India Green Steel Mission: सरकारी खरीद नीति से प्रदूषण में भारी कटौती, लागत बढ़ेगी महज 1%, CII रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
सरकारी खरीद नीति से लागत बढ़ेगी महज 1%, CII रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
India Green Steel Mission: वर्तमान में भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा स्टील (इस्पात) उत्पादक देश है, लेकिन इस गौरवमयी उपलब्धि के साथ ही देश का इस्पात उद्योग भारी प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के मामले में भी एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। अब एक नई और ऐतिहासिक रिपोर्ट ने देश में ‘ग्रीन स्टील’ (पर्यावरण अनुकूल इस्पात) के उत्पादन को बढ़ावा देने और इसे मुख्यधारा में लाने का एक बेहद सरल, व्यावहारिक लेकिन क्रांतिकारी रास्ता सुझाया है। कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) और ग्लोबल थिंक-टैंक ‘क्लाइमेट कैटालिस्ट’ की संयुक्त शोध रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत सरकार अपनी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं में महज 26 प्रतिशत ग्रीन स्टील के अनिवार्य इस्तेमाल की नीति लागू कर दे, तो इससे देश के कुल कार्बन उत्सर्जन में एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कमी लाई जा सकती है।
यह विशेष रिपोर्ट विश्व पर्यावरण दिवस के शुभ अवसर पर जारी की गई है, जिसमें यह साफ तौर पर रेखांकित किया गया है कि सरकार की सार्वजनिक खरीद नीति (Public Procurement Policy) ग्रीन स्टील को भारतीय बाजारों में स्थापित करने का सबसे तेज, प्रभावी और सुरक्षित माध्यम साबित हो सकती है। इस विस्तृत अध्ययन का सबसे बड़ा और सकारात्मक पहलू यह है कि इस नीति को अपनाने से सरकारी परियोजनाओं की कुल लागत में महज 1 प्रतिशत की ही मामूली बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी, जबकि इसके बदले पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को मिलने वाला दीर्घकालिक फायदा अरबों डॉलर का होगा। आइए विस्तार से जानते हैं इस संयुक्त रिपोर्ट की पूरी हकीकत, इसके आंकड़े और भारत के औद्योगिक भविष्य पर पड़ने वाले इसके दूरगामी प्रभावों का पूरा विश्लेषण।
आखिर क्या है ग्रीन स्टील और भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व
पारंपरिक रूप से स्टील के उत्पादन में मुख्य रूप से ब्लास्ट फर्नेस तकनीक के तहत ‘कोकिंग कोल’ (कोयले) का भारी मात्रा में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जो जलने के बाद वायुमंडल में खतरनाक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) गैस उत्सर्जित करता है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर एक टन पारंपरिक स्टील के उत्पादन पर औसतन 2.54 टन CO2 का उत्सर्जन होता है, जो कि वैश्विक स्तर पर तय किए गए औसत मानकों से काफी ज्यादा है।
इसके विपरीत, ‘ग्रीन स्टील’ के निर्माण की प्रक्रिया में पारंपरिक कोयले या जीवाश्म ईंधन की जगह पूरी तरह से ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ (सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से तैयार की गई हाइड्रोजन) का उपयोग किया जाता है। हाइड्रोजन के इस्तेमाल से उत्पादन के दौरान चिमनियों से धुएं के बजाय केवल पानी की भाप बाहर निकलती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य के करीब पहुंच जाता है। सीआईआई की रिपोर्ट बताती है कि देश के कुल औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन में अकेले स्टील क्षेत्र की हिस्सेदारी 10 से 12 प्रतिशत के बीच है। ऐसे में यदि इस भारी क्षेत्र को ग्रीन टेक्नोलॉजी के माध्यम से पूरी तरह डीकार्बोनाइज (प्रदूषण मुक्त) कर दिया गया, तो भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तय किए गए अपने ‘नेट जीरो’ (Net Zero) जलवायु लक्ष्यों को समय से बहुत पहले हासिल करने में एक ऐतिहासिक सफलता प्राप्त कर लेगा।
सरकारी खरीद का गणित: ग्रीन स्टील के लिए एक विशाल और सुरक्षित बाजार
भारत सरकार देश के विकास के लिए हर साल विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से लगभग 45 से 50 लाख करोड़ रुपये की विशाल धनराशि बुनियादी ढांचागत (इंफ्रास्ट्रक्चर) परियोजनाओं पर खर्च करती है। इनमें देशव्यापी नेशनल हाईवेज, एक्सप्रेसवेज, मेट्रो रेल नेटवर्क, विशाल पुलों, रेलवे लाइनों और सरकारी इमारतों का निर्माण शामिल है, जहां अत्यधिक मात्रा में स्टील की खपत होती है।
