DU Students Housing Reality: दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए महंगा किराया, छोटे कमरे और सुरक्षा की चिंता
DU के आसपास PG और किराये के कमरों का बढ़ता खर्च, हाइजीन व सुरक्षा को लेकर भी सवाल
DU Students Housing Reality: देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थान दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में दाखिला मिलना देश के कोने-कोने से आने वाले मेधावी युवाओं के लिए जीवन का सबसे बड़ा सपना होता है। कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं और कट-ऑफ की दौड़ जीतकर जब छात्र राजधानी पहुंचते हैं, तो उन्हें लगता है कि संघर्ष का दौर समाप्त हो चुका है। किंतु कॉलेज के दरवाजे पर कदम रखते ही उनके सामने एक ऐसी जमीनी हकीकत खड़ी होती है जो शिक्षा के उत्साह को मानसिक तनाव में बदल देती है—वह है रहने के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और बजट के अनुकूल एक अदद कमरे की तलाश।
विश्वविद्यालय के नॉर्थ और साउथ कैंपस के संघटक कॉलेजों में देश और विदेश से हर साल लाखों छात्र आते हैं, किंतु कॉलेजों के आधिकारिक हॉस्टलों में सीटों की संख्या कुल छात्रों के मुकाबले बेहद सीमित है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि 80 प्रतिशत से अधिक बाहरी छात्र निजी पेइंग गेस्ट (PG), साझा फ्लैटों और तंग किराये के मकानों के अनियंत्रित बाजार पर निर्भर होने को विवश हो जाते हैं। नॉर्थ कैंपस के विजय नगर से लेकर साउथ कैंपस के सत्य निकेतन तक छात्रों को माचिस की डिबिया जैसे कमरों के लिए मनमाना किराया, अत्यधिक ब्रोकरेज, असुरक्षित जर्जर इमारतें और दूषित खान-पान जैसी बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
DU Students Housing Reality: ‘मैचबॉक्स’ कमरों का भारी किराया और छात्रों की मजबूरी
दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस से सटे रिहायशी इलाके—विजय नगर, कमला नगर, रूप नगर, जीटीबी नगर, गुरमंडी, मलका गंज, हडसन लेन और क्रिश्चियन कॉलोनी—दशकों से छात्र बस्तियों में तब्दील हो चुके हैं। इन इलाकों की संकरी गलियों में स्थित बहुमंजिला इमारतों में बने कमरों को छात्र आम बोलचाल में ‘मैचबॉक्स’ (माचिस की डिबिया) कहते हैं। ये कमरे इतने छोटे होते हैं कि उनमें एक सिंगल बेड और एक छोटी मेज लगाने के बाद पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। इसके बावजूद भारी मांग और सीमित आपूर्ति का फायदा उठाकर मकान मालिक मनमाना किराया वसूलते हैं।
कॉलेज से दूरी बढ़ने पर दैनिक यात्रा का खर्च और दिल्ली का भारी ट्रैफिक छात्रों की पढ़ाई का समय छीन लेता है। यही कारण है कि छात्र कैंपस के दो से तीन किलोमीटर के दायरे में ही रहने को प्राथमिकता देते हैं, जो उनकी मजबूरी बन जाता है। कई छात्रों का कहना है कि वे अपने बजट को संतुलित करने के लिए इन घुटन भरे कमरों को साझा (Sharing) करने के लिए मजबूर हैं, जहां न तो वेंटिलेशन की उचित व्यवस्था होती है और न ही दिन की प्राकृतिक रोशनी पहुंचती है।
विजय नगर में ₹6 हजार से ₹25 हजार तक का गणित: शुरुआत में ही ₹60 हजार का झटका
नॉर्थ कैंपस के सबसे लोकप्रिय छात्र केंद्रों में गिने जाने वाले विजय नगर में रहने का वित्तीय बोझ किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार की कमर तोड़ने के लिए काफी है। वर्तमान बाजार दरों के अनुसार यहां सामान्य से प्रीमियम पीजी में ट्रिपल शेयरिंग के लिए प्रति छात्र 6,000 से 12,000 रुपये मासिक वसूले जाते हैं। डबल शेयरिंग का किराया 7,000 से 15,000 रुपये तक जाता है, जबकि एक छोटे से सिंगल रूम के लिए 18,000 रुपये से अधिक की मांग की जाती है। यदि इसमें भोजन, वाई-फाई और लॉन्ड्री जैसी जरूरी सुविधाएं जोड़ दी जाएं, तो एक छात्र का व्यक्तिगत मासिक खर्च 20,000 से 25,000 रुपये तक पहुंच जाता है।
