Schools in India: भारत में 1 लाख से अधिक स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे, आंध्र प्रदेश 16,357 स्कूलों के साथ देश में सबसे आगे
Schools in India: देश में 1 लाख से अधिक स्कूल एक शिक्षक के भरोसे, आंध्र प्रदेश शीर्ष पर
Schools in India: भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चौंकाने वाली और गंभीर तस्वीर सामने आई है, जो देश में शिक्षकों की तैनाती में मौजूद भारी असंतुलन को उजागर करती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में एक लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक ही शिक्षक के भरोसे अपनी शिक्षण प्रक्रिया चला रहे हैं। इस सूची में आंध्र प्रदेश सोलह हजार से ज्यादा ऐसे स्कूलों के साथ पहले स्थान पर बना हुआ है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात मानकों के दायरे में होने का दावा किया जाता है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए इन आंकड़ों ने एक बार फिर से बुनियादी स्तर पर स्कूलों की आधारभूत संरचना और मानव संसाधन की कमी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
Schools in India, UDISE+ के आंकड़े और देश के विभिन्न राज्यों की जमीनी स्थिति
नवीनतम UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार भारतभर में विभिन्न प्रबंधन तंत्र के कुल एक लाख आठ सौ तैंतालीस स्कूल ऐसे चिह्नित किए गए हैं जिनमें पढ़ाने के लिए केवल एक ही शिक्षक उपलब्ध है। इस राष्ट्रीय सूची में आंध्र प्रदेश सोलह हजार तीन सौ सत्तावन सिंगल-टीचर स्कूलों के साथ सबसे ऊपर है, जो कुल ऐसे स्कूलों का सोलह प्रतिशत से अधिक हिस्सा बनता है। इसके तुरंत बाद झारखंड में नौ हजार आठ सौ सत्ताईस और महाराष्ट्र में नौ हजार दो सौ انہत्तर ऐसे स्कूल संचालित हो रहे हैं। कर्नाटक में आठ हजार बयालीस, उत्तर प्रदेश में सात हजार आठ सौ चौहत्तर, राजस्थान में सात हजार दो सौ और पश्चिम बंगाल में छह हजार सात सौ انہत्तर सिंगल-टीचर स्कूल दर्ज किए गए हैं। देश के इन सात प्रमुख राज्यों में ही अकेले कुल सिंगल-टीचर स्कूलों का लगभग पैंसठ प्रतिशत हिस्सा सिमटा हुआ है, जो प्रशासनिक सुस्ती को दर्शाता है।
क्षेत्रीय विस्तार और विभिन्न राज्यों में शिक्षकों की उपलब्धता का दायरा
यह गंभीर समस्या केवल किसी एक विशेष क्षेत्र या आर्थिक रूप से पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के लगभग हर हिस्से में अपने पैर पसार चुकी है। तेलंगाना में चार हजार सात सौ तिरानवे, तमिलनाडु में तीन हजार नौ सौ सत्तावन और असम में तीन हजार एक सौ उन्सठ स्कूल केवल एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में तीन हजार एक सौ अट्ठावीस, उत्तराखंड में दो हजार छह सौ पचपन और छत्तीसगढ़ में दो हजार चार सौ इकसठ स्कूल इसी श्रेणी में आते हैं। दूसरी तरफ कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहाँ यह स्थिति काफी बेहतर है, जैसे केरल में सतसठ, नागालैंड में पैंतीस, सिक्किम में इकतीस, लद्दाख में अट्ठाइस, दिल्ली में मात्र सात और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में केवल एक ही सिंगल-टीचर स्कूल की जानकारी सामने आई है।
Schools in India: शिक्षा मंत्रालय का पक्ष और खाली पदों को लेकर दी गई दलीलें
राज्यसभा में शिक्षकों के रिक्त पदों के संबंध में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने ये तमाम आंकड़े सदन के पटल पर रखे। हालांकि मूल प्रश्न में विशेष रूप से सरकारी स्कूलों के आंकड़े मांगे गए थे, लेकिन साझा की गई सूची में सभी प्रकार के प्रबंधन वाले स्कूल शामिल किए गए हैं। मंत्रालय की ओर से स्पष्ट किया गया कि शिक्षकों की सीधी भर्ती, उनकी सेवा की शर्तें तय करना और उनकी तैनाती से जुड़े सभी प्रशासनिक कार्य संबंधित राज्य सरकारों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। पदों के खाली होने के मुख्य कारणों में शिक्षकों का सेवानिवृत्त होना, इस्तीफा देना, नए पदों का सृजन, स्टाफ का युक्तिकरण और छात्र नामांकन में उतार-चढ़ाव शामिल हैं।
Schools in India: राष्ट्रीय औसत और स्थानीय स्तर पर शिक्षकों की तैनाती का विरोधाभास
सरकार भले ही राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात के मानकों को पूरा करने का दावा कर रही हो, लेकिन सिंगल-टीचर स्कूलों का यह बड़ा आंकड़ा जमीनी स्तर की वास्तविकताओं को बयां करता है। मंत्रालय के अनुसार प्राइमरी स्तर पर उन्नीस, अपर प्राइमरी पर सत्रह, सेकेंडरी स्तर पर पंद्रह और हायर सेकेंडरी स्तर पर तेईस का अनुपात राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तय मानदंडों के भीतर आता है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर शिक्षकों की उपलब्धता में भारी असंतुलन देखा जा रहा है। केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को लगातार यह सलाह दी जाती रही है कि वे पूरी तरह पारदर्शी और मेरिट-आधारित भर्ती प्रक्रियाओं के माध्यम से इन रिक्तियों को भरें तथा शिक्षकों की सही मांग का अनुमान लगाने के लिए आधुनिक तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करें।
देश की स्कूली शिक्षा प्रणाली में एक लाख से अधिक स्कूलों का केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित होना एक गंभीर चुनौती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात संतुलित नजर आता है, लेकिन भौगोलिक और स्थानीय स्तर पर व्याप्त यह असमानता ग्रामीण बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ जैसी स्थिति पैदा कर रही है।
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