Tata Sons IPO: लिस्टिंग के बाद किसके हाथ में रहेगा कंट्रोल, किसे मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा
Tata Sons IPO: RBI ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी खारिज की, जिससे टाटा संस IPO की संभावना तेज हुई, जानें पूरा वैल्यूएशन गणित।
Tata Sons IPO: भारतीय रिजर्व बैंक के एक बड़े फैसले ने टाटा ग्रुप की सबसे बड़ी होल्डिंग कंपनी टाटा संस के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आरबीआई ने टाटा संस की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने खुद को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रजिस्ट्रेशन से बाहर रखने की मांग की थी। इस फैसले के बाद टाटा संस के लिए स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होना लगभग अनिवार्य होता दिख रहा है, जिससे अनिवार्य लिस्टिंग को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस फिर से जिंदा हो गई है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि टाटा संस का IPO आने पर कंपनी की वैल्यूएशन कितनी होगी और इसके अनोखे शेयरहोल्डर स्ट्रक्चर पर इसका क्या असर पड़ेगा। अनुमानित 10 लाख करोड़ रुपये के वैल्यूएशन पर टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा की हिस्सेदारी ही करीब 10,000 करोड़ रुपये आंकी जा रही है।
Tata Sons IPO: RBI के फैसले ने क्यों बदली पूरी तस्वीर
आरबीआई ने टाटा संस को निर्देश दिया है कि वह सभी गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन करने के लिए जरूरी कदम उठाए, जिसका सीधा मतलब है कि कंपनी को अब IPO के जरिए पब्लिक होना होगा और अपने शेयर स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट कराने होंगे। टाटा संस ने अपर लेयर एनबीएफसी क्लासिफिकेशन से बचने के लिए पहले ही अपना कर्ज चुका दिया था, लेकिन आरबीआई के इस ताजा फैसले ने वह रास्ता बंद कर दिया है। अब अगली लड़ाई कोर्ट में लड़ी जा सकती है, जहां अगर आरबीआई का फैसला बरकरार रहता है तो वैल्यूएशन और डाइल्यूशन को लेकर नए सवाल खड़े होंगे।
टाटा संस की वैल्यूएशन को लेकर क्या हैं अनुमान
टाटा संस का कोई आधिकारिक वैल्यूएशन अभी सामने नहीं आया है, लेकिन कंपनी की एनुअल रिपोर्ट के मुताबिक FY26 में इसकी नेट वर्थ बढ़कर लगभग 1.79 लाख करोड़ रुपये हो गई। मार्च 2026 तक इसके लिस्टेड इन्वेस्टमेंट की मार्केट वैल्यू करीब 11.89 लाख करोड़ रुपये थी। हालांकि टाटा संस की मार्केट वैल्यू सीधे इन लिस्टेड कंपनियों के मार्केट कैप को जोड़कर नहीं निकाली जा सकती, क्योंकि होल्डिंग-कंपनी डिस्काउंट लागू होता है। हेलिओस कैपिटल के फाउंडर समीर अरोड़ा के मुताबिक ऐसी होल्डिंग कंपनियों का एनएवी करीब 70 प्रतिशत डिस्काउंट पर ट्रेड करता है, जबकि हाल के कंजर्वेटिव अनुमानों में यह आंकड़ा करीब 10 लाख करोड़ रुपये और कुछ अनुमानों में 12 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा बताया जा रहा है।
कितना बड़ा हो सकता है टाटा संस का पब्लिक ऑफर
