Ekadashi July dates 2026: जुलाई में कब हैं योगिनी और देवशयनी एकादशी? जानें व्रत की तिथि, पारण समय और पूजा विधि
10 जुलाई योगिनी एकादशी और 25 जुलाई देवशयनी एकादशी, व्रत पारण समय व पूजा विधि
Ekadashi July dates 2026: सनातन हिंदू धर्म और वैदिक पंचांग के अनुसार, वर्ष के सभी व्रतों में एकादशी व्रत को सबसे पवित्र, कल्याणकारी और सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। साल 2026 के जुलाई महीने में दो अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़े धार्मिक प्रभाव वाली एकादशियां आ रही हैं, जिन्हें ‘योगिनी एकादशी’ (Yogini Ekadashi) और ‘देवशयनी एकादशी’ (Devshayani Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। ये दोनों ही पावन तिथियां जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु की विशेष कूटनीतिक और सात्विक आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। ज्योतिषीय और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन व्रतों को पूरी निष्ठा के साथ रखने से मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का पूरी तरह से नाश हो जाता है, तथा जीवन में सुख, शांति, अटूट समृद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग हमेशा के लिए प्रशस्त होता है।
इस साल पंचांग की गणना के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत 10 जुलाई को और जगत प्रसिद्ध देवशयनी एकादशी का महापर्व 25 जुलाई को मनाया जाएगा। देवशयनी एकादशी के साथ ही पूरे देश में पवित्र ‘चतुर्मास’ (चार महीने का विशेष नियम काल) भी शुरू हो जाएगा, जिसके बाद सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्यों (जैसे शादी-ब्याह) पर चार महीनों के लिए पूरी तरह से विराम लग जाएगा। आइए आज के इस विस्तृत और विशेष धार्मिक बुलेटिन के माध्यम से बहुत ही गहराई से समझने का प्रयास करते हैं कि इन दोनों महा-व्रतों की सटीक तिथियां, पूजा की गुप्त विधियां, पारण करने का सही समय और इनका ज्योतिषीय महत्व क्या है।
योगिनी एकादशी की तिथि, गहरा महत्व और पौराणिक कथा का संदर्भ
जुलाई 2026 के पहले पखवाड़े में आने वाली योगिनी एकादशी 10 जुलाई शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि होती है, जिसका आध्यात्मिक और मानसिक दृष्टिकोण से बहुत बड़ा महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस विशिष्ट व्रत को रखने से जातक के भीतर की योग शक्तियां और सकारात्मक ऊर्जा जागृत होती है, तथा मानसिक तनाव व अवसाद पूरी तरह से शांत हो जाते हैं। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि भगवान कृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व बताते हुए कहा था कि जो मनुष्य इस दिन सच्चे मन से विष्णु जी की पूजा करता है, उसे 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर अक्षय पुण्यों की प्राप्ति बेहद सहजता के साथ हो जाती है।
पौराणिक संदर्भ के अनुसार, कुबेर के राजा अलकापुरी के एक हेम नाम के माली को इस व्रत के प्रभाव से ही कुष्ठ रोग जैसे भयंकर श्राप से पूरी तरह मुक्ति मिली थी और उसका जीवन दोबारा खुशहाल हुआ था। यही कारण है कि इसे किसी भी प्रकार के शारीरिक कष्टों, असाध्य बीमारियों और त्वचा रोगों से मुक्ति पाने के लिए एक अचूक और कड़क आध्यात्मिक उपाय माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने मन को पूरी तरह सात्विक रखना चाहिए और किसी भी जीव के प्रति ईर्ष्या या द्वेष की भावना लाने से कड़ाई से बचना चाहिए, तभी व्रत का वास्तविक फल प्राप्त होता है।
योगिनी एकादशी व्रत की प्रामाणिक पूजा विधि और पारण का सटीक समय
योगिनी एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं, और पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के ‘मधुसूदन’ रूप के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का कड़ा संकल्प करें। पूजा स्थल पर भगवान श्री हरि की मूर्ति या तस्वीर के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं, तथा उन्हें पीले फूल, ऋतु फल, अक्षत, धूप और सबसे महत्वपूर्ण ‘तुलसी पत्र’ (तुलसी की पत्तियां) श्रद्धापूर्वक अर्पित करें; क्योंकि विष्णु जी की पूजा तुलसी के बिना पूरी तरह अधूरी मानी जाती है। दिनभर पूरी तरह फलाहार व्रत रखें और गेहूं, चावल, जौ व सभी प्रकार के अनाजों के सेवन से कड़ाई से दूर रहें।
शाम के समय भगवान की विशेष आरती करें और ‘विष्णु सहस्रनाम’ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ महामंत्र का निरंतर जाप करें; रात के समय सोने के बजाय भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करना इस व्रत का सबसे अनिवार्य नियम माना गया है। व्रत के नियमों के अनुसार, अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को व्रत तोड़ने की प्रक्रिया को ‘पारण’ कहा जाता है; योगिनी एकादशी के लिए पारण का शुभ समय 11 जुलाई शनिवार को सुबह 1:50 बजे से लेकर दोपहर 4:36 बजे के बीच रहेगा। स्थानीय पंचांग के अनुसार द्वादशी तिथि के भीतर ही किसी ब्राह्मण या गरीब को दान-दक्षिणा देने के बाद फल या हल्के सात्विक भोजन से अपना व्रत खोलें।
