इमली के बीजों से माइक्रोप्लास्टिक छानने का अनूठा तरीका: तीन भारतीय स्कूली छात्रों का कमाल, अर्थ प्राइज 2026 में बने एशिया के विजेता, IIT गुवाहाटी ने भी सराहा
तीन भारतीय छात्रों की खोज को Earth Prize 2026 में एशिया विजेता का सम्मान मिला।
IIT Guwahati: भारत के तीन 16 वर्षीय स्कूली छात्रों ने एक साधारण रसोई के कचरे को क्रांतिकारी वैज्ञानिक समाधान में बदलकर दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। मुंबई के अव्याना मेहता, एरियाना अग्रवाल और विवान छावछरिया नामक इन प्रतिभावान छात्रों ने इमली के फेंके जाने वाले बीजों का उपयोग करके पीने के पानी से अदृश्य और घातक माइक्रोप्लास्टिक कणों को पूरी तरह अलग करने की एक बेहद किफायती और प्राकृतिक तकनीक विकसित की है। उनके इस अभूतपूर्व इनोवेशन को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित ‘द अर्थ प्राइज 2026’ (The Earth Prize 2026) में एशिया महाद्वीप के विजेता के रूप में सम्मानित किया गया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने भी इस देसी तकनीक की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हुए इसकी सराहना की है।
एक ग्रामीण दृश्य से मिली प्रेरणा और वैज्ञानिक सोच की शुरुआत
इस शोध की नींव एक बेहद सामान्य लेकिन झकझोर देने वाली घटना से पड़ी। जब ये तीनों छात्र सामाजिक कार्य के सिलसिले में राजस्थान के एक ग्रामीण क्षेत्र के दौरे पर गए, तो उन्होंने वहां के एक स्कूल में बच्चे को मटके से सीधा पानी पीते देखा। वे जानते थे कि उस अदूषित दिखने वाले पानी में घातक माइक्रोप्लास्टिक कण हो सकते हैं जिनके बारे में उन ग्रामीणों और बच्चों को कोई जानकारी नहीं थी। इस घटना ने तीनों को यह अहसास कराया कि किताबों में पढ़ा जाने वाला पर्यावरण विज्ञान केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका उपयोग ज़मीनी स्तर पर साफ पानी की समस्या को सुलझाने में होना चाहिए।
माइक्रोप्लास्टिक पानी में घुले बेहद सूक्ष्म (5 मिलीमीटर से भी छोटे) प्लास्टिक के कण होते हैं जो नदियों, तालाबों और भूजल में मिलकर मानव शरीर के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं। इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए जहां विकसित देश महंगी मशीनों और रसायनों का सहारा ले रहे हैं, वहीं इन छात्रों ने प्राकृतिक बायो-फ्लोकुलेंट (Bio-flocculant) के रूप में इमली के बीजों को चुना।
‘प्लास-स्टिक’ तकनीक और चुंबक की मदद से पानी की सफाई
तीनों छात्रों ने महीनों के कठिन परिश्रम और कई असफल प्रयोगों के बाद इमली के बीजों को सुखाकर और पीसकर एक विशेष पाउडर तैयार किया, जिसे उन्होंने ‘प्लास-स्टिक’ (Plas-stick) नाम दिया। जब इस पाउडर को माइक्रोप्लास्टिक युक्त पानी में मिलाया जाता है, तो इमली के बीजों में मौजूद प्राकृतिक पॉलीसेकेराइड्स पानी में तैर रहे अदृश्य प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों को आकर्षित करके उन्हें आपस में जोड़ देते हैं और बड़े गुच्छे (Flocs) बना देते हैं।
इसके बाद, पाउडर में मिलाए गए एक चुंबक-संवेदी घटक के कारण पूरे माइक्रोप्लास्टिक गुच्छे को एक साधारण चुंबक (Magnet) की मदद से पानी से आसानी से बाहर खींच लिया जाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से रसायन-मुक्त, पर्यावरण के अनुकूल और लागत में बेहद सस्ती है। जब यह प्रयोग शुरुआती दौर में अटकने लगा था, तब छात्रों ने आईआईटी गुवाहाटी के विशेषज्ञों से मार्गदर्शन मांगा। आईआईटी के वैज्ञानिकों द्वारा मिले सुझावों ने इस प्रयोग को एक लैब मॉडल से वास्तविक और प्रभावी तकनीक में बदल दिया।
राजस्थान के झुंझुनू और चूरू से शुरू हुआ जन-जागरूकता अभियान
