UCC पर भाजपा राज्य-दर-राज्य रणनीति क्यों अपना रही, सीधे संसद से कानून क्यों नहीं ला रही? समझें पूरा गणित
UCC पर भाजपा राज्य-दर-राज्य रणनीति क्यों अपना रही, सीधे संसद से कानून क्यों नहीं ला रही? समझें पूरा गणित
UCC: समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर भाजपा की रणनीति अब एक तय समय-सीमा वाले राजनीतिक कार्यक्रम का रूप लेती दिख रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को मुंबई में साफ कहा कि 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा-राजग शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कई राज्यों में पहले ही यूसीसी लागू की जा चुकी है और तीन तलाक को खत्म करना भी इसी दिशा में सरकार का बड़ा कदम रहा है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा एक राष्ट्रीय कानून के बजाय राज्य-दर-राज्य यूसीसी लागू करने का रास्ता अपना रही है, जिसके पीछे संवैधानिक और राजनीतिक, दोनों तरह के कारण बताए जा रहे हैं। वहीं विपक्षी दलों के साथ-साथ भाजपा के अपने सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय रखते हैं। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
UCC: अमित शाह के बयान का क्या है महत्व
समान नागरिक संहिता भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे मुख्य वैचारिक लक्ष्यों में से एक रही है, ठीक वैसे ही जैसे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 हटाना पार्टी के एजेंडे में शामिल था। यह दोनों लक्ष्य अब पूरे हो चुके हैं, लेकिन यूसीसी का उद्देश्य अब भी अधूरा है। गुजरात द्वारा मार्च में अपना यूसीसी विधेयक पास करने के बाद शाह ने खुद कहा था कि हर नागरिक के लिए एक समान कानून बनाना पार्टी की स्थापना के समय से ही प्रतिबद्धता रही है।
राष्ट्रीय कानून की बजाय राज्यवार रास्ता क्यों
विवाह, तलाक, गोद लेना, वसीयत और उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची में आते हैं, जिस पर संसद और राज्य विधानसभाएं, दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। हालांकि इससे भी अहम वजह राजनीतिक है, क्योंकि एक राष्ट्रव्यापी कानून बनाने के लिए भारत में मौजूद पर्सनल लॉ और पारंपरिक प्रथाओं की भारी विविधता से निपटना बेहद जटिल काम है, खासकर आदिवासी समुदायों और पूर्वोत्तर राज्यों के मामले में। राज्यवार रास्ता भाजपा को अलग-अलग मॉडल आजमाने और स्थानीय परंपराओं से निपटने की सहूलियत देता है, जिससे इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से जीवित रखने में भी मदद मिलती है।
कहां-कहां पारित हो चुका है यूसीसी कानून
अब तक भाजपा शासित उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश यूसीसी कानून पारित कर चुके हैं, हालांकि उत्तराखंड अकेला ऐसा राज्य है जहां यह फिलहाल लागू है। उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में अपना यूसीसी लागू किया था, जो विवाह, तलाक, विरासत पर समान नियम देता है और लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य बनाता है। गुजरात और असम ने भी लगभग इसी मॉडल का अनुसरण करते हुए मार्च और मई में अपने विधेयक पारित किए, जबकि मध्य प्रदेश ने जुलाई में गोद लेने, तीन तलाक और निकाह हलाला से जुड़े प्रावधानों के साथ अपना कानून पारित किया। इन सभी कानूनों में अनुसूचित जनजातियों को छूट दी गई है, इसलिए यह पूरी तरह एक जैसे तो नहीं, लेकिन काफी हद तक मिलते-जुलते जरूर हैं।
विपक्ष और राजग सहयोगियों का क्या है रुख
विपक्षी दलों ने बार-बार सवाल उठाया है कि क्या भाजपा यूसीसी के जरिए सच में लैंगिक समानता लाना चाहती है या फिर अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ को बदलने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस ने गुजरात के विधेयक को आलोचनात्मक नजरिए से देखा था और मध्य प्रदेश के विधेयक पर भी सवाल उठाए थे। भाजपा के सहयोगी दलों के लिए भी यह मुद्दा आसान नहीं रहा है। जनता दल यूनाइटेड ने साफ किया है कि वह यूसीसी के खिलाफ नहीं है, लेकिन चाहती है कि यह थोपने के बजाय सहमति से लागू हो, वहीं तेलुगु देशम पार्टी ने भी व्यापक चर्चा और मुस्लिम हितों की रक्षा की बात कही है।
UCC: संविधान और विधि आयोग की क्या है राय
संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने को कहता है, लेकिन यह नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा है और इसे अदालत के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता। 21वें विधि आयोग ने 2018 में कहा था कि इस चरण में यूसीसी न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय, बल्कि पर्सनल लॉ में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों में धीरे-धीरे सुधार बेहतर रास्ता है। 22वें विधि आयोग ने 2023 में इस मुद्दे को फिर से खोला, लेकिन अब तक कोई आधिकारिक रिपोर्ट पेश नहीं की है।
समान नागरिक संहिता को लेकर भाजपा की राज्यवार रणनीति अब एक स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य में तब्दील होती दिख रही है, जिसकी समय-सीमा 2029 के लोकसभा चुनाव तय की गई है। उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में पारित हो चुके कानून इस दिशा में पार्टी की गंभीरता दिखाते हैं, लेकिन बिहार में जेडीयू जैसे सहयोगी दल की असहमति यह भी साफ करती है कि यह रास्ता उतना आसान नहीं है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बाकी भाजपा शासित राज्य इस मॉडल को किस तरह अपनाते हैं और विपक्ष तथा सहयोगी दलों की चिंताओं का समाधान कैसे निकाला जाता है।
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