शरद पूर्णिमा की रात क्यों किया जाता है जागरण? मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए जानें महत्व और पूजा विधि
शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा, रात्रि जागरण, चंद्रमा को अर्घ्य और चांदनी में खीर रखने की परंपरा का धार्मिक महत्व जानें। साथ ही जानें कोजागरी पूर्णिमा और भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जुड़ी मान्यताएं।
Sharad Purnima 2026: सनातन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला शरद पूर्णिमा का पर्व अत्यंत पावन, मंगलकारी और चमत्कारी माना जाता है। पूरे वर्ष में पड़ने वाली बारह पूर्णिमाओं में शरद पूर्णिमा को सर्वश्रेष्ठ और सर्वकला संपन्न माना गया है, क्योंकि इस पावन रात्रि को आकाश में उदित होने वाला चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होकर पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करता है। धार्मिक और तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में धन, वैभव और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी माता महालक्ष्मी स्वयं बैकुंठ धाम से उतरकर भूलोक पर विचरण करती हैं। जो जातक इस रात आलस्य और निद्रा का त्याग कर मां लक्ष्मी के श्री चरणों का ध्यान करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उन पर देवी की असीम अनुकंपा बरसती है। इसी कारणवश इस पर्व को देश के अधिकांश अंचलों में ‘कोजागरी पूर्णिमा’ या ‘कोजागर व्रत’ के नाम से भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
Sharad Purnima 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय
वैदिक पंचांग की सूक्ष्म खगोलीय गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा का महापर्व 25 अक्टूबर, दिन रविवार को पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का शुभारंभ 25 अक्टूबर को पूर्वाह्न 11 बजकर 55 मिनट पर होगा, जबकि इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 26 अक्टूबर 2026 को प्रातःकाल 9 बजकर 41 मिनट पर होगा।
चूंकि शरद पूर्णिमा के व्रत, चंद्र दर्शन और महालक्ष्मी के रात्रि पूजन में ‘पूर्णिमा निशीथव्यापिनी’ और ‘प्रदोषव्यापिनी’ तिथि का शास्त्रीय नियम लागू होता है, इसलिए 25 अक्टूबर की रात्रि को ही समस्त धार्मिक अनुष्ठान, महालक्ष्मी पूजन और रात्रि जागरण संपन्न किए जाएंगे। 25 अक्टूबर की शाम को चंद्रोदय का समय विभिन्न नगरों के भौगोलिक अक्षांशों के अनुसार भिन्न रहेगा, किंतु सामान्यतः शाम लगभग 5 बजकर 35 मिनट से 6 बजकर 10 मिनट के मध्य अमृतमयी चंद्रमा के दर्शन किए जा सकेंगे। श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार सटीक चंद्रोदय का समय सुनिश्चित कर पूजा आरंभ करनी चाहिए।
शरद पूर्णिमा की रात जागरण का आध्यात्मिक रहस्य: ‘को जागति’ की परंपरा
शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में जागरण करने के पीछे एक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक आख्यान और शास्त्रीय विधान जुड़ा हुआ है। संस्कृत भाषा के ‘को जागति’ शब्द से ही ‘कोजागरी’ संज्ञा की उत्पत्ति हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है—”कौन जाग रहा है?”
