Iran US peace talks: अमेरिका के साथ शांति वार्ता पर ईरानी राष्ट्रपति को अपने ही देश में झेलना पड़ रहा विरोध, खुद बताया क्यों करनी पड़ रही है बातचीत
ईरान राष्ट्रपति मसूद पेजशकियन अमेरिका वार्ता, घरेलू विरोध, आर्थिक संकट और प्रतिबंधों की मजबूरी
Iran US peace talks: मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) की राजनीति से इस समय एक बहुत ही बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आ रही है। ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेजशकियन ने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति यानी अमेरिका के साथ सीधे तौर पर शांति वार्ता (बातचीत) शुरू करने का एक बेहद साहसिक फैसला लिया है। लेकिन इस फैसले के बाद उन्हें अपने ही देश के भीतर बहुत ही भारी और उग्र विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ईरान के कड़े नियमों को मानने वाले कट्टरपंथी गुटों और कुछ मुख्य राजनीतिक दलों ने राष्ट्रपति के इस कदम को देश के आत्मसम्मान और संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए सड़कों पर उतरना शुरू कर दिया है। इस चौतरफा बढ़ते विरोध के बीच खुद राष्ट्रपति मसूद पेजशकियन ने देश के सामने आकर बहुत ही बेबाकी से स्थिति साफ़ की है कि ईरान में चल रहे भयंकर आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण अमेरिका से बातचीत करना इस समय देश के हित में बेहद ज़रूरी हो गया है।
ईरान और अमेरिका के आपसी संबंध पिछले कई दशकों से बहुत ज़्यादा तनावपूर्ण और दुश्मनी से भरे रहे हैं। ऐसे बिगड़े हालातों के बीच दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत शुरू होने का यह नया प्रयास पूरी दुनिया की राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। आइए इस न्यूज़ रिपोर्ट में बिल्कुल आसान और सीधी हिंदी भाषा में समझते हैं कि ईरान के भीतर इस बातचीत का इतना कड़ा विरोध क्यों हो रहा है और राष्ट्रपति ने इस फैसले के पीछे क्या मजबूरियां गिनाई हैं।
ईरान के कट्टरपंथियों की भारी नाराजगी और अमेरिका पर भरोसा न करने की पुरानी दलील
ईरान के भीतर सक्रिय कई ताकतवर और कट्टरपंथी धार्मिक गुट राष्ट्रपति मसूद पेजशकियन के इस शांति वाले फैसले से बुरी तरह भड़क गए हैं। इन गुटों का साफ़ कहना है कि अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत की मेज पर बैठना ईरान के घुटने टेकने जैसा है। देश के कई हिस्सों में इन फैसलों के खिलाफ बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं, जहाँ राष्ट्रपति और उनकी नई सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की जा रही है।
विपक्षी नेताओं और कट्टरपंथियों की दलील है कि अमेरिका एक ऐसा देश है जिस पर कभी भी आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता है। उनका कहना है कि साल 2015 में हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से जिस तरह अमेरिका बाद में अचानक पीछे हट गया था, वह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि अमेरिका समझौतों को अपनी सहूलियत के हिसाब से तोड़ देता है। ऐसे में दोबारा बातचीत शुरू करना ईरान को एक बड़े कूटनीतिक जाल में फंसाने जैसा होगा।
भयंकर आर्थिक मंदी और अंतरराष्ट्रीय कड़े प्रतिबंधों ने ईरान को बातचीत के लिए किया मजबूर
इस पूरे विरोध के बीच राष्ट्रपति मसूद पेजशकियन ने देश के नागरिकों को संबोधित करते हुए अपनी मजबूरियों और देश की भलाई की बात को बहुत ही साफ़ शब्दों में सामने रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों (सेंक्शन्स) के कारण देश की अर्थव्यवस्था इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है। ईरान में महंगाई (मुद्रास्फीति) सातवें आसमान पर पहुँच चुकी है, बाज़ार में ज़रूरी चीज़ों की भारी किल्लत है और देश के लाखों पढ़े-लिखे युवा बेरोजगारी के कारण परेशान हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि वे अपने देश को किसी भी कीमत पर एक और विनाशकारी युद्ध की आग में नहीं झोंकना चाहते हैं। उनका मानना है कि युद्ध से सिर्फ बर्बादी आती है, जबकि शांतिपूर्ण बातचीत के ज़रिए ईरान पर लगे इन कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाया जा सकता है। अगर ये प्रतिबंध हट जाते हैं, तो ईरान दोबारा दुनिया के बाज़ारों में अपना तेल बेच सकेगा, जिससे देश में विदेशी पैसा आएगा और आम जनता को इस कमरतोड़ महंगाई और आर्थिक संकट से बहुत बड़ी राहत मिल सकेगी।
मध्य पूर्व के देशों की पैनी नज़र और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर इस वार्ता का सीधा असर
ईरान और अमेरिका के बीच शुरू होने जा रही इस शांति वार्ता पर केवल इन दोनों देशों की नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) के देशों की पैनी नज़रें टिकी हुई हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और विशेष रूप से इजराइल इस पूरी हलचल को बहुत ही गंभीरता से देख रहे हैं। अगर ईरान और अमेरिका के बीच के रिश्ते सुधरते हैं, तो इस पूरे इलाके में लंबे समय से चला आ रहा हथियारों का तनाव और युद्ध का ख़तरा काफी हद तक कम हो जाएगा, जिससे क्षेत्र में एक नई स्थिरता आएगी।
इसके अलावा, वैश्विक तेल और ऊर्जा बाज़ार पर भी इस बातचीत का बहुत बड़ा असर पड़ना तय है। ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक है। यदि बातचीत सफल होती है और ईरान के तेल निर्यात पर लगी पाबंदियां हटती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की सप्लाई बहुत तेज़ी से बढ़ जाएगी। तेल की सप्लाई बढ़ने से कच्चे तेल के दाम कम होंगे, जिसका सीधा फायदा भारत जैसे उन सभी देशों को मिलेगा जो अपनी ज़रूरतों के लिए विदेशों से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं।
निष्कर्ष: राष्ट्रीय हित और शांति का नया कूटनीतिक मार्ग, ईरान के भविष्य की बड़ी परीक्षा
इस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजशकियन अपने ही देश में हो रहे भारी घरेलू विरोध के बावजूद अमेरिका के साथ शांति वार्ता के अपने फैसले पर पूरी तरह से अडिग दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने यह साफ़ कर दिया है कि उनके लिए खोखले नारों से ज़्यादा अपनी देश की भूखी जनता का पेट भरना, युवाओं को रोजगार देना और देश की संप्रभुता की रक्षा करना सबसे पहली प्राथमिकता है। कूटनीति की दुनिया में बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना ही एक समझदार और दूरदर्शी नेता की असली पहचान होती है।
एक जागरूक पाठक और वैश्विक नागरिक के रूप में हमें यह समझना होगा कि इस बातचीत की राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि दोनों देशों के बीच दशकों पुराना अविश्वास और कड़वाहट भरी हुई है। आने वाले दिनों में अगर दोनों पक्ष अपनी पुरानी ज़िद छोड़कर लचीला रुख अपनाते हैं, तभी इस ऐतिहासिक शांति वार्ता का कोई ठोस और सकारात्मक परिणाम सामने आ सकेगा। पूरी दुनिया इस समय इस बड़े बदलाव का इंतज़ार कर रही है, क्योंकि इसी बातचीत की सफलता पर न केवल ईरान का भविष्य, बल्कि पूरे विश्व की शांति और सुरक्षा टिकी हुई है।
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