Santoshi Mata Pooja Vidhi: शुक्रवार को ऐसे करें संतोषी माता की पूजा, जानें व्रत के नियम, भोग और महत्व
शुक्रवार को मां संतोषी की पूजा कैसे करें? जानें पूजा विधि, गुड़-चने का भोग, खट्टी चीजों से परहेज, 16 शुक्रवार के व्रत और उद्यापन से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।
Santoshi Mata Pooja Vidhi: सनातन धर्म की पावन परंपरा में शुक्रवार का दिन शक्ति की अधिष्ठात्री देवियों की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। इसी क्रम में संतोष, शांति, धैर्य और मनोवांछित फल प्रदान करने वाली मां संतोषी की पूजा व व्रत का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीगणेश की मानस पुत्री मां संतोषी अपने भक्तों के जीवन से समस्त क्लेश, आर्थिक अवरोध और मानसिक अशांति को दूर कर संतुष्टि का वरदान देती हैं। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा, आत्मानुशासन और शास्त्रीय नियमों के साथ शुक्रवार को माता का व्रत रखते हैं, उनके घर-परिवार में सुख-समृद्धि और आरोग्य का स्थाई वास होता है। इस व्रत की महिमा का गुणगान करते हुए शास्त्रों में बताया गया है कि संतोष ही परम सुख का मूल आधार है और मां संतोषी की कृपा से जातक को तृप्ति और आत्मबल की प्राप्ति होती है।
Santoshi Mata Pooja Vidhi: संतोषी माता के व्रत और आराधना का आध्यात्मिक रहस्य
धार्मिक और पौराणिक संदर्भों के अनुसार, मां संतोषी केवल बाह्य सुख-साधनों की ही नहीं, बल्कि आंतरिक संतुष्टि की देवी हैं। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां असंतोष और ईर्ष्या के कारण पारिवारिक तनाव बढ़ते हैं, वहीं मां संतोषी का शुक्रवार का व्रत मन को निर्मल, संयमित और शांत बनाने में सहायक सिद्ध होता है। यह व्रत विशेष रूप से स्त्रियों और कन्याओं द्वारा वैवाहिक सुख, सौभाग्य, संतान की उन्नति और परिवार की खुशहाली के लिए रखा जाता है। पूजा का मूल तत्व यही है कि मनुष्य अपने अंतःकरण से द्वेष, कटुता और असंतोष का त्याग कर मां के चरणों में पूर्ण समर्पण की भावना रखे।
संतोषी माता की प्रामाणिक पूजा विधि: कदम-दर-कदम प्रक्रिया
शुक्रवार के पावन प्रभात पर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर स्वच्छ एवं सात्विक वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी पर मां संतोषी की सुंदर प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें और उनके साथ भगवान श्रीगणेश का भी ध्यान करें। एक तांबे या पीतल के कलश में स्वच्छ जल भरकर उसमें अक्षत, दूर्वा और पुष्प डालें तथा कलश के मुख पर आम के पल्लव रखकर उस पर एक कटोरी में गुड़ और भुने हुए चने का प्रसाद रखें।
इसके उपरांत मां संतोषी के सम्मुख शुद्ध घी का एकमुखी दीपक प्रज्वलित करें और सुगंधित धूप जलाएं। देवी को कुमकुम, अक्षत, सुगंधित चंदन और लाल पुष्प या गुलाब की माला अर्पित करें। कलश के जल का छिड़काव स्वयं पर और पूजा सामग्री पर करें। इसके पश्चात हाथ में गुड़ और भुने चने लेकर संतोषी माता की पावन व्रत कथा का शांत चित्त होकर श्रवण अथवा पठन करें। कथा पूर्ण होने के पश्चात हाथ के गुड़-चने को कलश की कटोरी में अर्पित करें। अंत में मां संतोषी की कर्पूर से आरती करें और परिवार के कल्याण तथा सभी संकटों के निवारण हेतु प्रार्थना करें। पूजा के कलश के जल को घर के सभी कोनों में छिड़कें तथा शेष जल को तुलसी के पौधे में श्रद्धापूर्वक अर्पित कर दें।
व्रत का आहार और गुड़-चने के सात्विक भोग की महत्ता
मां संतोषी की पूजा में सबसे सात्विक और अनिवार्य भोग गुड़ और भुने हुए चने का माना जाता है। यह भोग अत्यंत सहज, सुलभ और पोषण से भरपूर होने के साथ-साथ अहंकार के विसर्जन का प्रतीक है, जिसमें किसी भी प्रकार के आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। पूजा के उपरांत इसी गुड़ और चने को मुख्य प्रसाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों में बांटा जाता है।
व्रती जातक को अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास का पालन करना चाहिए। जो लोग निर्जला या केवल फलाहार पर व्रत रखते हैं, वे मौसमी फल, दूध अथवा साबूदाने से बनी सात्विक सामग्री ग्रहण कर सकते हैं। वहीं जो लोग एक समय भोजन करते हैं, वे शाम की आरती के पश्चात बिना नमक और बिना खटाई का सात्विक भोजन ले सकते हैं। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और अस्वस्थ व्यक्तियों को कठोर उपवास से बचना चाहिए और केवल फलाहार के माध्यम से ही व्रत का संकल्प पूरा करना चाहिए।
खट्टी चीजों से परहेज का कड़ा नियम: क्यों है निषेध?
