Allahabad High Court: अविवाहित बहन को भी मिलेगी पारिवारिक पेंशन, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Allahabad High Court: अविवाहित बहन को भी मिलेगी पारिवारिक पेंशन, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि शासनादेश के जरिए संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए वैधानिक सेवा नियमों को बदला या निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर न्यायालय ने मृत सरकारी कर्मचारी की अविवाहित बहन को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पेंशन के बकाये का भुगतान करने का निर्देश भी दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति मनीष कुमार की एकल पीठ ने शमीन खान की याचिका पर पारित किया। याची का कहना था कि उनके दिवंगत भाई ने अपनी सेवा पुस्तिका में उन्हें पारिवारिक पेंशन के लिए नामित किया था। इसके बावजूद उनका दावा खारिज कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता का दावा क्या था और उसे क्यों खारिज किया गया?
शमीन खान ने अपनी याचिका में बताया कि उनके भाई की मृत्यु हो चुकी है। भाई ने सेवा पुस्तिका में उन्हें पारिवारिक पेंशन का लाभार्थी नामित किया था। इसके बावजूद 5 दिसंबर 2025 को उनका दावा खारिज कर दिया गया। अस्वीकृति का आधार 23 दिसंबर 2016 का शासनादेश बताया गया। इसमें कहा गया था कि अविवाहित बहन मृत कर्मचारी के परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं है।
याची ने कोर्ट में दलील दी कि नामित होने के बावजूद पेंशन से वंचित रखना गलत है। राज्य सरकार ने भी अपने जवाब में इस बात से इनकार नहीं किया कि याची मृत कर्मचारी की अविवाहित बहन हैं। कोर्ट ने पूरे मामले की सुनवाई करते हुए नियमों और शासनादेश के बीच अंतर पर गौर किया।
हाईकोर्ट ने किस नियम का हवाला दिया?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सेवानिवृत्ति लाभ नियमावली, 1961 के नियम 3(5) का उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा कि उक्त नियम में अविवाहित और विधवा बहनों को परिवार की परिभाषा में साफ तौर पर शामिल किया गया है। नियम वैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत बनाया गया है।
पीठ ने टिप्पणी की कि शासनादेश के जरिए ऐसे वैधानिक नियमों को बदला या निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। कार्यपालिका के आदेश से वैधानिक प्रावधानों को खत्म नहीं किया जा सकता। नियमों में संशोधन के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि 2016 के शासनादेश का हवाला देकर पेंशन से इनकार करना नियमों के खिलाफ था।
कोर्ट ने क्या आदेश दिया और ब्याज का प्रावधान क्या है?
इन्हीं टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने याची को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने प्रमुख सचिव, खाद्य एवं रसद विभाग को निर्देश दिया कि मृत कर्मचारी की मृत्यु की तिथि 15 मई 2024 से वास्तविक भुगतान होने तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित पेंशन के बकाये का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए नियमों में कार्यपालिका के आदेश या शासनादेश के माध्यम से बदलाव नहीं किया जा सकता। ऐसे नियमों को निष्प्रभावी करने का प्रयास अमान्य है। याची को पेंशन का लाभ मिलना चाहिए क्योंकि नियम में अविवाहित बहन को परिवार का सदस्य माना गया है।
इस फैसले का क्या मतलब है?
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां शासनादेश का हवाला देकर वैधानिक नियमों को नजरअंदाज किया जाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि वैधानिक सेवा नियमों को कार्यपालिका के आदेश से बदला नहीं जा सकता। अविवाहित बहन को पारिवारिक पेंशन से वंचित रखना नियमों के खिलाफ है।
याची के भाई ने सेवा पुस्तिका में नामित किया था। इसके बावजूद दावा खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने पाया कि राज्य ने याची के अविवाहित बहन होने के तथ्य से इनकार नहीं किया। नियम 3(5) में अविवाहित और विधवा बहनें परिवार की परिभाषा में शामिल हैं। इसलिए पेंशन का अधिकार बना रहता है।
आगे क्या होगा और अन्य मामलों पर असर क्या पड़ सकता है?
कोर्ट के निर्देश के अनुसार विभाग को बकाया राशि छह प्रतिशत ब्याज के साथ चुकानी होगी। मृत्यु की तारीख 15 मई 2024 से गणना शुरू होगी। यह फैसला अन्य समान मामलों में भी असर डाल सकता है जहां अविवाहित बहन को पेंशन से वंचित किया गया हो।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि नियमों में बदलाव के लिए कानूनी प्रक्रिया जरूरी है। सिर्फ शासनादेश जारी करके वैधानिक प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। याची को अब पेंशन का लाभ मिलने की उम्मीद है। विभाग को आदेश का पालन करना होगा।
यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों के परिवारजनों के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। अविवाहित बहन को भी पारिवारिक पेंशन का हक मिलना चाहिए अगर नियम में उसे शामिल किया गया है। कोर्ट ने नियमों की सर्वोच्चता को बरकरार रखा है। आगे विभाग द्वारा भुगतान की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।
कुल मिलाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का यह फैसला अविवाहित बहन के पेंशन अधिकार को स्वीकार करता है। शासनादेश को वैधानिक नियमों पर हावी नहीं होने दिया गया। याची को ब्याज सहित बकाया राशि मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
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