Trump OPT Fee Proposal: अमेरिका में पढ़ाई के बाद नौकरी पर 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय छात्रों, OPT और H-1B वीजा पर मंडराया बड़ा संकट, जानें पूरा मामला
अमेरिका में OPT पर 1 लाख डॉलर शुल्क के प्रस्ताव से भारतीय छात्रों, टेक कंपनियों और विश्वविद्यालयों में बढ़ी चिंता।
क्या है ओपीटी कार्यक्रम और भारतीय छात्रों के लिए इसका महत्व
अमेरिका के इमिग्रेशन कानून के तहत ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) एक ऐसी विशेष व्यवस्था है जो एफ-1 (F-1) छात्र वीजा पर अमेरिका आए विदेशी विद्यार्थियों को पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने अध्ययन क्षेत्र में काम करने का अवसर प्रदान करती है। सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों जैसे बिजनेस, आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज के छात्रों को स्नातक के बाद 1 साल तक काम करने की अनुमति मिलती है, जबकि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित यानी स्टेम (STEM) श्रेणी के छात्रों को कुल 3 साल (36 महीने) तक काम करने का अधिकार प्राप्त होता है। यह अवधि भारतीय छात्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसी दौरान वे अमेरिकी कंपनियों में व्यावहारिक अनुभव हासिल करते हैं, अपनी एजुकेशन लोन की किस्तों का भुगतान करते हैं और आगे चलकर वर्क वीजा यानी एच-1बी (H-1B) स्पॉन्सरशिप हासिल करने का प्रयास करते हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 तक लगभग 4 लाख 19 हजार से अधिक विदेशी स्नातक इस कार्यक्रम के तहत सिलिकॉन वैली और वॉल स्ट्रीट जैसी प्रमुख अमेरिकी कंपनियों में कार्यरत थे।
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, यह शुल्क लगाने की योजना अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) के भीतर विचाराधीन है। ट्रंप प्रशासन अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत कानूनी आव्रजन (Legal Immigration) और विदेशी कार्यबल की उपस्थिति को सीमित करने का प्रयास कर रहा है। इससे पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने सितंबर में एक कार्यकारी आदेश जारी कर एच-1बी (H-1B) गैर-आव्रजक वीजा पर 1 लाख डॉलर का भारी आवेदन शुल्क लगाने का फैसला सुनाया था। हालांकि, जून में मैसाचुसेट्स की एक संघीय अदालत ने और उसके बाद बोस्टन की 1स्ट यूएस सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स ने इस फैसले को असंवैधानिक और अवैध ठहराते हुए इस पर रोक लगा दी थी। अदालती झटके के बाद अब प्रशासन ने अपनी आव्रजन नियंत्रण नीति को लागू करने के लिए एच-1बी से ठीक पहले के चरण यानी ओपीटी कार्यक्रम को निशाना बनाने की रणनीति बनाई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इस 1 लाख डॉलर की भारी-भरकम फीस का भुगतान छात्र स्वयं करेंगे या फिर उन्हें रोजगार देने वाली अमेरिकी कंपनियां।
भारतीय छात्रों और उनके मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ने वाला गंभीर असर
मौजूदा समय में भारत, अमेरिका में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है, जहाँ 3 लाख 30 हजार से अधिक भारतीय छात्र विभिन्न अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत हैं। इनमें से लगभग 70 से 80 प्रतिशत छात्र स्टेम (STEM) पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं और उनकी मुख्य योजना ओपीटी के माध्यम से ही अपने करियर की शुरुआत करने की होती है। भारत में अधिकतर मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को अमेरिका भेजने के लिए अपनी जिंदगी भर की बचत लगा देते हैं, घर-जमीन गिरवी रखते हैं या भारी ब्याज दरों पर 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक का एजुकेशन लोन लेते हैं। अगर पढ़ाई खत्म होते ही काम करने का अधिकार हासिल करने के लिए अतिरिक्त 85 से 95 लाख रुपये की फीस देने का नियम बनता है, तो भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका में रहकर पढ़ाई का खर्च वसूलना लगभग असंभव हो जाएगा। इस कदम से हजारों भारतीय छात्रों के सपने चकनाचूर हो सकते हैं और वे भारी वित्तीय संकट में फंस सकते हैं।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था, विश्वविद्यालयों और सिलिकॉन वैली पर संभावित प्रभाव
