Chandra Kumar Bose quits TMC: ममता बनर्जी को बड़ा झटका, महज चार महीने के भीतर नेताजी के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने छोड़ी टीएमसी

Chandra Kumar Bose quits TMC: ममता बनर्जी को बड़ा झटका, महज चार महीने के भीतर नेताजी के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने छोड़ी टीएमसी

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Chandra Kumar Bose quits TMC: पश्चिम बंगाल की सियासत से इस वक्त की एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र और जाने-माने राजनेता चंद्र कुमार बोस ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। ममता बनर्जी की पार्टी में शामिल होने के महज चार महीने के भीतर ही उनका यह फैसला पार्टी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। उन्होंने अपने इस फैसले के पीछे पूरी तरह से निजी कारणों का हवाला दिया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस अचानक उठाए गए कदम को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इस घटनाक्रम को पश्चिम बंगाल के सियासी समीकरणों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव से ठीक पहले इस तरह के बड़े नेताओं का पार्टी छोड़ना स्थानीय स्तर पर कई तरह के सवाल खड़े करता है।

Chandra Kumar Bose quits TMC: व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से दिया इस्तीफा

चंद्र कुमार बोस ने सोमवार को अपना आधिकारिक इस्तीफा पत्र सार्वजनिक करते हुए पार्टी छोड़ने की घोषणा की। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि वे व्यक्तिगत कारणों के चलते तत्काल प्रभाव से ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ रहे हैं। अपने इस त्यागपत्र में उन्होंने किसी भी प्रकार के आंतरिक राजनीतिक मतभेद या पार्टी नेतृत्व के साथ किसी विवाद का जिक्र करने से साफ परहेज किया है। इसके बावजूद जानकार इसे सामान्य घटना नहीं मान रहे हैं, क्योंकि चुनाव के माहौल में इतने प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखने वाले नेता का इस तरह अचानक अलग होना कई राजनीतिक मायने रखता है। हालांकि दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से इस इस्तीफे पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या बयान सामने नहीं आया है, जिससे पार्टी की चुप्पी भी कई तरह के कयासों को हवा दे रही है।

BJP से नाता तोड़कर ममता बनर्जी की पार्टी में शामिल हुए थे बोस

चंद्र कुमार बोस का राजनीतिक सफर पिछले कुछ वर्षों के दौरान काफी चर्चा का विषय रहा है। वे काफी लंबे समय तक देश की सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे थे और उन्होंने भगवा दल के टिकट पर चुनाव भी लड़ा था। हालांकि पार्टी की कार्यशैली से वैचारिक मतभेद होने के कारण उन्होंने कुछ समय पहले भाजपा को अलविदा कह दिया था और सार्वजनिक रूप से अपनी पुरानी राजनीतिक पसंद को एक गलती करार दिया था। इसके बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच उन्होंने ममता बनर्जी की नीतियों और समावेशी राजनीति से प्रभावित होकर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था। पार्टी में उनका स्वागत बड़े ही उत्साह के साथ किया गया था और यह उम्मीद जताई जा रही थी कि उनके आने से राज्य के एक बड़े वर्ग में पार्टी की पकड़ और अधिक मजबूत होगी, लेकिन यह गठबंधन बहुत अधिक समय तक टिक नहीं सका।

टीएमसी में शामिल होते समय व्यक्त किए गए थे बड़े राजनीतिक सपने और उम्मीदें

जब चंद्र कुमार बोस ने तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी, तब उन्होंने मीडिया और पार्टी मंचों से राज्य की राजनीति को एक नई दिशा देने की बात कही थी। उन्होंने जोर देकर कहा था कि वे एक ऐसी राजनीति की वकालत करते हैं जो सभी समुदायों को साथ लेकर चले और समाज के हर वर्ग को एकजुट करे। उनका मुख्य उद्देश्य पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक सकारात्मक बदलाव लाना और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना था। उस वक्त राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि नेताजी परिवार की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पार्टी में एक बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। लेकिन महज चार महीनों के अल्पकाल में ही उनका यह सफर अचानक समाप्त हो गया, जिससे उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को भी गहरी हैरानी हुई है।

Chandra Kumar Bose quits TMC: पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में हलचल तेज और भविष्य की संभावनाओं पर नजर

इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद से ही बंगाल की राजनीति में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राज्य में चुनावी माहौल के बीच पहले से ही कई नेता और विधायक पाला बदल चुके हैं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। चंद्र कुमार बोस के इस फैसले को मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल का ही एक हिस्सा माना जा रहा है, जहां नेता अपनी सुविधानुसार दलों का चुनाव कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या वे किसी अन्य राजनीतिक दल का रुख करते हैं या फिर कुछ समय के लिए खुद को सक्रिय राजनीति से दूर रखते हैं। उनके अगले कदम पर राज्य के तमाम सियासी दलों की पैनी नजर बनी हुई है, क्योंकि बंगाल की राजनीति में नेताजी के परिवार के नाम का अपना एक अलग प्रभाव और ऐतिहासिक महत्व है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस प्रकार के नाटकीय घटनाक्रम नए नहीं हैं, लेकिन चुनाव से पहले इस तरह के झटके पार्टियों के लिए चिंता का विषय बन जाते हैं। चंद्र कुमार बोस का तृणमूल कांग्रेस से महज चार महीने के भीतर अलग हो जाना यह साबित करता है कि राज्य का सियासी पारा किस कदर चढ़ चुका है। व्यक्तिगत कारणों का हवाला भले ही दिया गया हो, लेकिन इस फैसले के दूरगामी राजनीतिक परिणाम आने वाले समय में जरूर देखने को मिलेंगे। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि तृणमूल कांग्रेस इस स्थिति से निपटने के लिए क्या रणनीति अपनाती है और चंद्र कुमार बोस अपनी राजनीतिक यात्रा को किस दिशा में आगे बढ़ाते हैं।

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