Uttarakhand Alert: नेपाल की तबाही के बाद उत्तराखंड में हाई अलर्ट, सरस्वती ताल और केदारताल का वैज्ञानिक सर्वे शुरू

सरस्वती ताल और केदारताल का वैज्ञानिक सर्वे शुरू, GLOF से निपटने को Early Warning System

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Uttarakhand Alert: पड़ोसी मुल्क नेपाल के हिमालयी उच्च पर्वतीय क्षेत्र में अगस्त के अंतिम सप्ताह में ग्लेशियर टूटने और मलबे के भीषण बहाव से मची भीषण तबाही के बाद उत्तराखंड सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। राज्य में मौजूद अत्यंत संवेदनशील हिमनद झीलों (ग्लेशियर लेक्स) की सुरक्षा और निगरानी को लेकर शासन ने कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में चमोली जिले में स्थित अति-संवेदनशील सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जिले की केदारताल का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण शुरू कर दिया गया है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पहुंचे वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के दल इन झीलों की वर्तमान संरचनात्मक मजबूती, जलभराव क्षमता, तलछट के स्तर और इनसे उत्पन्न होने वाले संभावित जोखिम का गहन अध्ययन कर रहे हैं।

उत्तराखंड का अधिकांश भूभाग संवेदनशील भूगर्भीय और भूकंपीय क्षेत्र में आता है। तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नई झीलों का निर्माण हो रहा है, जबकि पुरानी झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। यदि इन झीलों की प्राकृतिक मोरेन बांध टूटते हैं, तो निचले रिहायशी क्षेत्रों, जलविद्युत परियोजनाओं, राष्ट्रीय राजमार्गों और चारधाम यात्रा मार्गों के लिए विनाशकारी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। सरकार अब पारंपरिक व्यवस्थाओं के बजाय उपग्रह आधारित ट्रैकिंग, बैथीमेट्री सर्वे और पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) के जरिए किसी भी आपदा से पहले बचाव का मजबूत तंत्र विकसित करने में जुट गई है।

Uttarakhand Alert: नेपाल की विनाशकारी आपदा ने क्यों बढ़ाई उत्तराखंड की चिंता?

नेपाल के हिमालयी ढलानों पर कुछ दिन पहले हुई प्राकृतिक तबाही ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के भूविज्ञानियों को झकझोर कर रख दिया है। वहां हिमनद झील और भारी भूस्खलन के संगम से अचानक पानी, भारी बोल्डर्स और गाद का ऐसा सैलाब नीचे उतरा जिसने नदी घाटियों, पुलों और बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया। नेपाल में बचाव अभियान अब भी जारी है, किंतु इस त्रासदी ने यह साबित कर दिया है कि उच्च हिमालय में बनने वाले प्राकृतिक जल अवरोध कभी भी अप्रत्याशित रूप से फट सकते हैं।

इस घटना के तुरंत बाद उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन विभाग ने राज्य के ग्लेशियरों और उनकी सीमाओं पर बनी झीलों की सुरक्षा समीक्षा की। उत्तराखंड ने वर्ष 2013 की केदारनाथ जलप्रलय और 2021 की चमोली ऋषिगंगा त्रासदी का गहरा दंश झेला है, जहां प्राकृतिक झीलों और हिमनदों के टूटने से भारी जन-धन की हानि हुई थी। यही कारण है कि प्रशासन अब नेपाल जैसी किसी भी पुनरावृत्ति से बचने के लिए सक्रिय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना रहा है।

13 ग्लेशियर झीलों को माना गया है संवेदनशील: 5 झीलों पर मंडरा रहा सबसे अधिक जोखिम

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) के विस्तृत जोखिम आकलन के अनुसार उत्तराखंड में स्थित 13 प्रमुख ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिह्नित किया गया है। इनमें से पांच झीलों को ‘अत्यधिक जोखिम’ (हाई-रिस्क) वाली श्रेणी में रखा गया है। किसी भी झील की संवेदनशीलता केवल उसके सतही फैलाव से तय नहीं होती, बल्कि उसके बनने की ऊंचाई, ढलान की स्थिरता, तलछट का दबाव और कमजोर मोरेन की बनावट को भी आधार बनाया जाता है।

भूवैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगभग 1,200 से अधिक छोटी-बड़ी हिमनद झीलें मौजूद हैं। इनमें से 426 झीलें ऐसी हैं जिनका क्षेत्रफल 1,000 वर्ग मीटर से अधिक है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG) के तकनीकी अध्ययनों में इन 426 बड़ी झीलों में से 25 को संवेदनशील और 6 को अत्यंत संवेदनशील पाया गया था। यदि इनमें से किसी भी झील के सामने बनी बर्फ और पत्थरों की प्राकृतिक दीवार ढहती है, तो कुछ ही मिनटों में लाखों क्यूबिक मीटर पानी नीचे की ओर दौड़ सकता है।

सरस्वती ताल और केदारताल पर टिकीं वैज्ञानिकों की निगाहें: 5,700 मीटर की ऊंचाई पर अभियान

वर्तमान में संचालित वैज्ञानिक अभियान के केंद्र में चमोली की सरस्वती ताल और उत्तरकाशी की केदारताल हैं। ये दोनों झीलें अत्यंत दुर्गम और विषम परिस्थितियों वाले हिमालयी अंचल में स्थित हैं। सरस्वती ताल समुद्र तल से लगभग 5,700 मीटर की अभूतपूर्व ऊंचाई पर स्थित है, जबकि केदारताल करीब 4,750 मीटर की ऊंचाई पर गंगोत्री ग्लेशियर के समीप मौजूद है। इतनी अधिक ऊंचाई पर ऑक्सीजन की भारी कमी, जमा देने वाली ठंड और खतरनाक खड़ी चढ़ाई के बीच वैज्ञानिक दल आधुनिक उपकरणों के साथ डेरा डाले हुए हैं।

इस वैज्ञानिक सर्वे का उद्देश्य केवल झीलों के फोटोग्राफ लेना नहीं है। विशेषज्ञ यह माप रहे हैं कि बीते कुछ वर्षों में इन झीलों के जलस्तर में कितनी वृद्धि हुई है, इनके मुहाने पर जमा मलबा कितना स्थिर है और यदि आसपास कोई हिमस्खलन (Avalanche) होता है, तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगें झील की दीवारों को कितना नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसके साथ ही डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) के माध्यम से यह गणना की जा रही है कि किसी दुर्घटना की स्थिति में बाढ़ का पानी कितनी देर में किस गांव या कस्बे तक पहुंचेगा।

क्या होता है GLOF का खतरा और यह क्यों माना जाता है इतना विनाशकारी?

वैज्ञानिक शब्दावली में इस खतरे को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील के किनारे प्राकृतिक रूप से जमे पत्थर, मिट्टी, बर्फ और गाद (Moraine Dam) अचानक अतिरिक्त जल दबाव या भूकंपीय झटके के कारण टूट जाते हैं।

जीएलओएफ की सबसे घातक बात इसकी अप्रत्याशित गति और विनाशकारी क्षमता होती है। जब अरबों लीटर पानी हजारों फीट की ऊंचाई से संकरी घाटियों में गिरता है, तो वह अपने साथ विशालकाय चट्टानों, पेड़ों और मिट्टी को बहा ले जाता है। यह बहाव किसी सामान्य बाढ़ की तुलना में दस गुना अधिक विनाशकारी कीचड़ युक्त सैलाब बन जाता है, जो रास्ते में आने वाले बड़े कंक्रीट के पुलों और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को तिनके की तरह बहा ले जाने की क्षमता रखता है। समय रहते इसकी जानकारी जुटाना ही इससे बचाव का एकमात्र वैज्ञानिक उपाय है।

बैथीमेट्री सर्वे का तकनीकी महत्व: झील की गहराई और जल घनत्व का सटीक मापन

सरस्वती ताल और केदारताल में विशेषज्ञ दल मुख्य रूप से ‘बैथीमेट्री सर्वे’ (Bathymetric Survey) का संचालन कर रहे हैं। इस उन्नत तकनीक में जलमग्न इको-साउंडर्स, सोनर डिवाइस और जीपीएस आधारित गहराई मापक यंत्रों की मदद से झील के तल (Bed) का त्रि-आयामी (3D) नक्शा तैयार किया जाता है। इससे यह सटीक जानकारी मिलती है कि झील के अलग-अलग हिस्सों में पानी की अधिकतम गहराई कितनी है और कुल जलभराव कितना है।