पौराणिक शास्त्रों और स्कंद पुराण के अनुसार, शरद पूर्णिमा की निशीथ काल यानी मध्यरात्रि में माता महालक्ष्मी हाथ में वरद मुद्रा धारण कर पृथ्वी के प्रत्येक द्वार पर दस्तक देती हैं और आकाश मार्ग से यह अवलोकन करती हैं कि कौन सा भक्त संसार के मोह, प्रमाद और निद्रा का त्याग कर सत्य, धर्म और ईश्वरीय चेतना में जागृत है। जो मनुष्य इस रात्रि को जागकर मां लक्ष्मी के मंत्रों, श्री सूक्त और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करते हैं, देवी उनके गृह में स्थाई रूप से निवास करती हैं और उनकी दरिद्रता का समूल नाश कर देती हैं।
इसके विपरीत, जो लोग इस कल्याणकारी रात्रि को प्रमादवश सोए रहते हैं, माता लक्ष्मी उनके द्वार से बिना कृपा किए लौट जाती हैं। रात्रि जागरण का यह विधान केवल शारीरिक रूप से जागने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतःकरण के अज्ञान को मिटाकर आत्म-जागृति प्राप्त करने का भी संदेश देता है।
मां महालक्ष्मी और कुबेर देव की प्रामाणिक पूजन विधि
शरद पूर्णिमा के पावन दिवस पर प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर श्वेत या पीले स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके उपरांत सूर्यदेव को अर्घ्य देकर व्रत का मानसिक संकल्प लें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं।
चौकी पर माता महालक्ष्मी और भगवान श्रीहरि विष्णु की संयुक्त प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें, साथ ही धन के कोषाध्यक्ष यक्षराज कुबेर देव का भी आह्वान करें। देवी लक्ष्मी को पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराकर कुमकुम, अक्षत, सुगंधित चंदन, कमल के पुष्प, गुलाब की माला और इत्र अर्पित करें। भोग के रूप में ऋतुफल, मखाने, सिंघाड़ा, बताशे और विशेष रूप से गाय के दूध से बनी खीर का नैवेद्य लगाएं।
पूजा के दौरान शुद्ध घी का अखंड दीपक प्रज्वलित करें और सुगंधित धूपबत्ती जलाएं। इसके बाद ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः’ अथवा ‘ॐ ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद’ मंत्र का कमलगट्टे की माला से कम से कम 108 बार जाप करें। रात्रि के समय श्री सूक्त, लक्ष्मी चालीसा और कनकधारा स्तोत्र का सस्वर पाठ करते हुए परिवार सहित मां लक्ष्मी की भव्य आरती संपन्न करें।
ब्रज का महारास और रास पूर्णिमा का दिव्य स्वरूप
वैष्णव परंपरा और श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, शरद पूर्णिमा का संबंध परम ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य रासलीला से भी अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इसी शरद पूर्णिमा की धवल ज्योत्स्ना में वृंदावन के पावन यमुना तट पर बंशीवट के नीचे योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मधुर मुरली की तान छेड़ी थी, जिसे सुनकर ब्रज की गोपियां सुध-बुध खोकर रासमंडल में खिंची चली आई थीं।
भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया के बल पर शरद पूर्णिमा की उस एक रात्रि को ब्रह्मा जी की एक पूरी रात (हजारों वर्षों) के बराबर विस्तृत कर दिया था और प्रत्येक गोपी के साथ व्यक्तिगत रूप से प्रकट होकर दिव्य ‘महारास’ संपन्न किया था। यह महारास कोई सांसारिक नृत्य नहीं था, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा के साथ परम मिलन का आध्यात्मिक चरम था। इसी कारण ब्रज, मथुरा, वृंदावन और संपूर्ण वैष्णव जगत में शरद पूर्णिमा को ‘रास पूर्णिमा’ के रूप में असीम भक्ति और भाव के साथ मनाया जाता है।
Sharad Purnima 2026: चंद्रमा को अर्घ्य और मानसिक शांति का वरदान
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक (चंद्रमा मनसो जातः) माना गया है। जिन जातकों की जन्मकुंडली में चंद्र दोष हो, मानसिक अशांति, अनिद्रा या अवसाद की समस्या रहती हो, उनके लिए शरद पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा की उपासना एक अचूक औषधि के समान कार्य करती है।
रात्रि के समय जब चंद्रमा अपने चरम यौवन पर आकाश के मध्य में पहुंचे, तो तांबे या चांदी के लोटे में शुद्ध जल, कच्चा दूध, सफेद चंदन, अक्षत और श्वेत पुष्प डालकर चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए। अर्घ्य देते समय ‘ॐ सों सोमाय नमः’ अथवा ‘ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः’ मंत्र का उच्चारण करें। इसके उपरांत कुछ समय तक शांत चित्त होकर टकटकी लगाकर पूर्ण चंद्रमा को निहारें (त्राटक करें)। इससे आंखों की रोशनी तेज होती है, मन के नकारात्मक विचार शांत होते हैं और चित्त में अद्भुत शीतलता व धैर्य का संचार होता है।
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