UP Panchayat Election 2027: 2011 की जनगणना से तय होगा ग्राम प्रधान सीटों का आरक्षण, रोटेशन से बदलेंगे गांवों के सियासी समीकरण
2011 की जनगणना और रोटेशन के आधार पर तय होगा ग्राम प्रधान सीटों का नया आरक्षण
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर प्रशासनिक तैयारियां और ग्रामीण स्तर पर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। प्रदेश के 75 जिलों के गांवों में इस समय चर्चा का सबसे बड़ा और संवेदनशील विषय ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पदों का आरक्षण निर्धारण बन चुका है। पंचायती राज विभाग की ओर से स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि आगामी त्रिस्तरीय पंचायत सामान्य चुनाव में सीटों और पदों के आरक्षण का निर्धारण आधिकारिक रूप से वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही किया जाएगा। शासन के इस निर्णय और चक्रानुक्रम (रोटेशन) प्रणाली के सख्त अनुपालन के चलते प्रदेश के हजारों गांवों के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों में व्यापक फेरबदल देखने को मिलेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले चुनावों की आरक्षण स्थिति और वर्तमान सामाजिक संरचना के बीच सामंजस्य बैठाते हुए आरक्षण का नया ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है। चक्रानुक्रम व्यवस्था के लागू होने से कई दशकों से एक ही वर्ग या परिवार के प्रभाव में रही ग्राम पंचायतों की सीटें आरक्षित श्रेणी में परिवर्तित हो सकती हैं, जबकि पहले से आरक्षित कई सीटें सामान्य वर्ग के लिए खुल सकती हैं। इस संभावित प्रशासनिक बदलाव ने वर्तमान ग्राम प्रधानों, पूर्व प्रधानों और प्रधानी के नए दावेदारों के बीच भारी हलचल पैदा कर दी है।
2011 की जनगणना के आंकड़े ही बनेंगे आरक्षण निर्धारण का वैधानिक आधार
उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम और आरक्षण नियमावली के वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, किसी भी स्थानीय निकाय या पंचायत चुनाव में आरक्षण की गणना के लिए अंतिम प्रकाशित और आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करना अनिवार्य होता है। यद्यपि वर्ष 2011 के बाद से पिछले डेढ़ दशक के दौरान ग्रामीण आबादी में भारी वृद्धि हुई है और प्रवासन व नए बसावों के कारण गांवों का सामाजिक ढांचा भी बदला है, तथापि वैधानिक रूप से नई जनगणना उपलब्ध न होने के कारण वर्ष 2011 की जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों को ही मानक माना जाएगा।
इस व्यवस्था के तहत प्रत्येक विकासखंड और जनपद स्तर पर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की उस समय दर्ज जनसंख्या के अनुपात के आधार पर आरक्षित ग्राम पंचायतों की कुल संख्या निर्धारित की जाएगी। जिलों में कुल ग्राम पंचायतों के सापेक्ष आरक्षित पदों का कोटा तय होने के बाद, संबंधित वर्ग की जनसंख्या के घटते क्रम (डिसेंडिंग ऑर्डर) में ग्राम पंचायतों को आवंटित किया जाएगा। वर्तमान में प्रदेश में परिसीमन और नगरीय निकायों में सीमा विस्तार के बाद लगभग 57,695 ग्राम पंचायतें अस्तित्व में हैं, जहां नए सिरे से आबादी के अनुपात की गणना कर आरक्षण की सूची तैयार की जाएगी।
चक्रानुक्रम (रोटेशन) प्रणाली का सख्त नियम और वर्तमान प्रधानों की चिंताएं
पंचायती राज व्यवस्था में रोटेशन प्रणाली का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक जाति, वर्ग या व्यक्ति का किसी विशेष ग्राम पंचायत पर स्थायी एकाधिकार स्थापित न हो सके। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन की मूल भावना के अनुरूप, प्रत्येक चुनाव चक्र में सीटों की श्रेणी को बदला जाता है ताकि समाज के प्रत्येक वर्ग—विशेष रूप से वंचितों और महिलाओं—को स्थानीय स्वशासन में समान प्रतिनिधित्व और नेतृत्व का अवसर मिल सके।
इसी रोटेशन नियम के कारण वर्ष 2021 के पिछले पंचायत चुनाव में जो सीटें अनारक्षित (सामान्य) थीं, वे आगामी चुनाव में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग या पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित हो सकती हैं। इसके विपरीत जो सीटें पहले आरक्षित थीं, वे सामान्य श्रेणी में आ सकती हैं। यदि किसी गांव की सीट सामान्य से बदलकर अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हो जाती है, तो वर्तमान सामान्य वर्ग का ग्राम प्रधान स्वतः ही चुनाव लड़ने की दौड़ से बाहर हो जाएगा। यही कारण है कि अधिकांश वर्तमान जनप्रतिनिधि और भावी प्रत्याशी अपनी भावी रणनीति तय करने से पहले आरक्षण के अंतिम ड्राफ्ट का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण कोटा और त्रिस्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश की त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों और वैधानिक नियमों के तहत आरक्षण प्रदान किया जाता है। नियमानुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलाकर कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की विधिक सीमा से अधिक नहीं हो सकता है।