सेबी के रिवाइज्ड फ्रेमवर्क के तहत 5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पोस्ट-इश्यू मार्केट कैपिटलाइजेशन वाली कंपनी के लिए न्यूनतम पब्लिक ऑफर 15,000 करोड़ रुपये और पोस्ट-इश्यू मार्केट कैप का कम से कम 1 प्रतिशत होना जरूरी है। अगर टाटा संस की वैल्यू 10 लाख करोड़ रुपये मानी जाए, तो न्यूनतम पब्लिक ऑफर करीब 25,000 करोड़ रुपये का बैठता है, जो इसे भारत के सबसे बड़े IPO में से एक बना सकता है। कंपनी को पांच साल में पब्लिक शेयरहोल्डिंग बढ़ाकर 15 प्रतिशत और दस साल में 25 प्रतिशत तक ले जानी होगी।
किन शेयरधारकों को होगा सबसे ज्यादा फायदा
टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी टाटा चैरिटेबल ट्रस्ट्स के पास है, जबकि शापूरजी पलोनजी यानी मिस्त्री परिवार के पास 18.37 प्रतिशत और टाटा ग्रुप की कंपनियों के पास करीब 13 प्रतिशत हिस्सेदारी है। 10 लाख करोड़ रुपये के वैल्यूएशन पर मुख्य हिस्सेदारों की स्थिति नीचे दी गई तालिका में देखी जा सकती है।
| हिस्सेदार | हिस्सेदारी | अनुमानित वैल्यू |
|---|---|---|
| टाटा चैरिटेबल ट्रस्ट्स | करीब 66% | सबसे बड़ी हिस्सेदारी |
| शापूरजी पलोनजी (मिस्त्री परिवार) | 18.37% | करीब 1.84 लाख करोड़ रुपये |
| टाटा ग्रुप की 9 कंपनियां | करीब 13% | करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये |
| नोएल टाटा (4,058 शेयर) | व्यक्तिगत हिस्सेदारी | करीब 10,000 करोड़ रुपये |
| जिमी टाटा (3,262 शेयर) | व्यक्तिगत हिस्सेदारी | करीब 8,100 करोड़ रुपये |
क्या लिस्टिंग के बाद खत्म हो जाएगा टाटा ट्रस्ट्स का कंट्रोल
सेबी के 2.5 प्रतिशत न्यूनतम डाइल्यूशन नियम का यह मतलब नहीं है कि टाटा ट्रस्ट्स का टाटा संस पर कंट्रोल अचानक खत्म हो जाएगा। अगर IPO में ज्यादातर हिस्सा ऑफर फॉर सेल यानी OFS के जरिए आता है, तो मौजूदा शेयरधारक ही अपने शेयर पब्लिक को बेचेंगे। ऐसे में शापूरजी पलोनजी ग्रुप एक स्वाभाविक विक्रेता हो सकता है, क्योंकि कर्ज कम करने के लिए वह लंबे समय से अपनी हिस्सेदारी से वैल्यू निकालने की कोशिश कर रहा है, जबकि टाटा ट्रस्ट्स अपनी कंट्रोलिंग पोजीशन कम करने में हिचकिचा सकता है।
Tata Sons IPO: लिस्टिंग के बाद बदलेगा टाटा ग्रुप का पूरा ढांचा
टाटा संस की यह लिस्टिंग सिर्फ एक सामान्य IPO नहीं होगी, बल्कि यह टाटा ग्रुप के ओनरशिप आर्किटेक्चर में एक बड़ा बदलाव भी लेकर आएगी। लिस्टिंग के बाद कंपनी को सेबी की एलिजिबिलिटी शर्तें, समय पर फाइनेंशियल खुलासे और मजबूत कॉर्पोरेट गवर्नेंस जैसे नियमों का पालन करना होगा। इसमें उचित बोर्ड स्ट्रक्चर, ऑडिट कमेटी, इंडिपेंडेंट डायरेक्टर और इनसाइडर ट्रेडिंग रोकने वाले नियम भी शामिल होंगे, जिससे कंपनी अब तक की तुलना में कहीं ज्यादा रेगुलेटरी और इन्वेस्टर स्क्रूटनी के दायरे में आ जाएगी।
कुल मिलाकर आरबीआई के इस फैसले ने टाटा संस के लिए स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होने का रास्ता लगभग साफ कर दिया है, भले ही कंपनी कोर्ट का रुख करने का विकल्प अभी भी खुला रखे। इस लिस्टिंग से शापूरजी पलोनजी परिवार से लेकर टाटा ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों तक, कई पक्षों को फायदा होने की उम्मीद है, जबकि टाटा ट्रस्ट्स की कंट्रोलिंग हिस्सेदारी पर तत्काल कोई बड़ा खतरा नहीं दिख रहा। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह मामला कोर्ट में कैसे आगे बढ़ता है और अगर IPO की प्रक्रिया शुरू होती है, तो इसकी अंतिम वैल्यूएशन और स्ट्रक्चर क्या रूप लेते हैं।
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