Sawan Somwar: भगवान शिव पर भूलकर भी न चढ़ाएं ये 6 चीजें, जानें वर्जित वस्तुओं के पीछे का शास्त्रीय और पौराणिक कारण
शिव पूजा में वर्जित 6 वस्तुएं और उनके पीछे छिपे शास्त्रीय व पौराणिक कारण जानें
Sawan Somwar: सनातन धर्म में श्रावण (सावन) का महीना देवाधिदेव महादेव की भक्ति और आराधना के लिए सबसे उत्तम और फलदायी माना जाता है। इस पावन महीने में श्रद्धालु शिवालयों में उमड़ते हैं, व्रत रखते हैं, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हैं। मान्यता है कि सावन में सच्ची निष्ठा से की गई पूजा से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। यद्यपि भोलेनाथ को अत्यंत दयालु और आशुतोष माना जाता है, जो केवल एक लोटा जल से भी संतुष्ट हो जाते हैं, परंतु शास्त्रों और शिवपुराण में कुछ ऐसी वस्तुओं का उल्लेख किया गया है जिन्हें शिवलिंग पर अर्पित करना पूरी तरह से वर्जित है। अनजाने में भी इन निषिद्ध वस्तुओं को चढ़ाने से पूजा अधूरी मानी जाती है। वर्ष 2026 में सावन का पहला सोमवार 3 अगस्त को पड़ रहा है, ऐसे में इन धार्मिक नियमों को जानना हर शिवभक्त के लिए बेहद आवश्यक हो जाता है।
तुलसी के पत्ते चढ़ाने की मनाही और इसके पीछे की कथा
भगवान शिव की पूजा में तुलसी के पत्तों का प्रयोग वर्जित माना गया है। इसके पीछे शिवपुराण में वर्णित एक प्रमुख पौराणिक कथा है। पूर्वजन्म में माता तुलसी का नाम वृंदा था और उनके पति दैत्यराज जलंधर थे। जलंधर के अत्याचारों का अंत करने के लिए भगवान शिव को उनका वध करना पड़ा था। पति की मृत्यु से दुखी और क्रोधित होकर वृंदा ने त्याग का संकल्प लिया और उनकी पूजा में तुलसी के प्रयोग को वर्जित माना गया।
तुलसी को भगवान विष्णु की परम प्रिय (विष्णुप्रिया) माना जाता है और वे मुख्य रूप से श्री हरि की पूजा में ही अर्पित की जाती हैं। शिवलिंग पर तुलसी के पत्ते चढ़ाने से शिव पूजा का पूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं होता। इसलिए शिवभक्तों को पूजा के दौरान तुलसी के स्थान पर केवल ताजे और स्वच्छ बेलपत्र का उपयोग करना चाहिए, जो महादेव को अति प्रिय हैं।
शिवलिंग पर हल्दी अर्पित न करने का शास्त्रीय कारण
हल्दी का उपयोग हिंदू धर्म में मुख्य रूप से सौंदर्य, मांगलिक कार्यों और स्त्रियों के सौभाग्य वृद्धि से जुड़े अनुष्ठानों में किया जाता है। हल्दी को स्त्री तत्व से संबंधित माना गया है। इसके विपरीत, भगवान शिव पुरुष तत्व, वैराग्य और महायोगी स्वरूप के प्रतीक हैं। वे भस्म धारण करने वाले वैरागी देव हैं।
इसी कारण से शिवलिंग पर हल्दी चढ़ाना शास्त्रों के अनुसार वर्जित बताया गया है। यद्यपि कई श्रद्धालु जानकारी के अभाव में हल्दी चढ़ा देते हैं, परंतु धार्मिक दृष्टि से यह अनुचित है। भगवान शिव के जलाभिषेक और श्रृंगार के लिए हल्दी के स्थान पर सफेद चंदन, भस्म या रोली का प्रयोग करना ही शास्त्र सम्मत और शुभ माना जाता है।
केतकी और केवड़ा के फूल क्यों माने गए हैं निषिद्ध
केतकी और केवड़ा के फूल अत्यंत सुगंधित होने के बावजूद भगवान शिव की पूजा में पूरी तरह से निषिद्ध हैं। शिवपुराण के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। उस समय भगवान शिव एक विशाल ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने असत्य बोलते हुए दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का अंत ढूंढ लिया है और केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी के इस असत्य कथन में उनका साथ दिया।
इस असत्य साक्ष्य से क्रोधित होकर महादेव ने केतकी के फूल को श्राप दिया कि उसे कभी भी उनकी पूजा में स्वीकार नहीं किया जाएगा। यही कारण है कि केतकी और केवड़ा के फूल शिवलिंग पर नहीं चढ़ाए जाते। इनकी जगह मंदार (आक), धतूरा, कनेर और शमी के पुष्प अर्पित करना श्रेष्ठ माना जाता है।
