Parliament Monsoon Session 2026: जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक 2026, दो साल से अधिक देरी पर अब कोर्ट की मंजूरी होगी जरूरी
लोकसभा में पेश नए विधेयक में दो वर्ष से अधिक देरी वाले मामलों के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी का प्रस्ताव।
Parliament Monsoon Session 2026: संसद के मानसून सत्र के दौरान विधायी कार्यों की गति तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की महत्वपूर्ण बैठक के साथ ही संसद के दोनों सदनों में कई जनहितकारी और प्रशासनिक सुधार से जुड़े विधेयकों पर गहन मंथन जारी है। इस सत्र में सबसे अधिक चर्चा का केंद्र ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026’ बना हुआ है, जिसे हाल ही में लोकसभा में पेश किया गया। गृह मंत्रालय की पहल पर लाया गया यह विधेयक देश में जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को अत्यधिक पारदर्शी, सुरक्षित और प्रामाणिक बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रशासनिक कदम है। सरकार का मुख्य उद्देश्य देरी से होने वाले पंजीकरणों में होने वाली धांधली, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के निर्माण पर पूरी तरह से नकेल कसना है। संसद परिसर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहे तीखे राजनीतिक विचार-विमर्श के बीच इस विधेयक के विभिन्न पहलुओं और आम जनता पर पड़ने वाले इसके असर को लेकर व्यापक बहस छिड़ चुकी है।
Parliament Monsoon Session 2026: क्या है जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक 2026 का मुख्य ढांचा
भारत में जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने के लिए मूल रूप से ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969’ लागू है। बदलती परिस्थितियों और डिजिटल दौर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में इसमें व्यापक संशोधन किए थे, जिससे एक केंद्रीकृत डेटाबेस का निर्माण संभव हो सका था। अब 2026 का यह नया संशोधन विधेयक धारा 13(3) में बदलाव करते हुए देरी से होने वाले पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने का प्रयास करता है। वर्तमान में लागू नियमों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के जन्म या मृत्यु की सूचना एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद दी जाती है, तो उसके पंजीकरण के लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM), उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) या किसी अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) का आदेश अनिवार्य होता था। परंतु नए संशोधन विधेयक में इस व्यवस्था को दो भागों में विभाजित करके अधिक कड़ा बना दिया गया है।
दो-स्तरीय सत्यापन प्रक्रिया और न्यायपालिका की बढ़ी भूमिका
प्रस्तावित कानून के तहत यदि जन्म या मृत्यु का पंजीकरण घटना घटने के एक वर्ष से दो वर्ष के भीतर कराया जाता है, तो मंजूरी की प्रक्रिया काफी हद तक पूर्ववत ही रहेगी। ऐसे मामलों में संबंधित क्षेत्राधिकार वाले जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या कार्यपालक मजिस्ट्रेट ही जांच और सत्यापन के बाद पंजीकरण की स्वीकृति देंगे। लेकिन सबसे बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव दो वर्ष से अधिक की देरी वाले मामलों में किया गया है। यदि किसी जन्म या मृत्यु की जानकारी दो वर्ष की अवधि बीत जाने के बाद दी जाती है, तो उसका पंजीकरण अब केवल ‘प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट’ (First Class Judicial Magistrate) के स्पष्ट आदेश के बाद ही संभव हो सकेगा। इसका अर्थ यह है कि अत्यधिक देरी वाले संवेदनशील मामलों में फैसला सुनाने का अधिकार कार्यपालिका यानी प्रशासनिक अधिकारियों से स्थानांतरित होकर सीधे न्यायपालिका के पास चला जाएगा, जिससे कानूनी जांच और सत्यापन का स्तर बेहद गंभीर और सख्त हो जाएगा।
विधेयक लाने के मुख्य उद्देश्य और प्रशासनिक आवश्यकता
केंद्र सरकार का मानना है कि नागरिक पंजीकरण प्रणाली (CRS) किसी भी देश की सुरक्षा, सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं और प्रामाणिक जनसांख्यिकीय डेटा का मुख्य आधार होती है। अतीत में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ लंबे समय बाद फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर अवैध रूप से नागरिकता साबित करने, संपत्ति हड़पने या सरकारी योजनाओं का अनुचित लाभ उठाने के प्रयास किए गए। जब अत्यधिक देरी से होने वाले पंजीकरणों में केवल प्रशासनिक अधिकारियों की सहमति लगती थी, तो कई बार गहन न्यायिक जांच का अभाव रह जाता था। प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास मामला जाने से शपथ पत्रों, प्रत्यक्षदर्शियों और दस्तावेजों की न्यायिक जांच अनिवार्य हो जाएगी। इसके साथ ही, इस कानून का एक बड़ा उद्देश्य देश के नागरिकों को समय पर जन्म और मृत्यु की सूचना संबंधित अधिकारियों को देने के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय डिजिटल डेटाबेस हमेशा अद्यतन और त्रुटिहीन बना रहे।
