UNESCO World Heritage Tentative List: अंडमान के ज्वालामुखियों से सिरपुर तक, भारत के 3 स्थलों को नई पहचान
अंडमान-निकोबार के अनोखे भूगर्भीय स्थलों और छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक सिरपुर को संभावित विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने का दावा।
UNESCO World Heritage Tentative List: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अद्वितीय प्राकृतिक संपदा को वैश्विक मंच पर एक और बड़ी पहचान मिलने की उम्मीद जगी है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की विश्व धरोहर स्थलों की संभावित सूची (टेंटेटिव लिस्ट) में भारत के तीन प्रमुख स्थलों को आधिकारिक तौर पर सम्मिलित किया गया है। इनमें अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के बाराटांग स्थित दुर्लभ चूना पत्थर की गुफाएं व मड वोलकेनो, इसी द्वीप समूह के सक्रिय व सुप्त ज्वालामुखीय क्षेत्र बैरन व नारकोंडम द्वीप, तथा छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक व पुरातात्विक केंद्र सिरपुर शामिल हैं। यूनेस्को की संभावित सूची में स्थान मिलना अंतिम नामांकन और स्थायी विश्व धरोहर का दर्जा हासिल करने की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक सिरपुर: प्राचीन धर्मों और स्थापत्य कला का अनुपम संगम
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में जीवनदायिनी महानिदी के तट पर बसा सिरपुर भारतीय इतिहास और पुरातत्व का अनमोल खजाना है। प्राचीन काल में ‘श्रीपुर’ के नाम से विख्यात यह नगर 5वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान दक्षिण कोशल के शरभपुरीय और सोमवंशी राजाओं के शासनकाल में कला, धर्म और व्यापार का एक प्रमुख वैश्विक केंद्र रहा है। सिरपुर की सबसे अनूठी विशेषता यहां विभिन्न धार्मिक मान्यताओं का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है। यहां हुई व्यापक पुरातात्विक खुदाइयों में शैव, वैष्णव और शाक्त संप्रदाय के मंदिरों के साथ-साथ विशाल बौद्ध विहार (मठ) और जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं मिली हैं, जो उस दौर के धार्मिक सौहार्द को दर्शाती हैं।
स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से सिरपुर में स्थित 7वीं शताब्दी का ‘लक्ष्मण मंदिर’ ईंटों से निर्मित भारत के सबसे उत्कृष्ट और प्राचीन मंदिरों में शुमार है। मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी, दशावतार के अंकन और लाल पकी ईंटों का टिकाऊ ढांचा प्राचीन भारतीय वास्तुकारों के हुनर की मिसाल पेश करता है। पुरातात्विक अन्वेषणों में यहां से प्राचीन बंदरगाह के अवशेष, सिक्के, मुहरें और विदेशी व्यापार से जुड़े साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। यूनेस्को की टेंटेटिव लिस्ट में आने से सिरपुर को वैश्विक पर्यटन पटल पर मजबूती मिलेगी और इसके संरक्षण प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन प्राप्त होगा।
अंडमान का बाराटांग द्वीप: रहस्यमयी चूना पत्थर की गुफाएं और जीवित मड वोलकेनो
प्राकृतिक श्रेणी के तहत शामिल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का बाराटांग द्वीप अपनी दुर्लभ भूगर्भीय संरचनाओं के लिए पूरे विश्व में विशेष पहचान रखता है। घने मैंग्रोव जंगलों से घिरा यह क्षेत्र चूना पत्थर (लाइमस्टोन) की गुफाओं और जीवित मड वोलकेनो यानी कीचड़ उगलने वाले मिट्टी के ज्वालामुखियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां की चूना पत्थर गुफाएं सदियों से पानी के कटाव और कार्बनिक प्रक्रियाओं के चलते स्टैलेक्टाइट्स और स्टैलेग्माइट्स की अद्भुत आकृतियों में तब्दील हो चुकी हैं, जो पर्यटकों के साथ-साथ भूवैज्ञानिकों के लिए भी कौतूहल का विषय हैं।