पंचायती राज विभाग ने आरक्षण प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी, त्रुटिहीन और तथ्यपरक बनाने के लिए प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों से ग्राम पंचायतवार विस्तृत डेटा जुटाने के निर्देश दिए हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्राम पंचायत की 2011 की कुल जनसंख्या, उसमें विभिन्न वर्गों की आबादी, प्रतिशत, ग्राम पंचायतों के वार्डों की संख्या तथा वर्ष 1995 से लेकर अब तक की पूर्ववर्ती आरक्षण स्थितियों का संपूर्ण ब्यौरा तैयार किया जा रहा है। इस ऐतिहासिक और सांख्यिकीय डेटा के आधार पर ही विकासखंडवार आरक्षण का रोस्टर तैयार किया जाएगा ताकि किसी भी प्रकार के कानूनी विवाद की गुंजाइश न रहे।
महिला आरक्षण का 33 प्रतिशत अनिवार्य कोटा और उभरता नया नेतृत्व
पंचायती राज अधिनियम के तहत स्थानीय निकायों और पंचायतों में महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई यानी 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। यह महिला आरक्षण केवल सामान्य श्रेणी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की आरक्षित सीटों के भीतर भी क्षैतिज (हॉरिजॉन्टल) रूप से लागू होता है।
इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप यदि किसी गांव की सीट पिछड़ा वर्ग (पुरुष/ओपन) से बदलकर पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित हो जाती है, तो वर्तमान पुरुष प्रधान चुनाव नहीं लड़ सकेंगे और उन्हें अपने परिवार की किसी महिला सदस्य को आगे करना होगा या फिर नए महिला चेहरों को मौका मिलेगा। इसी प्रकार पूर्व में महिला के लिए आरक्षित रही सीटें इस बार पुरुषों के लिए मुक्त हो सकती हैं। महिला आरक्षण के इस चक्रीय परिवर्तन ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में महिला सशक्तिकरण और नए महिला नेतृत्व के उभार को एक नई गति प्रदान की है।
आबादी का प्रतिशत और आरक्षण निर्धारण का वास्तविक गणित
ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर यह भ्रांति पाई जाती है कि जिस गांव में किसी विशेष जाति या वर्ग की आबादी सबसे अधिक होती है, वह गांव हमेशा उसी वर्ग के लिए आरक्षित रहेगा। पंचायती राज विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि केवल किसी एक गांव की आबादी अधिक होना आरक्षण की गारंटी नहीं होता। आरक्षण का निर्धारण पूरे विकासखंड और जिले की कुल ग्राम पंचायतों की संख्या, उस विकासखंड में संबंधित वर्ग की कुल आबादी के प्रतिशत और पिछले चुनावों में लागू रहे रोटेशन इतिहास के संयुक्त मूल्यांकन से तय होता है।
आरक्षण की गणना करते समय सबसे पहले अनुसूचित जनजाति, उसके बाद अनुसूचित जाति और फिर अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अवरोही क्रम में सीटें आरक्षित की जाती हैं। इसके पश्चात महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का चक्रानुक्रम पूरा किया जाता है और शेष बची हुई सीटों को अनारक्षित (सामान्य) घोषित किया जाता है। विकासखंड स्तर पर तैयार इस सूची का प्रारंभिक प्रकाशन कर ग्रामीणों से दावे और आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं, जिनके निस्तारण के बाद ही अंतिम गजट जारी होता है।
ग्रामीण उत्तर प्रदेश में बदलते सियासी समीकरण और आगामी रणनीति
आरक्षण की नई सूची जारी होने के साथ ही प्रदेश के गांवों में दशकों से चली आ रही चौपाल राजनीति और गुटीय समीकरणों में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा। जिन ग्राम पंचायतों में लंबे समय से किसी एक प्रभावशाली परिवार या जाति का दबदबा रहा है, वहां श्रेणी परिवर्तन के बाद नए सामाजिक समूहों को अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने का अवसर प्राप्त होगा।
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को राज्य की मुख्यधारा की राजनीति और आगामी विधानसभा चुनावों की धरातलीय तैयारी के रूप में देखा जाता है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल—चाहे वे सत्ताधारी दल हों या विपक्षी दल—पंचायत स्तर पर अपने समर्थित कार्यकर्ताओं को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंकते हैं ताकि जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के पदों पर अपना परचम लहराया जा सके। आरक्षण रोस्टर का यह नया चक्र न केवल ग्राम स्तर पर नए चेहरों को स्थापित करेगा, बल्कि राज्य के ग्रामीण लोकतंत्र को और अधिक समावेशी, सशक्त और जवाबदेह बनाने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाएगा।
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