर्शक केवल वही फिल्में देखना पसंद करते हैं जिनकी स्क्रिप्ट पूरी तरह से बैलेंस्ड हो, जिसमें नेचुरल (स्वाभाविक) एक्टिंग हो और जो समाज या इंसानी जज्बातों को सही तरीके से बयां करती हो।
निष्कर्ष: अंतिम फैसला और दर्शकों के लिए सीधी सलाह
समग्र रूप से देखा जाए तो नेटफ्लिक्स की यह नई फिल्म ‘मां बहन’ दर्शकों की उम्मीदों और कसौटियों पर पूरी तरह से खरी उतरने में नाकाम रही है। माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी जैसी दो अलग-अलग पीढ़ियों की बेहतरीन अभिनेत्रियों के एक साथ स्क्रीन शेयर करने के इस सुनहरे मौके को कमजोर राइटिंग और लाउड डायरेक्शन ने पूरी तरह से बर्बाद कर दिया।
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