परेशानी केवल मासिक किराये तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नए कमरे में प्रवेश करते समय लगने वाली एकमुश्त अग्रिम राशि छात्रों और अभिभावकों के लिए सबसे बड़ा वित्तीय झटका साबित होती है। यदि किसी कमरे का मासिक किराया 20,000 रुपये है, तो छात्र से एक महीने का किराया एडवांस, एक महीने की सुरक्षा राशि (Security Deposit) और स्थानीय प्रॉपर्टी डीलरों द्वारा 15 दिन से एक महीने का ब्रोकरेज शुल्क वसूला जाता है। इस प्रकार दाखिले के पहले ही महीने में केवल कमरे की चाबी हासिल करने के लिए 50,000 से 60,000 रुपये नकद चुकाने पड़ते हैं। छात्रों की एक आम और गंभीर शिकायत यह भी है कि सत्र समाप्त होने या कमरा खाली करते समय मकान मालिक रखरखाव और मरम्मत के मनगढ़ंत बहाने बनाकर सुरक्षा राशि वापस करने में भारी टालमटोल करते हैं।
साउथ कैंपस का हाल: सत्य निकेतन से मुनीरका तक आसमान छूती दरें
साउथ कैंपस के वेंकटेश्वर कॉलेज, मोतीलाल नेहरू कॉलेज, रामलाल आनंद और आत्माराम सनातन धर्म (ARSD) जैसे प्रमुख संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों का मुख्य ठिकाना सत्य निकेतन, साउथ मोती बाग, मुनीरका, आरके पुरम और सफदरजंग एन्क्लेव जैसे इलाके हैं। इनमें सत्य निकेतन मेट्रो स्टेशन और कॉलेजों से सीधा जुड़ा होने के कारण सबसे महंगा छात्र हॉटस्पॉट बना हुआ है।
सत्य निकेतन में एक बिस्तर (Triple Sharing) का औसत किराया 10,000 रुपये से शुरू होता है। डबल शेयरिंग के लिए छात्रों को 14,000 रुपये और सिंगल रूम के लिए 25,000 से 28,000 रुपये तक चुकाने पड़ते हैं। मोती बाग में यह दायरा 7,000 से 20,000 रुपये के बीच है, जबकि मुनीरका में थोड़ी रियायती दरों पर 5,000 से 8,000 रुपये में कमरे मिलते हैं। हालांकि इन सभी दरों में बिजली का खर्च शामिल नहीं होता। अधिकांश पीजी संचालक छात्रों से वाणिज्यिक दरों (Commercial Tariff) पर 10 से 12 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली बिल वसूलते हैं, जिससे भीषण गर्मी के महीनों में एयर कंडीशनर चलाने पर बिल ही कई हजार रुपये अतिरिक्त आ जाता है।
स्वच्छता, दूषित पानी और कीटों का आतंक: पढ़ाई के बीच बुनियादी सुविधाओं की जंग
महंगा किराया चुकाने के बावजूद छात्रों को जिस बुनियादी जीवन स्तर से जूझना पड़ता है, वह बेहद चिंताजनक है। नॉर्थ और साउथ दोनों परिसरों के पीजी में रहने वाले छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत पीने के स्वच्छ पानी की अनुपलब्धता है। कई पीजी में लगे आरओ प्यूरिफायर महीनों तक खराब पड़े रहते हैं, जिसके चलते छात्रों को अपनी जेब से 20 लीटर के पानी के जार खरीदने पड़ते हैं, जिससे मासिक खर्च में अतिरिक्त वृद्धि होती है।
कमरों में सीलन, चूहों का उपद्रव, खटमल और गंदे साझा वॉशरूम आम समस्याएं हैं। कई बार छात्रों को कॉलेज की कक्षाओं के बीच समय निकालकर खुद ही वॉशरूम की सफाई करनी पड़ती है। पीजी मेस में परोसे जाने वाले भोजन की निम्न गुणवत्ता छात्रों के स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। अत्यधिक तेल, बासी सामग्री और पोषणहीन खाने के कारण बड़ी संख्या में छात्र पेट के संक्रमण, पीलिया और फूड पॉइजनिंग के शिकार होते हैं। इस स्थिति से तंग आकर जो छात्र स्वतंत्र फ्लैट लेकर खुद खाना बनाने का विकल्प चुनते हैं, उन्हें पढ़ाई का बहुमूल्य समय छोड़कर रसोई गैस, सब्जी की खरीदारी और खाना पकाने में उलझना पड़ता है।
छात्राओं के लिए दोहरी चुनौती: सुरक्षा की चिंता और अत्यधिक प्रतिबंध
घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजधानी में पढ़ाई करने आने वाली छात्राओं के लिए आवास की समस्या कहीं अधिक संवेदनशील और जटिल हो जाती है। छात्राओं के लिए सुरक्षित माने जाने वाले महिला पीजी का किराया सामान्य पीजी की तुलना में 20 से 30 प्रतिशत अधिक होता है।
सुरक्षा के नाम पर कई पीजी संचालकों द्वारा लगाए जाने वाले अवास्तविक प्रतिबंध, जैसे शाम 7 या 8 बजे के बाद प्रवेश निषेध, छात्राओं की लाइब्रेरी अध्ययन, कॉलेज प्रोजेक्ट्स और इंटर्नशिप में भारी बाधा बनते हैं। इसके विपरीत, जहां नियम थोड़े लचीले होते हैं, वहां बुनियादी सुरक्षा मानकों—जैसे सीसीटीवी कैमरे, महिला सुरक्षा गार्ड और आपातकालीन निकास—का घोर अभाव पाया जाता है। बजट की कमी के चलते छात्राओं को अक्सर हाइजीन और सुरक्षा के साथ समझौता करने पर मजबूर होना पड़ता है।