संतोषी माता के शुक्रवार व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य नियम यह है कि इस दिन व्रती को किसी भी प्रकार की खट्टी वस्तु का न तो सेवन करना चाहिए और न ही उसे हाथ लगाना चाहिए। नींबू, इमली, कच्चा आम, दही, छाछ, टमाटर, सिरका और सभी प्रकार के खट्टे फलों तथा आचार से पूरी तरह परहेज किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में खट्टे रस को प्रतीकात्मक रूप से कटुता, उग्रता और असंतोष का कारक माना जाता है, जबकि मीठा रस मधुरता, शांति और सौहार्द का प्रतीक है। इसलिए इस व्रत में खटास का त्याग कर जीवन में मिठास और संतोष को अपनाने का संकल्प लिया जाता है। कई परिवारों में यह नियम पूरे घर के सदस्यों पर भी लागू किया जाता है कि उस दिन रसोई में कोई भी खट्टी चीज न बने और न ही बाजार से खरीदी जाए। यदि भूलवश भी किसी खट्टी वस्तु का सेवन हो जाए, तो व्रत खंडित माना जाता है और माता से क्षमा याचना करनी पड़ती है।
सोलह शुक्रवार का संकल्प और उद्यापन की शास्त्रसम्मत विधि
आमतौर पर श्रद्धालु मां संतोषी का व्रत मनोकामना पूर्ति के लिए निरंतर सोलह शुक्रवार तक रखने का संकल्प लेते हैं। जब सोलह शुक्रवार का व्रत पूर्ण हो जाता है, तो अंतिम शुक्रवार को इसका विधिवत उद्यापन किया जाता है। उद्यापन के दिन प्रातःकाल विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, विशाल हवन या दीपदान किया जाता है और माता को खीर, पूरी, चने और हलवे का भोग लगाया जाता है।
उद्यापन का सबसे अनिवार्य अंग यह है कि इस दिन कम से कम आठ बालकों (लड़कों) को आदरपूर्वक घर पर आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है। बालकों को भगवान गणेश का स्वरूप मानकर सात्विक खीर, पूरी और चने का भोजन परोसा जाता है। यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि बालकों के भोजन में रत्ती भर भी खटाई या नमक का अंश न हो। भोजन के उपरांत बालकों को दक्षिणा, फल और उपहार देकर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है। इस दिन घर का कोई भी सदस्य किसी भी रूप में खटाई का स्पर्श नहीं करता।
Santoshi Mata Pooja Vidhi: आध्यात्मिक अनुशासन और सदाचार का महत्व
संतोषी माता के व्रत की पूर्णता केवल बाहरी कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतर्मन के शुद्धिकरण की साधना है। व्रत के दिन किसी भी प्रकार के वाद-विवाद, क्रोध, झूठ, चुगली और कटु वचनों के प्रयोग से बचना चाहिए। मन में किसी के प्रति ईर्ष्या का भाव न लाएं और घर आए अतिथि अथवा जरूरतमंद की सामर्थ्य अनुसार सहायता करें। दिनभर शांत रहकर मां के पावन नाम का स्मरण करना और सभी प्राणियों के प्रति दया का भाव रखना ही इस व्रत का वास्तविक सार है। जब यह साधना सच्चे अंतःकरण से संपन्न होती है, तो मां संतोषी की कृपा से जीवन की समस्त विपदाएं दूर हो जाती हैं और घर में अखंड शांति का साम्राज्य स्थापित होता है।
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