नारियल पानी से अभिषेक न करने का नियम
शिव पूजन में साबुत नारियल तो चढ़ाया जा सकता है, परंतु नारियल के पानी से शिवलिंग का अभिषेक करना सख्त वर्जित माना गया है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि शिवलिंग पर अर्पित की गई कोई भी वस्तु ‘निर्माल्य’ हो जाती है, अर्थात उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण नहीं किया जाता। दूसरी ओर, नारियल का पानी पवित्र पेय माना जाता है जिसे पूजा के बाद ग्रहण किया जाना अनिवार्य होता है।
क्योंकि शिवलिंग पर चढ़े नारियल पानी को ग्रहण करना वर्जित हो जाता है, इसीलिए इसे अभिषेक में प्रयोग नहीं किया जाता। जल, गंगाजल, कच्चा गाय का दूध, दही, शहद और शक्कर (पंचामृत) से ही शिवलिंग का अभिषेक करना उचित और फलदायी होता है।
शंख से जल न चढ़ाने और शंख न बजाने का रहस्य
सामान्यतः हिंदू पूजा-पद्धति में शंख का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, परंतु शिव पूजा में न तो शंख बजाया जाता है और न ही शंख से जल चढ़ाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, दैत्य शंखचूड़ का अत्याचार जब बहुत बढ़ गया था, तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उसका वध किया था। शंख को उसी दैत्य की अस्थियों से उत्पन्न माना जाता है।
इसी कारण से शंख का स्पर्श शिव पूजा में वर्जित किया गया है। यद्यपि कई मंदिरों में संध्या आरती के समय शंख बजाया जाता है, परंतु शास्त्रीय विधान के अनुसार शिवजी को जल अर्पित करने के लिए केवल तांबे, पीतल या चांदी के पात्र का ही उपयोग किया जाना चाहिए।
Sawan Somwar: खंडित बेलपत्र न चढ़ाने की ताकीद
बेलपत्र को भगवान शिव का हृदय माना गया है। शिवलिंग पर हमेशा ताजे, स्वच्छ और बिना कटे-फटे (अखंडित) तीन पत्तियों वाले बेलपत्र ही चढ़ाने चाहिए। कीड़े लगे हुए, सूखे या टूटे हुए बेलपत्र अर्पित करने से पूजा का शुभ फल घट जाता है।
बेलपत्र की तीन पत्तियां त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और शिव जी के तीन नेत्रों का प्रतीक मानी जाती हैं। यदि किसी कारणवश ताजा बेलपत्र उपलब्ध न हो, तो चढ़े हुए बेलपत्र को धोकर पुनः अर्पित किया जा सकता है, परंतु खंडित बेलपत्र कभी नहीं चढ़ाना चाहिए।
भगवान शिव को कौन-कौन सी वस्तुएं अति प्रिय हैं
शिव पूजा में शुद्ध जल या गंगाजल से अभिषेक करना सबसे उत्तम फल देता है। इसके साथ ही गाय का कच्चा दूध, दही, घी, शक्कर और शहद मिलाकर बनाया गया पंचामृत अर्पित करें। तीन पत्तियों वाला अखंडित बेलपत्र, धतूरा, भांग की पत्तियां और मंदार के सफेद फूल महादेव को अत्यंत प्रिय हैं।
त्रिपुंड लगाने के लिए सफेद चंदन और भस्म का उपयोग करें। ये सभी सामग्रियां शास्त्रों में वर्णित हैं और इनके अर्पण से भगवान शिव अपने भक्तों पर तुरंत प्रसन्न होकर कृपा बरसाते हैं।
सावन में सही पूजा विधि और ध्यान रखने योग्य बातें
सावन मास में विधि-विधान से की गई पूजा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। 3 अगस्त 2026 को सावन के पहले सोमवार के दिन प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें। पूजन के समय मन में सकारात्मक विचार रखें और ॐ नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते रहें।
अनजाने में हुई किसी भी भूल-चूक (Sawan Somwar) के लिए पूजा के अंत में भगवान शिव से क्षमा प्रार्थना अवश्य करें। सही शास्त्रीय नियमों का पालन करके की गई शिव आराधना से जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि का वास होता है।
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