India-China border trade: लिपुलेख और नाथू ला दर्रे से 6 साल बाद फिर खुला कारोबार, जानें दोनों देशों के लिए इसके मायने

लिपुलेख और नाथू ला दर्रे से व्यापार बहाल, सीमावर्ती अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया जीवन

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India-China border trade: भारत और पड़ोसी देश चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों और सीमावर्ती अर्थव्यवस्था को नई संजीवनी देने वाला एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। दोनों देशों के बीच सीमापार व्यापार आज यानी 1 अगस्त 2026 से औपचारिक रूप से एक बार फिर शुरू हो गया है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित ऐतिहासिक लिपुलेख दर्रे और सिक्किम में स्थित नाथू ला दर्रे के रास्ते यह कारोबार पूरे छह साल के लंबे इंतजार के बाद फिर से बहाल किया जा रहा है। साल 2020 में दुनिया भर में फैले वैश्विक महामारी कोविड-19 के प्रकोप और उसके बाद गलवान घाटी में उत्पन्न सैन्य तनाव के चलते इन सीमाओं से व्यापार और आवाजाही को पूरी तरह रोक दिया गया था। छह वर्षों बाद इन रणनीतिक और पारंपरिक मार्गों का दोबारा खुलना दोनों देशों के बीच कूटनीतिक विश्वास बहाली की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

इस फैसले से उत्तराखंड और सिक्किम के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले व्यापारियों, स्थानीय समुदायों और भोंतिया जनजाति के लोगों को बहुत बड़ी आर्थिक राहत मिलने वाली है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी प्रशासनिक बैठकों, कूटनीतिक वार्ताओं और सुरक्षा आकलन के बाद ही इन दोनों प्रमुख दर्रों को खोलने पर सहमति बनी है। यह न केवल स्थानीय बाजार को पुनर्जीवित करेगा बल्कि सीमा क्षेत्र में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने में भी अहम भूमिका निभाएगा।

छह वर्षों का लंबा अंतराल और ऐतिहासिक दर्रों का महत्व

वर्ष 2020 में फैली महामारी के बाद सुरक्षा और स्वास्थ्य कारणों से सीमापार व्यापार और प्रसिद्ध कैलाश मानसरोवर यात्रा को निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद सीमा पर बने संवेदनशील हालात के कारण यह व्यापार लगातार ठप पड़ा रहा। अब कूटनीतिक स्तर पर बनी समझ के बाद लिपुलेख और नाथू ला दोनों ही मार्गों से व्यापारिक गतिविधियों की दोबारा शुरुआत की गई है।

इतिहास पर नजर डालें तो सिक्किम स्थित नाथू ला दर्रे से भारत-चीन सीमा व्यापार 1962 के युद्ध के बाद 44 वर्षों तक पूरी तरह बंद रहा था, जिसे 6 जुलाई 2006 को दोबारा शुरू किया गया था। वहीं दूसरी ओर, उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से व्यापारिक गतिविधियों की शुरुआत वर्ष 1992 में हुई थी। ये दोनों दर्रे प्राचीन ‘सिल्क रूट’ (Silk Route) का अभिन्न हिस्सा रहे हैं, जहां सदियों से भारतीय और तिब्बती व्यापारी सीमाओं को पार करके वस्तुओं का आदान-प्रदान करते आ रहे थे।

लिपुलेख दर्रे से व्यापार का पहला चरण और पुरानी संपत्तियों की जांच

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की उच्च हिमालयी घाटी में स्थित लिपुलेख दर्रे से आज से औपचारिक व्यापार फिर से सक्रिय हो रहा है। पहले चरण के तहत चीनी अधिकारियों की ओर से 20 भारतीय व्यापारियों को चीन के पुरांग (तकलाकोट) शहर जाने की अनुमति दी गई है। शुरुआती प्रक्रिया में ये व्यापारी बिना किसी नए सामान के सीमा पार करेंगे। इस शुरुआती यात्रा का मुख्य उद्देश्य तकलाकोट में मौजूद पुराने व्यापारिक बुनियादी ढांचे की समीक्षा करना और वर्ष 2019 में व्यापार अचानक बंद होने के कारण वहां के किराए के गोदामों में फंसे पुराने सामान व स्टॉक की भौतिक स्थिति की जांच करना है।