सदन में विधेयक पेश किए जाने का घटनाक्रम और विपक्ष का रुख
लोकसभा में इस विधेयक को गृह मंत्रालय की ओर से केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने पेश किया। विधेयक को पेश किए जाने के दौरान विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन में जोरदार विरोध दर्ज कराया। विपक्षी सदस्यों का रुख था कि इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले विधेयक पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की प्रत्यक्ष मौजूदगी अनिवार्य होनी चाहिए। विपक्षी नेताओं का यह भी तर्क रहा है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास मामले भेजने से ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के उन गरीब लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, जो जागरूकता की कमी या किसी पारिवारिक विपत्ति के कारण समय पर पंजीकरण नहीं करा सके थे। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए विधेयक को पटल पर रखा गया और अब इस पर आगे की विस्तृत चर्चा तथा मतदान की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
मोदी कैबिनेट की बैठक, अन्य विधेयक और संसद का माहौल
मानसून सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की (Parliament Monsoon Session 2026) अध्यक्षता में आयोजित होने वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठकों पर देश भर की निगाहें टिकी हुई हैं। कैबिनेट बैठकों में केवल विधायी प्रस्तावों ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, अवसंरचना विकास और सुरक्षा से जुड़े कई दूरगामी फैसलों पर मुहर लगाई जाती है। संसद के मौजूदा सत्र में केवल जन्म और मृत्यु पंजीकरण विधेयक ही नहीं, बल्कि अन्य कई महत्वपूर्ण विधेयक भी एजेंडे में शामिल हैं। इससे पहले प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक की घटनाओं पर रोक लगाने से संबंधित सख्त ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम’ पर भी दोनों सदनों में गहन चर्चा हो चुकी है। संसद के दोनों सदनों में जहाँ एक तरफ सरकार अपने विधायी एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष जनहित के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर सरकार को घेरने का लगातार प्रयास कर रहा है।
आम नागरिकों के जीवन और प्रक्रियाओं पर पड़ने वाला व्यावहारिक असर
इस कानून के लागू होने के बाद आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर इसका सीधा और स्पष्ट प्रभाव पड़ेगा। जो नागरिक अपने परिवार में बच्चे के जन्म या किसी सदस्य की मृत्यु की सूचना निर्धारित 21 दिनों की अवधि के भीतर या कम से कम एक वर्ष के भीतर स्थानीय निकाय या रजिस्ट्रार को दे देते हैं, उनके लिए प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं होगा। उनके प्रमाण पत्र पहले की तरह आसानी से बनते रहेंगे। पासपोर्ट बनवाने, विद्यालय या विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने, आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र अपडेट कराने तथा संपत्ति के हस्तांतरण जैसे कार्यों में जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र एक प्राथमिक और अनिवार्य कानूनी दस्तावेज होता है। जिन परिवारों में एक से दो वर्ष की देरी हुई है, उन्हें प्रशासनिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी लेनी होगी, जबकि दो वर्ष से अधिक की अत्यधिक देरी के मामलों में अदालत के माध्यम से ही दस्तावेज सत्यापित कराने होंगे। इससे यद्यपि प्रक्रिया थोड़ी लंबी हो सकती है, परंतु बने हुए प्रमाण पत्र की प्रामाणिकता पर भविष्य में कभी कोई प्रश्नचिह्न नहीं लग सकेगा।
निष्कर्ष और आगे का विधायी मार्ग
जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2026 भारत की नागरिक पंजीकरण प्रणाली को आधुनिक, अभेद्य और विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक बड़ा नीतिगत कदम है। लोकसभा में प्रस्तुत किए जाने के बाद अब इस पर विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों द्वारा अपने सुझाव और संशोधन दिए जाएंगे। लोकसभा से पारित होने के पश्चात इसे विचार और स्वीकृति के लिए राज्यसभा में भेजा जाएगा। संसद के दोनों सदनों द्वारा मंजूरी मिलने और राष्ट्रपति की अंतिम सहमति प्राप्त होने के बाद यह विधेयक कानून का रूप ले लेगा। सरकार का दावा है कि इस नए कानून से डिजिटल इंडिया के अभियान को बल मिलेगा और देश के प्रत्येक नागरिक का रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद में चर्चा के दौरान विपक्षी दलों की आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार क्या अतिरिक्त कदम या नियम जारी करती है।
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