Banana Shape Mystery: सीधा बढ़ने के बजाय क्यों टेढ़ा हो जाता है केला, जानिए इसके पीछे छिपा प्रकृति का अनोखा वैज्ञानिक रहस्य

Banana Shape Mystery: केला सीधा बढ़ने के बजाय क्यों हो जाता है टेढ़ा?

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Banana Shape Mystery: दुनिया भर में सबसे चाव से खाए जाने वाले फलों में शामिल केला अपनी मिठास और पौष्टिकता के लिए जाना जाता है। जिम जाने वाले युवाओं से लेकर बच्चों तक, यह हर आयु वर्ग की पहली पसंद है। लेकिन क्या आपने कभी ठेले या सुपरमार्केट से केला खरीदते समय इस बात पर गौर किया है कि यह हमेशा टेढ़ा ही क्यों होता है? सेब, संतरा, तरबूज या अमरूद जैसे अधिकांश फल जहां गोल या सीधे आकार में बढ़ते हैं, वहीं केले का आकार हमेशा एक धनुष की तरह मुड़ा हुआ या कर्व्ड क्यों नजर आता है? पहली नजर में यह प्रकृति का एक सामान्य सा इत्तेफाक लग सकता है, लेकिन वनस्पति विज्ञान (बॉटनिकल साइंस) के नजरिए से इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और अनूठा वैज्ञानिक कारण काम करता है। आइए जानते हैं कि आखिर वह कौन सी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो हर सीधे उगने वाले केले को समय के साथ टेढ़ा होने पर मजबूर कर देती है।

Banana Shape Mystery: शुरुआत में बिल्कुल सीधे होते हैं केले पर बाद में बदल जाता है इनका रुख

केले के पौधे की बनावट और उसके फलने की प्रक्रिया को अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो इस रहस्य की पहली परत वहीं खुल जाती है। केले के पेड़ पर फल हमेशा एक विशाल गुच्छे के रूप में आते हैं, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘घार’ कहा जाता है। इस बड़े से गुच्छे में कई दर्जन केले एक साथ नीचे की तरफ लटकते हुए बड़े होते हैं। जब ये फल बिल्कुल शुरुआती अवस्था में होते हैं, यानी जब फूल से छोटे-छोटे केले बाहर निकलते हैं, तब उनका आकार पूरी तरह से सीधा और जमीन की तरफ रुख किए हुए होता है। इस समय वे गुरुत्वाकर्षण बल (ग्रैविटेशनल फोर्स) के सामान्य नियमों का पालन करते हुए नीचे की ओर ही लटकते हैं। लेकिन जैसे-जैसे इनका आकार बढ़ना शुरू होता है, फल के भीतर एक अजीब सी जैविक कशमकश शुरू हो जाती है जो इनके पूरे हुलिए को ही बदल कर रख देती है।

क्या है फोटोट्रोपिज्म का वह नियम जो बदल देता है केले की दिशा

विज्ञान की भाषा में इस पूरी घटना के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है, उसे ‘फोटोट्रोपिज्म’ (Phototropism) कहा जाता है। सरल शब्दों में समझाएं तो यह पौधों की वह प्राकृतिक प्रवृत्ति है जिसके तहत वे रोशनी या सूरज की दिशा में आगे बढ़ते हैं। अमूमन सभी पेड़-पौधों की पत्तियां और तने धूप की तलाश में ऊपर की तरफ बढ़ते हैं, लेकिन केले के फल में यह असर कुछ ज्यादा ही आक्रामक रूप से देखने को मिलता है। इसे वैज्ञानिक रूप से ‘नेगेटिव जियोट्रोपिज्म’ (Negative Geotropism) भी कहा जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि जब फल बड़ा होने लगता है, तो वह जमीन की तरफ खींचने वाले गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत जाकर ऊपर आकाश में चमक रहे सूरज की रोशनी की तरफ मुड़ने का प्रयास करता है।