भारत-चीन बॉर्डर ट्रेड एसोसिएशन ने यह नीति बनाई है कि प्रथम जत्थे में केवल उन्हीं अनुभवी व्यापारियों को भेजा जाएगा जिनकी काफी संपत्ति और वस्तुएं तकलाकोट के गोदामों में लावारिस या बंद पड़ी रह गई थीं। एसोसिएशन के अध्यक्ष जीवन सिंह रोंगकाली ने इस संबंध में स्पष्ट किया कि नया माल सीमा पार ले जाने से पहले तकलाकोट में जमा पुराने स्टॉक का हिसाब-किताब चुकता करना और उसकी गुणवत्ता की जांच करना पहली प्राथमिकता है। संपूर्ण प्रक्रिया की निगरानी बॉर्डर ट्रेड ऑर्गनाइजेशन और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी कर रहे हैं।

नाथू ला दर्रे पर मुस्तैद तैयारियां और आईटीबीपी की महिला पलटन

सिक्किम में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नाथू ला दर्रे से भी व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह से फिर शुरू हो चुकी हैं। भौगोलिक स्थिति और मौसम के कारण यह दर्रा मई से नवंबर महीने के बीच केवल छह महीनों के लिए व्यापार हेतु खोला जाता है। तय नियमों के अनुसार, प्रत्येक सप्ताह में सोमवार से गुरुवार के बीच ही सीमा पार व्यापार संचालित होगा। लंबे समय से बंद रहने और सर्दियों में होने वाली भारी बर्फबारी के कारण नाथू ला स्थित इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट (ICP) की इमारत क्षतिग्रस्त हो गई थी, जिसकी समय रहते पूरी मरम्मत कर ली गई है।

सुरक्षा के मोर्चे पर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ने नाथू ला सीमा पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए हैं। एक ऐतिहासिक पहल के रूप में इस बार सीमा सुरक्षा और व्यापारिक चेकिंग की व्यवस्था में मदद करने के लिए महिलाओं की एक पूरी सैन्य पलटन को अग्रिम मोर्चे पर तैनात किया गया है। नाथू ला मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा की शुरुआत कुछ सप्ताह पहले ही सफलता पूर्वक की जा चुकी है। एक सामान्य व्यापारिक सीजन में करीब 400 स्थानीय व्यापारियों को परमिट जारी किए जाते हैं, हालांकि शुरुआत में सुरक्षा और प्रशासनिक जांच के बाद सीमित संख्या में ही पास जारी किए जा रहे हैं।

36 मंजूर वस्तुओं की अपरिवर्तित सूची के तहत होगा व्यापार

भारत और चीन के बीच यह सीमा व्यापार एक पूर्व-निर्धारित और द्विपक्षीय रूप से स्वीकृत 36 वस्तुओं की सूची के आधार पर ही संचालित किया जाएगा। इस सूची के अनुसार, भारतीय व्यापारी सीमा पार तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र में सूखे मेवे, विभिन्न भारतीय मसाले, हस्तशिल्प उत्पाद, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां, ताजे फल व सब्जियां, असम व दार्जिलिंग की चाय, कॉफी, सूती व ऊनी कंबल, चमड़े के जूते, रेडीमेड कपड़े, स्टेशनरी का सामान और पारंपरिक तांबे व पीतल के बर्तन निर्यात कर सकेंगे।

वहीं दूसरी ओर, चीन और तिब्बती पक्ष से भारत में कच्चे ऊन, पश्मीना, प्राकृतिक रेशम, हाथ से बने कालीन, पारंपरिक चीनी व तिब्बती औषधियों, खनिज नमक और बोरेक्स जैसी वस्तुओं का आयात किया जाएगा। यह स्वीकृत सूची मुख्य रूप से सीमावर्ती स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं और छोटे पैमाने के पारंपरिक आदान-प्रदान को ध्यान में रखकर बनाई गई है। यद्यपि यह व्यापार दोनों देशों के बड़े राष्ट्रीय व्यापारिक आंकड़ों की तुलना में सीमित है, परंतु सीमावर्ती अर्थव्यवस्था के लिए यह एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा है।

भोंतिया व्यापारी समुदाय के लिए आजीविका का नया सवेरा

लिपुलेख दर्रे से होने वाले इस सीमा व्यापार पर मुख्य रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की व्यास, दारमा और चौदास घाटियों में रहने वाले भोंतिया जनजाति समुदाय का एकाधिकार रहा है। वर्ष 1962 के सीमा युद्ध से पहले भोंतिया समुदाय के पश्चिमी तिब्बत के बड़े व्यापारिक केंद्रों जैसे तकलाकोट और ज्ञानिमा मंडी के साथ सदियों पुराने पारिवारिक और आर्थिक संबंध थे। 1962 में युद्ध छिड़ने के बाद व्यापार बंद होने से इस पूरे समुदाय को भारी आर्थिक तंगी और बेदखली का सामना करना पड़ा था।