अव्याना, एरियाना और विवान केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने इस तकनीक को सबसे पहले उन लोगों तक पहुंचाने का फैसला किया जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। वे राजस्थान के झुंझुनू और चूरू जैसे जिलों के दूरदराज गांवों में पहुंचे, वहां के स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों और स्कूल प्रशासनों से मुलाकात की और छात्रों तथा ग्रामीणों के सामने सीधे पानी से माइक्रोप्लास्टिक साफ करके दिखाया।
वर्तमान में लगभग 8,000 से अधिक छात्र और शिक्षक उनके इस अभियान से जुड़ चुके हैं और अपने दैनिक जीवन में पानी को स्वच्छ बनाने के इस तरीके को अपना रहे हैं। अर्थ प्राइज 2026 के तहत एशिया के विजेता बनने पर इन छात्रों को 12,500 अमेरिकी डॉलर (लगभग 10 लाख रुपये) का पुरस्कार मिला है। इस इनामी राशि का उपयोग वे कोई व्यक्तिगत जश्न मनाने के बजाय अपने इस अभियान को और विस्तार देने के लिए कर रहे हैं। उनका लक्ष्य वर्ष 2026 के अंत तक राजस्थान और भारत के अन्य राज्यों के 40,000 से अधिक लोगों तक साफ और सुरक्षित पेयजल पहुंचाना है।
वैश्विक माइक्रोप्लास्टिक समस्या और इस खोज का महत्व
वर्तमान समय में माइक्रोप्लास्टिक एक वैश्विक आपदा का रूप ले चुका है। समुद्रों, नदियों से लेकर बोतल बंद पानी और नल के पानी तक में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है। पारंपरिक जल शोधन प्रणाली (RO या साधारण फिल्टर) माइक्रोप्लास्टिक के सभी सूक्ष्म कणों को छानने में पूरी तरह सक्षम नहीं होते। महंगे रिवर्स ऑस्मोसिस प्लांट हर ग्रामीण इलाके में लगाना संभव नहीं है।
ऐसे में इमली के बीजों जैसी आसानी से उपलब्ध सामग्री से बना यह देसी समाधान एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में, जहां बजट और संसाधनों की कमी होती है, यह तकनीक बिना किसी बिजली या जटिल मशीनरी के पानी को पीने योग्य बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
IIT Guwahati: युवा नवाचार और भारत के लिए गर्व का क्षण
इन तीन 16 वर्षीय छात्रों की उपलब्धि यह साबित करती है कि नवाचार और जनहित के इरादों के लिए उम्र कोई बाधा नहीं है। पढ़ाई के भारी दबाव के बीच सामाजिक और वैज्ञानिक जिम्मेदारी का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना देश भर के करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। अंतरराष्ट्रीय मंच अर्थ प्राइज में भारत का नाम रोशन करने के साथ-साथ उन्होंने यह भी दिखाया है कि हमारी पारंपरिक और प्राकृतिक सामग्री में आधुनिक समस्याओं के समाधान छिपे हुए हैं।
आईआईटी गुवाहाटी का प्रोत्साहन और वैश्विक मान्यता यह सुनिश्चित करती है कि ‘प्लास-स्टिक’ को भविष्य में बड़े पैमाने पर औद्योगिक या सामुदायिक स्तर पर लागू किया जा सकेगा। यह प्रयास न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह कचरा प्रबंधन (Waste to Wealth) का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।
भविष्य का रोडमैप और व्यापक प्रभाव
तीनों छात्रों का अगला कदम इस प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग मॉडल में तब्दील करना है ताकि ‘प्लास-स्टिक’ पाउडर की छोटी-छोटी पुड़िया (Sachets) बनाकर ग्रामीण परिवारों में बांटी जा सकें। वे स्थानीय निकायों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और शिक्षा विभागों के साथ मिलकर इसे स्कूलों के मिड-डे मील और जल आपूर्ति प्रणाली का हिस्सा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
यह कहानी यह संदेश (IIT Guwahati) देती है कि यदि सही सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समाज सेवा का भाव एक साथ मिल जाए, तो रसोई का कचरा भी लाखों जिंदगियों को नया जीवन और साफ पानी दे सकता है। अव्याना, एरियाना और विवान की यह पहल भारत के उज्ज्वल और आत्मनिर्भर वैज्ञानिक भविष्य की एक शानदार झलक है।
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