यह प्रस्ताव केवल विदेशी छात्रों (Trump OPT Fee Proposal) के लिए ही नहीं, बल्कि खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और शैक्षणिक तंत्र के लिए भी एक बड़ा खतरा माना जा रहा है। अमेरिकी विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर काफी हद तक निर्भर हैं क्योंकि वे घरेलू छात्रों की तुलना में लगभग तीन से चार गुना अधिक ट्यूशन फीस चुकाते हैं, जिससे विश्वविद्यालयों के रिसर्च बजट और बुनियादी ढांचे को वित्तीय मदद मिलती है। यदि 1 लाख डॉलर की फीस के डर से विदेशी छात्र अमेरिका आने से कतराने लगे, तो कई अमेरिकी यूनिवर्सिटीज को गंभीर आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी दिग्गज टेक कंपनियां नए प्रतिभावान स्नातकों को काम पर रखने के लिए ओपीटी का ही सहारा लेती हैं। यदि कंपनियों को ओपीटी के लिए इतनी बड़ी रकम चुकानी पड़ी, तो वे विदेशी स्नातकों को नौकरी देने से पीछे हट जाएंगी, जिससे अमेरिका में नवाचार, एआई (AI) अनुसंधान और तकनीकी प्रगति की गति काफी धीमी हो सकती है।
वैश्विक प्रतिक्रिया, विशेषज्ञों की राय और वैकल्पिक देशों का रुख
प्रस्ताव की खबर बाहर आते ही दुनिया भर के शिक्षा विशेषज्ञों, आव्रजन वकीलों और छात्रों के बीच भारी असंतोष देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह फीस अनिवार्य की जाती है, तो ओपीटी कार्यक्रम का आकर्षण पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा और दुनिया भर के प्रतिभाशाली युवा अमेरिका के बजाय अन्य देशों का रुख करेंगे। कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश पहले से ही अंतरराष्ट्रीय छात्रों को पढ़ाई के बाद आसान और किफायती पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा प्रदान करते हैं। शिक्षा सलाहकारों का मानना है कि इस नीति के लागू होते ही अमेरिका के प्रति छात्रों का मोहभंग होगा और वैश्विक प्रतिभा का प्रवाह अमेरिका से हटकर अन्य विकसित देशों की ओर स्थानांतरित हो जाएगा। सोशल मीडिया पर भी कई वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों ने इसे अमेरिका के तकनीकी वर्चस्व को आत्मघाती नुकसान पहुँचाने वाला कदम करार दिया है।
कानूनी चुनौतियां और आगे का मार्ग
चूंकि यह प्रस्ताव अभी केवल डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) के भीतर आंतरिक चर्चा के स्तर पर है और ह्वाइट हाउस से इसे अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है, इसलिए तात्कालिक रूप से कोई बदलाव लागू नहीं हुआ है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ट्रंप प्रशासन इस नियम को लागू करने के लिए अंतिम अधिसूचना जारी भी करता है, तो इसे अमेरिकी अदालतों में तुरंत कड़ी चुनौती दी जाएगी। जैसा कि एच-1बी फीस मामले में देखा गया था, अमेरिकी यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स, विभिन्न राज्य सरकारें और विश्वविद्यालयों के संघ इस तरह की मनमानी फीस वृद्धि के खिलाफ अदालतों में याचिका दायर करेंगे। अदालतों द्वारा इस पर स्टे मिलने की प्रबल संभावना जताई जा रही है क्योंकि प्रशासनिक रूप से बिना कांग्रेस (संसद) की मंजूरी के इतनी भारी फीस लगाना कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन के दायरे में आता है।
निष्कर्ष और भारतीय छात्रों के लिए व्यावहारिक सलाह
अमेरिका में पढ़ाई के बाद काम करने के अधिकार पर 1 लाख डॉलर फीस का यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय शिक्षा परिदृश्य में एक बड़ा भूचाल लेकर आया है। यद्यपि यह अभी एक प्रस्तावित योजना है और इसे कानून बनने में कई प्रशासनिक व कानूनी बाधाओं को पार करना होगा, फिर भी इसने भारतीय छात्रों के मन में अनिश्चितता और डर का माहौल बना दिया है। इस परिस्थिति में अमेरिका में वर्तमान में पढ़ाई कर रहे या नए सत्र में दाखिला लेने वाले भारतीय विद्यार्थियों को घबराने के बजाय स्थिति पर सतर्कतापूर्वक नज़र रखनी चाहिए। जब तक अमेरिकी सरकार की ओर से आधिकारिक गजट अधिसूचना जारी नहीं होती, तब तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाज़ी होगी। हालांकि, भविष्य की सुरक्षा के लिए छात्रों और अभिभावकों को अपने वित्तीय संसाधनों का पुनर्मूल्यांकन करने और बैकअप के रूप में अन्य सुरक्षित देशों के विकल्पों पर भी विचार करने की आवश्यकता है।
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