CII-क्लाइमेट कैटालिस्ट की इस रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, केवल वित्त वर्ष 2024 के भीतर ही विभिन्न सरकारी परियोजनाओं ने देश में उत्पादित कुल 3.16 करोड़ टन स्टील की भारी खपत की थी, जिसके निर्माण के कारण वायुमंडल में पूरे 7 करोड़ टन CO2 का भारी उत्सर्जन हुआ। वर्तमान विकास दर को देखते हुए साल 2030 तक सरकारी क्षेत्रों में स्टील की यह सालाना मांग बढ़कर 7.3 करोड़ टन तक पहुंच जाने का अनुमान है। रिपोर्ट में नीतिगत स्तर पर यह बड़ा सुझाव दिया गया है कि यदि केंद्र और राज्य सरकारें 1 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाले अपने सभी सरकारी प्रोजेक्ट्स में न्यूनतम 26 प्रतिशत ग्रीन स्टील की खरीद को कानूनी रूप से अनिवार्य कर दें, तो इससे साल 2030 तक देश के भीतर ही 1.6 करोड़ टन ग्रीन स्टील की एक स्थाई, सुरक्षित और पक्की मांग पैदा हो जाएगी।
यदि इस सरकारी कोटे को आगे बढ़ाकर 37 प्रतिशत तक कर दिया जाए, तो यह घरेलू मांग बढ़कर 2.4 करोड़ टन (24 MTPA) के विशाल स्तर को छू लेगी। इतनी बड़ी मात्रा में ग्रीन स्टील का उपयोग होने से सालाना 2.97 करोड़ टन CO2 गैस की सीधी बचत होगी, जो पर्यावरण की दृष्टि से देश की सड़कों से एक साथ 90 लाख पेट्रोल-डीजल कारों को हमेशा के लिए हटाने के बराबर है।
लागत में नाममात्र की बढ़ोतरी: प्रोजेक्ट बजट पर नहीं पड़ेगा कोई अतिरिक्त बोझ
इस संयुक्त रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प, व्यावहारिक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि औद्योगिक स्तर पर ग्रीन स्टील को अपनाने से किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की कुल बजटीय लागत पर कोई खास या नकारात्मक असर नहीं पड़ने वाला है। रिपोर्ट में दिए गए व्यावहारिक उदाहरण के अनुसार, यदि सरकार 100 करोड़ रुपये की कुल लागत से किसी शहर में मेट्रो रेल परियोजना का निर्माण कर रही है और उसमें 26% ग्रीन स्टील का अनिवार्य उपयोग किया जाता है, तो इस ग्रीन प्रीमियम के कारण प्रोजेक्ट की कुल लागत में महज 1 से 1.2 करोड़ रुपये (केवल 1%) की ही मामूली बढ़ोतरी होगी, जिसे आसानी से प्रबंधित किया जा सकता है।
ठीक इसी प्रकार, आम उपभोक्ताओं के इस्तेमाल में आने वाली घरेलू चीजों जैसे वॉशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर या कारों के निर्माण में भी यदि ग्रीन स्टील का इस्तेमाल शुरू किया जाए, तो उनकी खुदरा बाजार कीमतों में मात्र 300 रुपये या उससे भी कम की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी। रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि शुरुआती निवेश के चरण में इस छोटे से ग्रीन प्रीमियम के अतिरिक्त बोझ को सरकार सब्सिडी, जीएसटी (GST) में विशेष छूट या कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग के माध्यम से खुद वहन कर सकती है। जैसे-जैसे देश में ग्रीन स्टील का उत्पादन बड़े पैमाने (स्केल) पर शुरू होगा, इसकी उत्पादन लागत स्वतः ही पारंपरिक स्टील के बराबर आ जाएगी।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जाए तो सीआईआई (CII) और क्लाइमेट कैटालिस्ट की यह संयुक्त रिपोर्ट भारत सरकार को एक ऐसा शक्तिशाली और व्यावहारिक विजन प्रदान करती है, जिसके माध्यम से देश आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा किए बिना अपने पर्यावरण को पूरी तरह से सुरक्षित रख सकता है। सरकारी खरीद नीति में महज 26 प्रतिशत का यह छोटा सा ग्रीन कोटा देश के पूरे स्टील उद्योग की सूरत बदलने और निजी निवेशकों को ग्रीन टेक्नोलॉजी में अरबों डॉलर का निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने का एक सबसे अचूक साधन साबित हो सकता है।
अब यह पूरी तरह से केंद्र सरकार और नीति निर्माताओं की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वे इस व्यापक रिपोर्ट के सुझावों पर अमल करते हुए जल्द से जल्द एक पारदर्शी और राष्ट्रीय ‘ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट पॉलिसी’ (Green Public Procurement Policy) को जमीन पर लागू करें। भारत यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम उठाता है, तो वह न केवल वैश्विक स्तर पर स्वच्छ औद्योगिक क्रांति और ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक का एक बड़ा ग्लोबल लीडर बनकर उभरेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को ‘मेक इन इंडिया’ के तहत एक स्वच्छ, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत की अनमोल विरासत भी सौंप कर जाएगा।
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