वहीं बाराटांग का मड वोलकेनो पारंपरिक ज्वालामुखियों से पूरी तरह भिन्न है। इसमें पिघले हुए मैग्मा या लावे के स्थान पर जमीन के गहरे आंतरिक दबाव से मीथेन गैस, पानी और चिपचिपी गीली मिट्टी बाहर निकलती है। पृथ्वी के आंतरिक भूगर्भीय बदलावों और गैस दबाव की कार्यप्रणाली को समझने के लिए बाराटांग का यह क्षेत्र वैज्ञानिकों के लिए एक जीवित प्रयोगशाला की तरह है। इस स्थल को संभावित सूची में जगह मिलने से इस संवेदनशील द्वीप पारिस्थितिकी तंत्र के स्थायी संरक्षण को बल मिलेगा।
बैरन और नारकोंडम द्वीप: भारत के एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी और दुर्लभ जैव विविधता का केंद्र
अंडमान सागर में स्थित बैरन और नारकोंडम द्वीपों को उनकी बेजोड़ ज्वालामुखीय गतिविधियों और अलग-थलग विकसित हुए नाजुक पारितंत्र के कारण संभावित सूची में शामिल किया गया है। बैरन द्वीप दक्षिण एशिया का एकमात्र पुष्ट सक्रिय ज्वालामुखी है, जहां समय-समय पर धुआं, राख और लावा निकलने का प्रामाणिक वैज्ञानिक रिकॉर्ड दर्ज है। भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव वाले सबडक्शन जोन में स्थित होने के कारण यह द्वीप प्लेट टेक्टोनिक्स और ज्वालामुखीय विज्ञान के गहन अध्ययन के लिए दुनिया भर के भू-वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, नारकोंडम द्वीप एक सुप्त (डॉरमेंट) ज्वालामुखी द्वीप है, जो घने अछूते वर्षावनों और दुर्लभ वन्यजीवों से समृद्ध है। यह द्वीप संकटग्रस्त पक्षी प्रजाति ‘नारकोंडम हॉर्नबिल’ (Aceros narcondami) का दुनिया में एकमात्र प्राकृतिक आवास है, जो इस छोटे से द्वीप के अलावा धरती पर और कहीं नहीं पाया जाता। सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए यहां आम पर्यटकों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है और केवल वैज्ञानिक शोध के लिए ही विशेष अनुमति दी जाती है। दोनों द्वीप समुद्री पारिस्थितिकी, प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ्स) और समुद्री जीवों के सुरक्षित प्रजनन केंद्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय महत्व रखते हैं।
UNESCO World Heritage Tentative List: यूनेस्को की टेंटेटिव लिस्ट क्या है और आगे की प्रक्रिया कैसे होगी पूरी
यूनेस्को की टेंटेटिव लिस्ट (संभावित सूची) किसी भी देश द्वारा प्रस्तुत की गई उन संपत्तियों की आधिकारिक इन्वेंट्री होती है, जिन्हें देश उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य (Outstanding Universal Value – OUV) से संपन्न मानता है और भविष्य में स्थायी विश्व धरोहर सूची में नामांकन के योग्य समझता है। नियमों के तहत किसी भी स्थल को अंतिम विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से पहले कम से कम एक वर्ष तक इस टेंटेटिव लिस्ट में रहना अनिवार्य होता है।
संभावित सूची में शामिल होने के बाद अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), पर्यावरण मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन मिलकर इन स्थलों का विस्तृत नॉमिनेशन डोजियर (विस्तृत प्रस्ताव पत्र) तैयार करेंगे। इसमें इन स्थलों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता, वैज्ञानिक महत्व, कानूनी सीमाएं, सुरक्षा उपाय और प्रबंधन योजनाओं का विस्तृत ब्योरा दर्ज होगा। डोजियर प्रस्तुत किए जाने के बाद यूनेस्को की विशेषज्ञ संस्थाएं—जैसे सांस्कृतिक स्थलों के लिए ‘इकोमॉस’ (ICOMOS) और प्राकृतिक स्थलों के लिए ‘आईयूसीएन’ (IUCN)—जमीनी स्तर पर इनका मूल्यांकन करेंगी। सभी तय मानकों पर खरा उतरने के बाद ही यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति की वार्षिक बैठक में इन्हें अंतिम रूप से विश्व धरोहर का आधिकारिक दर्जा प्रदान किया जाएगा।
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