वर्ष 1992 में जब पुनः व्यापार खोला गया था, तब इस जनजातीय समुदाय को अपनी आजीविका चलाने का स्थायी जरिया मिला था। लेकिन 2019 के बाद जब अचानक व्यापार ठप पड़ा, तो कई परिवारों की जमा पूंजी तकलाकोट में ही फंस गई थी। आज से शुरू हुआ यह व्यापारिक सत्र उनके लिए आर्थिक पुनरुद्धार और पुराने नुकसान की भरपाई करने का एक बेहतरीन अवसर लेकर आया है। स्थानीय जिला प्रशासन और व्यापारी संघ मिलकर सीमा पार की कागजी और सुरक्षा संबंधी कागजी कार्रवाई को आसान बनाने में जुटे हैं।

India-China border trade: कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तालमेल

सीमापार आवाजाही और व्यापार फिर से शुरू होने के साथ ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने सीमा सुरक्षा व्यवस्था को अत्यंत अभेद्य बना दिया है। नाथू ला और लिपुलेख दोनों क्षेत्रों में आईटीबीपी और सीमा सुरक्षा बलों की चौकसी बढ़ा दी गई है। महिला सुरक्षा कर्मियों की तैनाती से महिला व्यापारियों और सहायता कर्मचारियों की चेकिंग प्रक्रिया अधिक सुगम और संवेदनशील हो गई है।

धारचूला के उप-जिलाधिकारी (SDM) और व्यापार अधिकारी आशीष जोशी के अनुसार, बॉर्डर ट्रेड ऑर्गनाइजेशन और कस्टम विभाग मिलकर हर व्यापारी के पासपोर्ट, परमिट, पहचान पत्र और माल सूची की गहन जांच कर रहे हैं। भारतीय सीमा से गुजरने वाले प्रत्येक वाहन और व्यक्ति का विस्तृत ब्योरा दर्ज किया जा रहा है और चीनी समकक्षों के साथ नियमित संचार तंत्र स्थापित किया गया है ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी या अव्यवस्था से बचा जा सके।

कूटनीतिक संबंध और विश्वास बहाली की दिशा में बड़ा कदम

साल 2020 में गलवान घाटी में हुई अप्रिय घटना के बाद से भारत और चीन के सैन्य व कूटनीतिक संबंधों में काफी खटास आ गई थी। ऐसे में सीमा व्यापार का पुनः संचालन दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसियों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने और ‘विश्वास बहाली के उपायों’ (Confidence Building Measures) को लागू करने का एक बड़ा माध्यम बनकर उभरा है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा के बाद अब व्यापारिक मार्गों का खुलना यह दर्शाता है कि दोनों देश सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति, स्थिरता और सामान्य जनजीवन बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह फैसला केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक मजबूत राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश भी देता है कि बातचीत और सहयोग के माध्यम से संवेदनशील मुद्दों का समाधान निकाला जा सकता है।

India-China border trade: क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और भविष्य का खाका

सीमापार व्यापार के फिर शुरू होने से उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल और पूर्वोत्तर के सिक्किम राज्य में आर्थिक गतिविधियों में अचानक तेजी आएगी। स्थानीय कारीगरों, जड़ी-बूटी संग्राहकों, परिवहन चालकों और छोटे विक्रेताओं को नया बाजार मिलने से रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। यद्यपि कुल व्यापार का आकार सीमित है, लेकिन स्थानीय जनजातीय आबादी के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए इसका महत्व असीम है।

यह व्यापारिक सत्र (India-China border trade) आज 1 अगस्त से शुरू होकर नवंबर महीने के मध्य तक चलेगा, जिसके बाद कड़ाके की ठंड और अत्यधिक बर्फबारी के चलते यह मार्ग स्वतः बंद हो जाएंगे। शुरुआती दौर में यद्यपि सीमित परमिट दिए जा रहे हैं, परंतु यदि आगामी हफ्तों में प्रक्रिया सुगम रहती है तो व्यापारियों की संख्या और माल की मात्रा में इजाफा किया जाएगा। भारत और चीन दोनों ही इस व्यापारिक व्यवस्था को अधिक आधुनिक और पारदर्शी बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं।

आज का यह दिन भारत-चीन के पारस्परिक संबंधों के इतिहास में एक सकारात्मक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा। लंबे समय के अनिश्चितता भरे सन्नाटे के बाद सीमावर्ती घाटियों में एक बार फिर व्यापारिक चहल-पहल लौट आई है। प्रशासनिक सतर्कता और मजबूत सुरक्षा तंत्र के बीच शुरू हुआ यह व्यापार आने वाले दिनों में न केवल क्षेत्रीय विकास को गति देगा, बल्कि दोनों देशों के बीच बेहतर पड़ोसियों वाले माहौल का निर्माण करने में भी मददगार साबित होगा।

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