यह डेटा वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करता है कि क्या झील में पानी का दबाव उसकी तटवर्ती दीवारों की सहनशीलता से अधिक हो चुका है। यदि किसी झील में पानी की मात्रा सीमा से अधिक पाई जाती है, तो इंजीनियरों की मदद से कृत्रिम नालों या साइफन पाइपों के जरिए नियंत्रित तरीके से पानी की निकासी (Controlled Siphoning) कर उसके दबाव को समय रहते सुरक्षित स्तर पर लाया जा सकता है।

चार संवेदनशील झीलों का अध्ययन पहले ही पूर्ण: चरणबद्ध तरीके से जारी है मिशन

उत्तराखंड सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कार्य किसी तात्कालिक घबराहट में नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वैज्ञानिक रोडमैप के तहत किया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक 13 चिन्हित संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में से चार का विस्तृत वैज्ञानिक और भूगर्भीय सर्वे पहले ही सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है।

पूर्व में किए गए सर्वेक्षणों में चमोली जिले की वासुधारा ताल और पिथौरागढ़ सीमा पर स्थित संवेदनशील झीलों का गहन विश्लेषण किया गया था। वहां से जुटाए गए वैज्ञानिक नमूनों और आंकड़ों के आधार पर जल निकासी और सुरक्षा के आवश्यक उपाय पहले ही राज्य आपदा प्रबंधन योजना में शामिल किए जा चुके हैं। अब सरस्वती ताल और केदारताल के सर्वे के बाद शेष झीलों का अध्ययन भी चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा।

कई राष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञ जुटे: मल्टी-एजेंसी टास्क फोर्स का गठन

इस विशाल हिमालयी मिशन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देश और राज्य के शीर्ष वैज्ञानिक और सुरक्षा संस्थान मिलकर काम कर रहे हैं। इस संयुक्त अभियान में उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA), उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (ULMMC), वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG), राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH) रुड़की और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के वरिष्ठ वैज्ञानिक शामिल हैं।

तकनीकी और लॉजिस्टिकल सहायता के लिए राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) के अनुभवी पर्वतारोही और बचाव विशेषज्ञ टीमों को सुरक्षा घेरा प्रदान कर रहे हैं। इन सभी संस्थानों का साझा ज्ञान और अनुभव उच्च हिमालयी क्षेत्र के जोखिम प्रबंधन को एक मजबूत आधार प्रदान कर रहा है।

सेंसर और उपग्रह आधारित Early Warning System की स्थापना पर जोर

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं कि सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्षों को केवल फाइलों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें तुरंत जमीन पर लागू किया जाए। संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर स्वचालित मौसम स्टेशन (AWS), जलस्तर मापने वाले राडार सेंसर और उच्च क्षमता वाले नाइट-विजन कैमरे स्थापित करने की योजना पर तेजी से काम चल रहा है।

इस ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ की सबसे बड़ी खूबी यह होगी कि यदि किसी झील का जलस्तर अचानक असामान्य रूप से बढ़ता है या घटता है, तो सैटेलाइट संचार के माध्यम से तत्काल देहरादून स्थित राज्य आपदा नियंत्रण कक्ष और संबंधित जिला मुख्यालयों को ऑटोमैटिक सायरन अलर्ट चला जाएगा। इससे नदी किनारे बसे निचले गांवों, नगरों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को सुरक्षित खाली कराने के लिए बहुमूल्य समय मिल सकेगा।

Uttarakhand Alert: हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा और आपदा पूर्व तैयारी ही बचाव का मार्ग

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए हिमालयी ग्लेशियर जहां जीवनदायिनी नदियों के शाश्वत स्रोत हैं, वहीं बदलते मौसम चक्र में वे एक संभावित आपदा की चुनौती भी प्रस्तुत करते हैं। नेपाल की हालिया तबाही इस बात का कठोर संदेश है कि प्रकृति के संकेतों की अनदेखी किसी भी समाज के लिए भारी पड़ सकती है।

सरस्वती ताल और केदारताल का यह वैज्ञानिक अभियान उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन को एक नई और परिपक्व दिशा दे रहा है। वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर झीलों की निगरानी, समय पर चेतावनी और प्रशासनिक मुस्तैदी ही वह त्रिकोण है, जिसके बल पर देवभूमि के नागरिकों और यहां आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

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