पुरानी और अवैध इमारतों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी: सत्य निकेतन हादसे के बाद उठे सवाल
दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास के छात्र क्षेत्रों में स्थित अधिकांश इमारतें दशकों पुरानी हैं और उन्हें बिना किसी योजना या सुरक्षा मानकों के कई मंजिलों तक अवैध रूप से तान दिया गया है। 50 से 70 वर्ग गज के छोटे-छोटे भूखंडों पर पांच-पांच और छह-छह मंजिलें खड़ी कर दी गई हैं, जहां एक-एक कमरे में पार्टीशन दीवारें डालकर तीन-तीन छात्रों को ठहराया जाता है।
इन इमारतों में आग से बचाव (Fire Safety) के कोई वैध उपकरण नहीं होते, सीढ़ियां इतनी संकरी होती हैं कि किसी आपात स्थिति में दो व्यक्ति एक साथ नीचे नहीं उतर सकते और आपातकालीन निकास का कोई प्रावधान नहीं होता। हाल ही में साउथ कैंपस के सत्य निकेतन इलाके में इमारत से जुड़े गंभीर हादसे ने इस पूरे तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। इस घटना के बाद दिल्ली नगर निगम और प्रशासन द्वारा अवैध निर्माणों और गैर-मानक पीजी आवासों की सुरक्षा समीक्षा के आदेश तो दिए गए, किंतु छात्रों की सुरक्षा का स्थायी ढांचा अब भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न बना हुआ है।
हॉस्टल सीटों का भारी अभाव: निजी आवास सिंडिकेट का विस्तार
दिल्ली विश्वविद्यालय की आधिकारिक हॉस्टल प्रणाली और कुल छात्र संख्या के बीच का अंतर दशकों से बना हुआ एक संरचनात्मक संकट है। विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों और केंद्रीय हॉस्टलों को मिलाकर भी 10 से 15 प्रतिशत से अधिक छात्रों को परिसर के भीतर आवास उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।
सीटों का आवंटन अत्यंत उच्च मेरिट के आधार पर होता है, जिससे सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले मेधावी छात्र भी हॉस्टल की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। परिसर के भीतर सुरक्षित और सब्सिडी वाले छात्रावासों की इसी अनुपलब्धता ने विश्वविद्यालय के आसपास निजी पीजी और ब्रोकरों के एक अनियंत्रित और अत्यधिक मुनाफा कमाने वाले समानांतर सिंडिकेट को जन्म दिया है, जहां छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई नियामक तंत्र (Regulatory Authority) मौजूद नहीं है।
DU Students Housing Reality: छात्र आवास के लिए कड़े नियमों और नियामक बोर्ड की तत्काल आवश्यकता
दिल्ली विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा हासिल करने का सफर किसी भी युवा के बौद्धिक और व्यक्तिगत विकास का स्वर्णिम काल होना चाहिए। किंतु जब एक छात्र की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अगले महीने का किराया जुटाने, मकान मालिक के अनुचित व्यवहार से निपटने, दूषित पानी से बचने और परीक्षा के दिनों में भोजन की चिंता करने में नष्ट हो जाता है, तो यह देश की उच्च शिक्षा प्रणाली की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन और दिल्ली सरकार को संयुक्त रूप से ठोस कदम उठाने होंगे। विश्वविद्यालय परिसरों में पीपीपी (Public-Private Partnership) मॉडल पर बड़े पैमाने पर आधुनिक और किफायती छात्र छात्रावासों का निर्माण किया जाना समय की मांग है।
इसके साथ ही विश्वविद्यालय के आसपास संचालित होने वाले सभी निजी पीजी और किराये के मकानों के लिए अनिवार्य पंजीकरण, किराया नियंत्रण सीमा, अग्नि एवं संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाणन और नियमित स्वास्थ्य निरीक्षण का सख्त कानूनी ढांचा लागू होना चाहिए। जब तक छात्रों को सुरक्षित और सम्मानजनक छत नहीं मिलेगी, तब तक देश की इस प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी का अकादमिक परिवेश अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाएगा।
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