घने जंगलों के बीच धूप पाने की जद्दोजहद से पैदा हुआ यह अनोखा आकार

इस प्राकृतिक बदलाव का एक बहुत मजबूत ऐतिहासिक और भौगोलिक बैकग्राउंड भी है। मूल रूप से केले के पौधे घने वर्षावनों (रेनफॉरेस्ट) के बीच पैदा हुए थे, जहां चारों तरफ बड़े और ऊंचे पेड़ों की भरमार होती थी। ऐसे घने जंगलों में छोटे पौधों तक सूरज की पर्याप्त रोशनी पहुंचना बेहद मुश्किल काम होता था। अपनी प्रजाति को जीवित रखने और फलों को पकाने के लिए केले के पौधे ने खुद को इसी माहौल के हिसाब से ढाल लिया। भले ही केले का भारी गुच्छा पेड़ की टहनी से नीचे की तरफ लटक रहा हो, लेकिन उसके भीतर का हर एक केला बाजू से घूमकर ऊपर की ओर उठने की कोशिश करता है ताकि उसे ज्यादा से ज्यादा धूप मिल सके। नीचे की तरफ लटकने की मजबूरी और ऊपर की तरफ धूप पाने की इसी खींचतान के बीच केले का आकार बीच में से मुड़ जाता है और हमें फल का यह टेढ़ा स्वरूप देखने को मिलता है।

क्या दुनिया में कोई ऐसा केला भी है जो बिल्कुल सीधा होता है

इस वैज्ञानिक तथ्य को जानने के बाद कई पाठकों के मन में यह कौतूहल होना लाजमी है कि क्या दुनिया के हर कोने में सिर्फ टेढ़े केले ही मिलते हैं? कृषि वैज्ञानिकों और वनस्पतिविदों के मुताबिक, दुनिया भर में केले की सैकड़ों प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से कुछ दुर्लभ और जंगली प्रजातियां ऐसी भी हैं जो घने जंगलों के बजाय खुले मैदानों में उगती हैं जहां उन्हें शुरुआत से ही भरपूर धूप मिलती है। ऐसी जगहों पर उगने वाले कुछ केले काफी हद तक सीधे आकार के भी होते हैं क्योंकि उन्हें रोशनी के लिए अपनी दिशा बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, जिन कमर्शियल केलों की खेती भारत, फिलीपींस या लाटिन अमेरिकी देशों में बड़े पैमाने पर की जाती है, वे सभी ‘नेगेटिव जियोट्रोपिज्म’ की प्रक्रिया से गुजरते हैं, इसलिए बाजार में मिलने वाले शत-प्रतिशत केले आपको कर्व्ड शेप में ही दिखाई देते हैं।

Banana Shape Mystery: सेहत के लिए कितना फायदेमंद है सूरज की रोशनी से तपा यह फल

केले का यह अनोखा आकार सिर्फ उसकी बाहरी पहचान नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि इस फल ने पकने के दौरान कितनी प्रचुर मात्रा में सौर ऊर्जा को अपने भीतर समेटा है। धूप की तरफ बढ़ने की इसी खूबी के कारण इसमें प्राकृतिक शर्करा, कार्बोहाइड्रेट्स और पोटैशियम जैसे जरूरी मिनरल्स का बेहतरीन कॉम्बिनेशन तैयार होता है। यही वजह है कि जब आप अगली बार एक टेढ़ा केला खाएं, तो यह जरूर याद रखें कि इसका यह आकार कोई खराबी नहीं, बल्कि जीवन को ऊर्जा देने वाले सूर्य देव तक पहुंचने की उसकी एक खूबसूरत और सफल कोशिश का नतीजा है। प्रकृति का यह नियम हमें यह भी सिखाता है कि विषम परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने और सही दिशा चुनने की क्षमता केवल इंसानों में ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधों और फलों में भी कूट-कूट कर भरी हुई है।

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