देवशयनी एकादशी का महा-महत्व और विष्णु जी की चार महीने की योगनिद्रा
जुलाई महीने की दूसरी और सबसे बड़ी एकादशी ‘देवशयनी एकादशी’ 25 जुलाई शनिवार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। इसे आषाढ़ शुक्ल एकादशी या ‘हरिशयनी एकादशी’ भी कहा जाता है। सनातन धर्म में यह मान्यता है कि इस पावन तिथि से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर पूरे चार महीने की लंबी ‘योगनिद्रा’ (अलौकिक सोए हुए काल) में चले जाते हैं, और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी के दिन ही दोबारा जागते हैं। इन चार महीनों की अवधि को ‘चतुर्मास’ कहा जाता है, जिसमें सृष्टि के संचालन का पूरा जिम्मा भगवान भोलेनाथ (शिव जी) संभालते हैं।
देवशयनी एकादशी का व्रत रखने से जातक को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुयोग्य संतान और अटूट समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है। चूंकि इस दिन से भगवान शयन काल में चले जाते हैं, इसलिए समाज में किसी भी प्रकार के नए गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और विवाह जैसे बड़े मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह रोक लग जाती है और पूरा ध्यान केवल भगवान के भजन, ध्यान, तप और दान-पुण्य जैसी आध्यात्मिक साधनाओं पर ही केंद्रित हो जाता है। यह समय इंसानी अहंकार को मिटाकर ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित होने का एक बहुत ही सुंदर और कड़क अवसर प्रदान करता है।
Ekadashi July dates 2026: देवशयनी एकादशी की पूजा विधि, चतुर्मास के नियम और पारण गाइड
देवशयनी एकादशी की सुबह पवित्र नदियों में या घर के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें, और भगवान विष्णु के विश्राम कर रहे स्वरूप (शयन मुद्रा) की प्रतिमा को गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक कराएं। भगवान को नए पीले वस्त्र पहनाएं, और उन्हें खीर, पीले फल, पीले पेड़े और विशेष पकवानों का भोग लगाएं। इस दिन ‘विष्णु चालीसा’ और पौराणिक हरिशयनी कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए, तथा घर के मुख्य द्वार और तुलसी के पौधे के पास शाम को गाय के घी का दीपक जलाना अनिवार्य माना जाता है। इस पावन तिथि से ही चतुर्मास के कड़े नियमों का पालन शुरू हो जाता है, जिसके तहत प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन, झूठ बोलने और ब्रह्मचर्य के उल्लंघन से पूरी तरह दूर रहने की कड़क सलाह संतों द्वारा दी जाती है।
इस महा-व्रत को पूर्ण करने के बाद, देवशयनी एकादशी का पारण समय अगले दिन यानी 26 जुलाई रविवार को सुबह 5:39 बजे से लेकर 8:22 बजे के बेहद शुभ और कड़क काल के भीतर रहेगा। द्वादशी तिथि के इस शुभ मुहूर्त में व्रत तोड़ने से पहले अपने घर के पास किसी भूखी गाय को हरा चारा खिलाएं, तथा किसी योग्य ब्राह्मण को सात्विक भोजन कराकर वस्त्र व सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा अवश्य दें। नियमों का यह कड़ा अनुशासन ही आपके व्रत को पूरी तरह से सफल और फलदायी बनाएगा, जिससे भगवान विष्णु का आशीर्वाद आपके पूरे परिवार पर हमेशा बना रहेगा।
निष्कर्ष: आधुनिक जीवन में एकादशी का वैज्ञानिक महत्व और अंतिम संदेश
इस प्रकार जुलाई 2026 (Ekadashi July dates 2026) में आने वाली ये दोनों एकादशियां—10 जुलाई को योगिनी और 25 जुलाई को देवशयनी—वास्तव में हमारे आध्यात्मिक उत्थान के साथ-साथ हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह दुरुस्त रखने का भी एक बहुत ही वैज्ञानिक और अचूक माध्यम हैं; क्योंकि आज की इस भागदौड़ भरी, प्रदूषित और तनावपूर्ण आधुनिक जीवनशैली में महीने में दो बार उपवास रखना हमारे पाचन तंत्र (डिटॉक्सिफिकेशन) के लिए सबसे ज्यादा उत्तम व पैसा वसूल प्राकृतिक चिकित्सा साबित होती है। युवा पीढ़ी को भी इन पवित्र सनातन परंपराओं और कड़े नियमों के वैज्ञानिक महत्व को समझना चाहिए, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़कर एक पूरी तरह से अनुशासित, संयमित और ऊर्जावान जीवन जी सकें।
शास्त्रों और हमारे आचार्यों के दिए गए इन कड़े विधिक नियमों, सात्विक पूजा विधियों और पारण के सटीक समय का पूरी श्रद्धा व निष्ठा के साथ पालन करना ही आपके जीवन से सभी प्रकार के दुखों, दरिद्रता और ग्रह दोषों को हमेशा-always के लिए दूर भगाकर आपके पूरे परिवार में अटूट सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और स्थाई ईश्वरीय कृपा का वास हमेशा के लिए सुनिश्चित करने का सबसे अचूक व कड़क रास्ता साबित होगा; इसलिए पूरी श्रद्धा से व्रत का संकल्प लें और भगवान श्री हरि के चरणों में अपना ध्यान लगाकर जीवन को परम खुशहाल बनाएं।
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